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टॉयलेट बनवाए नहीं, ग्रामीणों ने सरकार के 17 करोड़ रुपये कर लिए खर्च
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Wed, 13 Sep 2017 12:32 AM IST
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जिले के एक गांव में बनाया जा रहा टॉयलेट।
- फोटो : अमर उजाला
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शौचालय बनाने के लिए सरकार से मिला करोड़ों रुपया लोगों ने डकार लिया। गांव में जांच के दौरान खाते से पैसा निकालने के बाद भी टॉयलेट नहीं बनने से अफसरों में खलबली मच गई है। इसी कारण छह-छह हजार की पहली किश्त जारी होने के बाद दूसरी किश्त रोक दी गई है। खाते में पैसा आने के 15 दिन के अंदर टॉयलेट बनाने का प्रावधान है।
तीन माह पूर्व 34839 लाभार्थियों को लगभग 21 करोड़ रुपये जारी किया गया था, जिनमें से 6010 लोगों ने ही शौचालय बनवाए। फिलहाल 28. 829 पात्रों पर सरकार का 17 करोड़ 29 लाख 74 हजार रुपया फंसा हुआ है। डीएम ने आनन-फानन में 100 गांवों में प्रत्येक गांव में जिलास्तरीय दो अधिकारी लगाए हैं। 20 सितंबर तक इन अधिकारियों को शौचालय बनवाने का टारगेट दिया गया है।
प्रदेश सरकार ने दो अक्तूबर तक प्रत्येक घर में शौचालय बनवाने का लक्ष्य रखा है। जिले में 498 गांव हैं, इन गांवों में सर्वे के बाद 51344 शौचालय बनाने का टारगेट सामने आया। बीते जुलाई माह में डीपीआरओ ने सर्वे की सूची के आधार पर 34,839 शौचालयों के लिए छह-छह हजार की पहली किश्त जारी की। लोगों को जागरूक करने के लिए तीन गांव पर एक चैंपियन लगाया गया। गांवों में सूची के हिसाब से चैंपियन ने जब पात्रों की जांच की, तो पता लगा कि शौचालय बनाया ही नहीं जा रहा है।
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तीन माह में मात्र 6010 लोग ही शौचालय बना पाए, जबकि बाकी लोगों ने पैसा निकाल लिया। आंकड़ा डीपीआरओ के बाद सीडीओ और डीएम के पास पहुंचा, तो अफसरों के होश उड़ गए। सरकारी पैसे का हिसाब कहां से दिया जाएगा। अधिकतर लोग सरकार से मिले पैसे को दूसरे कामों में खर्च कर चुके हैं। इसे लेकर आनन-फानन में जिले के समस्त अधिकारियों को शौचालय निर्माण के अभियान में लगा दिया गया।
अधिक शौचालय वाले 100 गांव चिह्नित कर प्रत्येक गांव में जिला स्तरीय दो अधिकारी लगाए गए हैं। गंभीरता का पता इसी बात से लगता है कि सभी एसडीएम को भी इस काम में लगाया गया है। इन अधिकारियों को टारगेट दिया गया है कि 20 सितंबर तक हर हालत में उन पात्रों के घरों में टॉयलेट बनवाए, जिनका पैसा जारी हो चुका है। इन अफसरों को गांव में खुली बैठक करने, उसमें लाभार्थी को बुलाने, निगरानी समिति की और चैंपियन के उत्साहवर्द्धन करने की जिम्मेदारी दी गई है। लाभार्थी को शौचालय का महत्व समझाकर टॉयलेट बनवाना है।
प्रचार की कमी से बनी समस्या
मुजफ्फरनगर। सरकार स्वच्छता अभियान के कुल खर्च का 20 प्रतिशत प्रचार पर खर्च के लिए दे रही है। प्रशासन ने यहां प्रचार के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किए हैं। किसी एनजीओ को हायर नहीं किया जो जनता को जागरूक करती। केवल तीन गांव पर एक चैंपियन तैनात कर दिया। चैंपियन को पहले 230 रुपये प्रतिदिन दिया जा रहा था। अब एक टॉयलेट पर 150 दिए जा रहे हैं। अधिकारी गांवों में वह माहौल नहीं बना पाए और न ही लोगों को उस तरह से समझा पाए जिस तरह से अभियान को पड़ोसी जनपद बिजनौर में सफल किया गया।
गांवों में राज मिस्त्रियों का टोटा
मुजफ्फरनगर। एक टॉयलेट बनाने में एक राजमिस्त्री को तीन दिन लगते हैं। जिले में पंचायती राज विभाग केवल 636 राज मिस्त्रियों को ही ट्रेंड कर पाया है। ये अपनी क्षमता के हिसाब से ही टॉयलेट बना सकते हैं। आठ दिन में 30 हजार टॉयलेट बनाए जाना केवल प्रशासन का ख्याली पुलाव ही लगता है।
किस वर्ष में कितने टॉयलेट बने
मुजफ्फरनगर। अब तक वर्ष 2016-17 में सबसे ज्यादा 18716 टॉयलेट बने हैं। 2013-14 में 2323 टॉयलेट बने थे। 2014-15 में 11631 शौचालयों का निर्माण हो पाया। 2015-16 में पंचायती राज विभाग ने 11761 शौचालय बनाए गए। 2017-18 में अब तक 6010 टॉयलेट बने हैं। पंचायती राज विभाग के रिकार्ड के अनुसार 5200 शौचालय बनाने का काम चल रहा है।
लोगों को प्रेरित करेंगे अधिकारी
