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दलबदलुओं को जनता ने दिखा दिया ठेंगा, पाला बदलने से भी नसीब नहीं हुई जीत      

Sun, 12 Mar 2017 11:02 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Updated Sun, 12 Mar 2017 11:02 PM IST
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Do not win defectors
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दलबदलुओं की विधायक बनने की चाह को जनता ने ठेंगा दिखा दिया है। विधानसभा चुनाव से पहले टिकट नहीं मिलने की वजह से कई दावेदार पाला बदल गए, मगर मोदी इफैक्ट में उनका चुनावी गणित फेल हो गया। सपा विधायक नवाजिश आलम का मीरापुर से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ना घाटे का सौदा साबित हुआ।       
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चुनाव से पहले टिकट को लेकर जिन प्रत्याशियों ने दल बदलने में वक्त नहीं लिया। उन्हें मतदाताओं ने नकारने में भी गुरेज नहीं किया। राजनीति का चुनावी गणित बिगड़ गया और दलबदलुओं को किसी सीट पर जीत नहीं मिली। 2012 में पूर्व सांसद अमीर आलम के बेटे नवाजिश आलम सपा के टिकट पर पहली बार बुढ़ाना सीट से विधायक बने थे। सपा के शीर्ष नेतृत्व की बेरुखी की वजह से नवाजिश ने पार्टी छोड़ दी। बसपा से नजदीकियां बढ़ी और नवाजिश  को हाथी की सवारी भा गई। 
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बहनजी ने सीटिंग एमएलए मौलाना जमील अहमद का टिकट काटकर नवाजिश को दिया, लेकिन सारे समीकरण उलझ गए। चुनाव में उन्हें तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। वर्ष 2007 में खतौली सीट से जीते योगराज सिंह बसपा सरकार में राज्यमंत्री बने थे। वर्ष 2012 में वह बुढ़ाना सीट बसपा के टिकट पर चुनाव हार गए।
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अबकी बार उन्हें बसपा से टिकट की उम्मीदें नहीं थी। वैसे भी बुढ़ाना सीट पर बसपा के टिकट को लेकर घमासान मचा था। ऐसे में पूर्व मंत्री योगराज सिंह ने पार्टी छोड़कर चौधरी अजित सिंह का साथ पा लिया। मगर रालोद बुढ़ाना सीट पर चौथे स्थान पर खिसक गई। कम वक्त में ज्यादा की चाहत ने सलमान जैदी को झटका दिया है। 

चरथावल के ब्लॉक प्रमुख चुनाव में उन्होंने सपा के दम पर अपनी पत्नी जीत दिला दी। खुद विधायक बनने की बिसात भी बिछाने में मशगूल हो गए। धूमधड़ाके साथ बहनजी के महारथी हो गए और निवर्तमान विधायक नूरसलतीम राना का टिकट काटकर बसपा ने उन्हें प्रत्याशी घोषित कर दिया। टिकट के खेल में फिर राना ने बाजी मार ली। ऐसे में सलमान जैदी छोटे चौधरी के पाले में चले गए। चुनावी रण में उनके इरादे ढेर हो गए और चौथे स्थान पर सिमट गए।


वर्ष 2007 में बिजनौर सीट से बसपा विधायक बने शाहनवाज राना का दल बदलने का पैंतरा उन्हीं पर भारी पड़ा। सपा ने राना को मीरापुर सीट से टिकट दिया। जैसे ही यह सीट गठबंधन के चलते कांग्रेस के हिस्से में जाने की भनक लगी, राना कांग्रेस में कूद गए। मीरापुर सीट सपा ने नहीं छोड़ी और न ही राना को वापस लिया। मजबूरी में उन्हें रालोद के टिकट पर खतौली सीट से चुनाव लड़ना पड़ा। सारी कवायद नाकाम साबित हुई और शाहनवाज को चौथा स्थान मिला।
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