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कारसेवकों ने सही लाठियां, मगर नहीं डिगे कदम
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राम मंदिर:- बेहडा सादात निवासी रमेशपाल और कश्मीरा सिंह।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
कारसेवकों ने सही लाठियां, मगर नहीं डिगे कदम
मोरना (मुजफ्फरनगर)। राममंदिर आंदोलन में जय श्रीराम की आवाज गांव-गांव गूंजने लगी थी। छह दिसंबर 1992 को रामभक्तों ने अयोध्या में पुलिस की गोलियां खाईं और लाठियां सही, मगर रामभक्तों के कदम नहीं डिगे। कारसेवकों को गौरव बोध है कि वर्षों की तपस्या, त्याग और संघर्ष अब मूर्त रूप ले रहा है।
छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या पहुंचने के लिए कारसेवकों ने काफी मुश्किलों का सामना किया था। ये यादें कारसेवकों में जोश से भर देती है। किसान मजदूर इंटर कॉलेज चौरावाला से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हो चुके बेहड़ा सादात निवासी रमेशचंद पाल एवं कश्मीरा सिंह बताते हैं कि एक जत्था मोरना क्षेत्र से वाया बिजनौर होकर नजीबाबाद स्टेशन पहुंचा था। वहां से लखनऊ की ट्रेन पकड़ी। पुलिस से बचने को रात भर जागते रहे। लखनऊ से पहले रात के अंधेरे में एक स्टेशन पर उतरे। दूर पैदल चले और फिर बस से अयोध्या पहुंच गए। रामनगरी में वाल्मीकि धर्मशाला में रुके। लाखों रामभक्तों की मौजूदगी से अयोध्या हतप्रभ थी। हनुमान गढ़ी के रास्ते में पुलिस ने कई बार तलाशी ली। कारसेवा में चौधरी हरबंश सिंह सलारपुर, जानसठ के मास्टर शोभाराम, सत्यपाल, मांगेराम, बनारसी शर्मा बेहड़ा सादात, नरेंद्र त्यागी मालपुरा आदि की भागीदारी रही थी। कहते हैं कि कारसेवा से 15 दिन पहले घर छोड़ दिया था। पुलिस प्रशासन की कड़ी चौकसी थी। लखनऊ के बाद खेतों की राह पकड़ी। दिन में जंगल में छिपे रहते और रात में अयोध्या की तरफ बढ़ते थे। ग्रामीण भोजन कराते और आगे के गांव की सीमा तक सुरक्षित छोड़ते। अयोध्या के आसपास के गांवों में पुलिस दबिश से बचने लोगों ने गड्ढे खोद दिए थे, ताकि कारसेवक भाग सके। पुलिस के आने पर झाड़ियों में छिप जाते थे, लेकिन कांटों से शरीर जख्मी हो गए। लाठीचार्ज भी हुआ। खून बहने लगा, मगर पीछे नहीं हटे।
रास्ते में हो गई थी गिरफ्तारी
मोरना। अयोध्या जाते वक्त कारसेवकों को बुलंदशहर में गिरफ्तार भी किया गया था। बेहड़ा थ्रू गांव के वेदप्रकाश शर्मा बताते हैं कि रोडवेज से लखनऊ निकले थे, मगर रास्ते में पुलिस प्रशासन ने हिरासत में ले लिया। क्षेत्र के तारीफ सिंह, दिनेश शर्मा, विश्वेंद्र शर्मा, आदित्य, बलवंत सैनी आदि को तीन-दिन बुलंदशहर की अस्थाई जेल में रखा गया। रामभक्तों ने भोजन की व्यवस्था संभाली।
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मोरना (मुजफ्फरनगर)। राममंदिर आंदोलन में जय श्रीराम की आवाज गांव-गांव गूंजने लगी थी। छह दिसंबर 1992 को रामभक्तों ने अयोध्या में पुलिस की गोलियां खाईं और लाठियां सही, मगर रामभक्तों के कदम नहीं डिगे। कारसेवकों को गौरव बोध है कि वर्षों की तपस्या, त्याग और संघर्ष अब मूर्त रूप ले रहा है।
छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या पहुंचने के लिए कारसेवकों ने काफी मुश्किलों का सामना किया था। ये यादें कारसेवकों में जोश से भर देती है। किसान मजदूर इंटर कॉलेज चौरावाला से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हो चुके बेहड़ा सादात निवासी रमेशचंद पाल एवं कश्मीरा सिंह बताते हैं कि एक जत्था मोरना क्षेत्र से वाया बिजनौर होकर नजीबाबाद स्टेशन पहुंचा था। वहां से लखनऊ की ट्रेन पकड़ी। पुलिस से बचने को रात भर जागते रहे। लखनऊ से पहले रात के अंधेरे में एक स्टेशन पर उतरे। दूर पैदल चले और फिर बस से अयोध्या पहुंच गए। रामनगरी में वाल्मीकि धर्मशाला में रुके। लाखों रामभक्तों की मौजूदगी से अयोध्या हतप्रभ थी। हनुमान गढ़ी के रास्ते में पुलिस ने कई बार तलाशी ली। कारसेवा में चौधरी हरबंश सिंह सलारपुर, जानसठ के मास्टर शोभाराम, सत्यपाल, मांगेराम, बनारसी शर्मा बेहड़ा सादात, नरेंद्र त्यागी मालपुरा आदि की भागीदारी रही थी। कहते हैं कि कारसेवा से 15 दिन पहले घर छोड़ दिया था। पुलिस प्रशासन की कड़ी चौकसी थी। लखनऊ के बाद खेतों की राह पकड़ी। दिन में जंगल में छिपे रहते और रात में अयोध्या की तरफ बढ़ते थे। ग्रामीण भोजन कराते और आगे के गांव की सीमा तक सुरक्षित छोड़ते। अयोध्या के आसपास के गांवों में पुलिस दबिश से बचने लोगों ने गड्ढे खोद दिए थे, ताकि कारसेवक भाग सके। पुलिस के आने पर झाड़ियों में छिप जाते थे, लेकिन कांटों से शरीर जख्मी हो गए। लाठीचार्ज भी हुआ। खून बहने लगा, मगर पीछे नहीं हटे।
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रास्ते में हो गई थी गिरफ्तारी
मोरना। अयोध्या जाते वक्त कारसेवकों को बुलंदशहर में गिरफ्तार भी किया गया था। बेहड़ा थ्रू गांव के वेदप्रकाश शर्मा बताते हैं कि रोडवेज से लखनऊ निकले थे, मगर रास्ते में पुलिस प्रशासन ने हिरासत में ले लिया। क्षेत्र के तारीफ सिंह, दिनेश शर्मा, विश्वेंद्र शर्मा, आदित्य, बलवंत सैनी आदि को तीन-दिन बुलंदशहर की अस्थाई जेल में रखा गया। रामभक्तों ने भोजन की व्यवस्था संभाली।
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