मुजफ्फरनगर। सीडीओ अंकित अग्रवाल का कहना है कि पैसा जारी होने के 15 दिन के अंदर टॉयलेट बनना शुरू हो जाना चाहिए। तीन माह बाद भी टॉयलेट न बनना गंभीर मामला है। हर गांव में दो अधिकारी लगाकर मॉनिटरिंग कराई जा रही है। अफसरों को उन लाभार्थियों की सूची उपलब्ध करा दी गई है, जिन्हें पैसा जारी हुआ है। जिनको पैसा जारी हुआ है, उन सभी को टॉयलेट बनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
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तीन माह पूर्व 34839 लाभार्थियों को लगभग 21 करोड़ रुपये जारी किया गया था, जिनमें से 6010 लोगों ने ही शौचालय बनवाए। फिलहाल 28. 829 पात्रों पर सरकार का 17 करोड़ 29 लाख 74 हजार रुपया फंसा हुआ है। डीएम ने आनन-फानन में 100 गांवों में प्रत्येक गांव में जिलास्तरीय दो अधिकारी लगाए हैं। 20 सितंबर तक इन अधिकारियों को शौचालय बनवाने का टारगेट दिया गया है।
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प्रदेश सरकार ने दो अक्तूबर तक प्रत्येक घर में शौचालय बनवाने का लक्ष्य रखा है। जिले में 498 गांव हैं, इन गांवों में सर्वे के बाद 51344 शौचालय बनाने का टारगेट सामने आया। बीते जुलाई माह में डीपीआरओ ने सर्वे की सूची के आधार पर 34,839 शौचालयों के लिए छह-छह हजार की पहली किश्त जारी की। लोगों को जागरूक करने के लिए तीन गांव पर एक चैंपियन लगाया गया। गांवों में सूची के हिसाब से चैंपियन ने जब पात्रों की जांच की, तो पता लगा कि शौचालय बनाया ही नहीं जा रहा है।
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तीन माह में मात्र 6010 लोग ही शौचालय बना पाए, जबकि बाकी लोगों ने पैसा निकाल लिया। आंकड़ा डीपीआरओ के बाद सीडीओ और डीएम के पास पहुंचा, तो अफसरों के होश उड़ गए। सरकारी पैसे का हिसाब कहां से दिया जाएगा। अधिकतर लोग सरकार से मिले पैसे को दूसरे कामों में खर्च कर चुके हैं। इसे लेकर आनन-फानन में जिले के समस्त अधिकारियों को शौचालय निर्माण के अभियान में लगा दिया गया।
अधिक शौचालय वाले 100 गांव चिह्नित कर प्रत्येक गांव में जिला स्तरीय दो अधिकारी लगाए गए हैं। गंभीरता का पता इसी बात से लगता है कि सभी एसडीएम को भी इस काम में लगाया गया है। इन अधिकारियों को टारगेट दिया गया है कि 20 सितंबर तक हर हालत में उन पात्रों के घरों में टॉयलेट बनवाए, जिनका पैसा जारी हो चुका है। इन अफसरों को गांव में खुली बैठक करने, उसमें लाभार्थी को बुलाने, निगरानी समिति की और चैंपियन के उत्साहवर्द्धन करने की जिम्मेदारी दी गई है। लाभार्थी को शौचालय का महत्व समझाकर टॉयलेट बनवाना है।
प्रचार की कमी से बनी समस्या
मुजफ्फरनगर। सरकार स्वच्छता अभियान के कुल खर्च का 20 प्रतिशत प्रचार पर खर्च के लिए दे रही है। प्रशासन ने यहां प्रचार के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किए हैं। किसी एनजीओ को हायर नहीं किया जो जनता को जागरूक करती। केवल तीन गांव पर एक चैंपियन तैनात कर दिया। चैंपियन को पहले 230 रुपये प्रतिदिन दिया जा रहा था। अब एक टॉयलेट पर 150 दिए जा रहे हैं। अधिकारी गांवों में वह माहौल नहीं बना पाए और न ही लोगों को उस तरह से समझा पाए जिस तरह से अभियान को पड़ोसी जनपद बिजनौर में सफल किया गया।
गांवों में राज मिस्त्रियों का टोटा
मुजफ्फरनगर। एक टॉयलेट बनाने में एक राजमिस्त्री को तीन दिन लगते हैं। जिले में पंचायती राज विभाग केवल 636 राज मिस्त्रियों को ही ट्रेंड कर पाया है। ये अपनी क्षमता के हिसाब से ही टॉयलेट बना सकते हैं। आठ दिन में 30 हजार टॉयलेट बनाए जाना केवल प्रशासन का ख्याली पुलाव ही लगता है।
किस वर्ष में कितने टॉयलेट बने
मुजफ्फरनगर। अब तक वर्ष 2016-17 में सबसे ज्यादा 18716 टॉयलेट बने हैं। 2013-14 में 2323 टॉयलेट बने थे। 2014-15 में 11631 शौचालयों का निर्माण हो पाया। 2015-16 में पंचायती राज विभाग ने 11761 शौचालय बनाए गए। 2017-18 में अब तक 6010 टॉयलेट बने हैं। पंचायती राज विभाग के रिकार्ड के अनुसार 5200 शौचालय बनाने का काम चल रहा है।
लोगों को प्रेरित करेंगे अधिकारी
मुजफ्फरनगर। सीडीओ अंकित अग्रवाल का कहना है कि पैसा जारी होने के 15 दिन के अंदर टॉयलेट बनना शुरू हो जाना चाहिए। तीन माह बाद भी टॉयलेट न बनना गंभीर मामला है। हर गांव में दो अधिकारी लगाकर मॉनिटरिंग कराई जा रही है। अफसरों को उन लाभार्थियों की सूची उपलब्ध करा दी गई है, जिन्हें पैसा जारी हुआ है। जिनको पैसा जारी हुआ है, उन सभी को टॉयलेट बनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।