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खूनी मातम कर जार-जार रोए शिया सोगवार
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Thu, 13 Oct 2016 12:53 AM IST
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जुलूस में शामिल शिया समुदाय के लोग।
- फोटो : अमर उजाला
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मुजफ्फरनगर मोहर्रम की दसवीं पर हजरत इमाम हुसैन और उनके जानशीनों की शहादत की याद में शिया सोगवारों ने खूनी मातम किया और जार-जार रोए। मातमी जुलूस निकालकर काली नदी पार करबला में ताजिये सुपुर्दे खाक किए। मजलिसों और जुलूस का सिलसिला भी खत्म हो गया।
काली नदी स्थित नमाजगाह पर रोजे आशुरा, आमाल और नमाज मिसम रजा ने अदा कराई। इंतजार हुसैन जैदी ने कहा कि अत्याचारी यजीद नामक दुराचारी जालिम ने इराक स्थित करबला के मैदान में अपने लाखों के लश्कर के साथ इमाम हुसैन को उनके साथियों सहित शहीद कर दिया। रसूले खुदा के नवासे इमाम हुसैन 72 साथियों सहित हक और इंसाफ की लड़ाई में शहीद हो गए। आज भी खानदाने हुसैन की शहादत लोगों के दिलों को झकझोरती है।
करबला की जंग के साथ ही जैनब का किरदार जुड़ा है। जैनब न होती तो इस्लाम को उसकी पहचान भी न मिलती। शहर की सभी 18 इमाम बारगाहों में मजलिस, जुलूस, अलम और ताजिये निकाले गये। मुख्य जुलूस अबुपुरा पचदरा और इमामबारगाह मोती महल से निकाला गया। अबुपुरा में करबला पर नमाजे आमाले आशूरा की नमाज मौलाना आलम ने पढ़ाई। जैगम मियां, आजम अली मियां ने मर्सिया ख्वानी की।
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सवारी जनाब सादिक हुसैन, अली मियां, हुसैन मियां, अली, शान, बसारत हुसैन ने की। हैदर मेहंदी एडवोकेट का सहयोग रहा। मल्हूपुरा के मातमी जुलूस में शिया सोगवार कच्ची सड़क, अस्पताल तिराहा, नावल्टी चौराहा से होते हुए मोती महल इमामबाडा में शामिल हुए। परवेज नकवी, अली यूसुफ, जफर मसूद, गुलाम असगर, हाजी अली हसन, सरूर अब्बास, हसन अब्बास, बाबर, वसीम, हैदर, चांद, डॉ रईस, डॉ इकबाल आदि शामिल रहे।
सभी अंजुमने नोहाख्वानी मातम करते हुए नदी रोड से होते हुए काली नदी पार स्थित करबला पहुंचे, जहां ताजिये सुपुर्दे खाक किए गए। करबला कमेटी के सदस्यों ने सभी शिया सोगवारों का फाका खुलवाया और जलपान की व्यवस्था कराई। दावते हक की तरफ से जैनबिया इंटर कॉलेज में करबला का नक्शा पेश किया गया। जियारत के लिए शिया सोगवारों का पूरी रात तांता लगा रहा। शामे गरीबा की मजलिस में मौलाना हसनैन ने रोशनी डाली।
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काली नदी स्थित नमाजगाह पर रोजे आशुरा, आमाल और नमाज मिसम रजा ने अदा कराई। इंतजार हुसैन जैदी ने कहा कि अत्याचारी यजीद नामक दुराचारी जालिम ने इराक स्थित करबला के मैदान में अपने लाखों के लश्कर के साथ इमाम हुसैन को उनके साथियों सहित शहीद कर दिया। रसूले खुदा के नवासे इमाम हुसैन 72 साथियों सहित हक और इंसाफ की लड़ाई में शहीद हो गए। आज भी खानदाने हुसैन की शहादत लोगों के दिलों को झकझोरती है।
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करबला की जंग के साथ ही जैनब का किरदार जुड़ा है। जैनब न होती तो इस्लाम को उसकी पहचान भी न मिलती। शहर की सभी 18 इमाम बारगाहों में मजलिस, जुलूस, अलम और ताजिये निकाले गये। मुख्य जुलूस अबुपुरा पचदरा और इमामबारगाह मोती महल से निकाला गया। अबुपुरा में करबला पर नमाजे आमाले आशूरा की नमाज मौलाना आलम ने पढ़ाई। जैगम मियां, आजम अली मियां ने मर्सिया ख्वानी की।
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सवारी जनाब सादिक हुसैन, अली मियां, हुसैन मियां, अली, शान, बसारत हुसैन ने की। हैदर मेहंदी एडवोकेट का सहयोग रहा। मल्हूपुरा के मातमी जुलूस में शिया सोगवार कच्ची सड़क, अस्पताल तिराहा, नावल्टी चौराहा से होते हुए मोती महल इमामबाडा में शामिल हुए। परवेज नकवी, अली यूसुफ, जफर मसूद, गुलाम असगर, हाजी अली हसन, सरूर अब्बास, हसन अब्बास, बाबर, वसीम, हैदर, चांद, डॉ रईस, डॉ इकबाल आदि शामिल रहे।
सभी अंजुमने नोहाख्वानी मातम करते हुए नदी रोड से होते हुए काली नदी पार स्थित करबला पहुंचे, जहां ताजिये सुपुर्दे खाक किए गए। करबला कमेटी के सदस्यों ने सभी शिया सोगवारों का फाका खुलवाया और जलपान की व्यवस्था कराई। दावते हक की तरफ से जैनबिया इंटर कॉलेज में करबला का नक्शा पेश किया गया। जियारत के लिए शिया सोगवारों का पूरी रात तांता लगा रहा। शामे गरीबा की मजलिस में मौलाना हसनैन ने रोशनी डाली।