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किसानों के मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के अलबेले अंदाज का हर कोई था मुरीद

Wed, 15 May 2019 12:34 AM IST
Deepak Kausik अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Published by: Deepak Kausik Updated Wed, 15 May 2019 12:34 AM IST
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Chaudhary Mahendra Singh Tikait
एक आंदोलन के दौरान किसानों को संबोधित करते महेंद्र सिंह टिकैत (फाइल)। - फोटो : अमर उजाला
किसान आंदोलन की जैसी आवाज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने देश में बुलंद की, वैसा असर अब दिखाई नहीं देता। लोकसभा चुनाव के प्रचार में सियासी पार्टियों में आरोप-प्रत्यारोप की जंग छिड़ी है, मगर किसानों के मुद्दे नदारद दिखाई दिए हैं। ऐसे में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की याद आना स्वाभाविक है। सादगी के साथ किए संघर्ष से उन्होंने किसान शक्ति को न केवल एकजुट किया, बल्कि लखनऊ से दिल्ली तक की सत्ता के सिंहासन भी हिला दिए थे। टिकैत के अलबेले अंदाज ने हर किसी को उनका मुरीद बना दिया था।
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भारतीय किसान यूनियन की नींव रख कर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने देश में किसान आंदोलनों को नई ताकत दी थी। उन्होंने खेतीबाड़ी के फर्ज के साथ किसानों को अपने हकों के लिए संघर्ष करने का हौसला दिया। बुधवार को उनकी आठवीं पुण्यतिथि है। उनकी बात और उनके कद जैसा दूसरा किसान नेता अभी तक देश के सामने नहीं आया है।
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बालियान खाप की चौधराहट की पगड़ी तो छोटी उम्र में ही उन्होंने संभाल ली थी। जिंदगी के पांच दशक से ज्यादा चौधरी टिकैत ने खेती किसानी और सामाजिक दायित्वों में बिताए। अपनी समस्याओं को लेकर किसान जब उनसे मिलते तो निराकरण की कोई राह नहीं सूझती। धीरे-धीरे शुरू हुई किसानों की दिक्कतों पर चर्चा ने चौधरी टिकैत के इरादों को नई दिशा दे दी।

वर्ष 1987 में शामली के करमूखेड़ी बिजलीघर पर उनके नेतृत्व में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर चार दिन का धरना दिया था। प्रशासन के आश्वासन पर किसान धरने से हट गए, मगर कोई समाधान नहीं होने पर तीन माह का समय दे दिया गया। ये ही वह घटनाक्रम है, जहां से किसान राजनीति के महानायक का उदय हो गया। बिजली की दिक्कतें सरकार खत्म नहीं कर पाई।

चौधरी टिकैत की हुंकार पर एक मार्च, 1987 को करमूखेड़ी में ही प्रदर्शन को गए किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने फायरिंग कर दी, जिसमें किसान जयपाल सिंह और अकबर शहीद हो गए थे। चौधरी टिकैत की आवाज पर लाखों किसान जुटने लगे। भाकियू का असर इतना दमदार हो गया कि तत्कालीन यूपी के सीएम वीर बहादुर सिंह को करमूखेड़ी की घटना पर अफसोस दर्ज कराने के लिए 11 अगस्त को सिसौली आना पड़ा था।
 


मेरठ कमिश्नरी पर वर्ष 1988 में उनके घेराव और धरने ने उन्हें राष्ट्रीय सुर्खियां दी। रजबपुर, मुरादाबाद सत्याग्रह के बाद नई दिल्ली के वोट क्लब पर हुई किसान पंचायत में किसानों के राष्ट्रीय मुद्दे उठाए गए और 14 राज्यों के किसान नेताओं ने चौधरी टिकैत की नेतृत्व क्षमता में विश्वास जताया। अलीगढ़ के खैर में पुलिस अत्याचार के खिलाफ आंदोलन और भोपा में नईमा अपहरण कांड को लेकर चले ऐतिहासिक धरने से भाकियू एक शक्तिशाली अराजनैतिक संगठन बन गया।

अपनी सादगी और ठेठ देहाती अंदाज को उन्होंने कभी खुद से जुदा नहीं किया। एक राह के मुसाफिर होने की वजह से उन्हें किसानों ने महात्मा टिकैत और बाबा टिकैत नाम दिया। ढाई दशक तक चले किसानों के संघर्ष में जीवन की आहुति दे गए चौधरी टिकैत ने देश के किसान आंदोलनों को मजबूत बनाने में जो भूमिका निभाई, वैसे ही किरदार की दरकार आज भी है।

खादी का कुर्ता और धोती रहा ताउम्र पहनावा
सिसौली (मुजफ्फरनगर)। साढ़े तीन मीटर का खादी का कुर्ता और साढ़े पांच मीटर की सूती धोती का पहनावा ही ताउम्र चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान रहा। 15 साल की उम्र से उनके कुर्ता सिलने का जो नाता जुड़ा, वह अंत तक बना रहा। चौधरी टिकैत की अनछुई बातों का जिक्र करते हुए बुजुर्ग दर्जी जगबीर कौशिक कहते है कि जब से बाबा टिकैत का निधन हुआ है। उसने कुर्ते सिलना छोड़ दिया है।

सिसौली कसबे के मोहल्ला लेपरान में दर्जी मोटा पंडित की दुकान जानी पहचानी है। 83 साल के बुजुर्ग जगबीर कौशिक सिलाई मशीन से भाकियू की टोपी और झंडे बना रहे हैं। चौधरी टिकैत के बचपन के साथियों में उनकी गिनती है। स्मृति दिवस पर अमर उजाला ने भाकियू संस्थापक के जीवन की अनसुनी और अनकही बातों को कुरेदा तो उनके जीवन की सादगी का पहलू सामने आया।
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कई पीढ़िय़ों से कसबे में दर्जी का काम करने वाले कौशिक बताते है कि किसान राजनीति के शिखर पर मुकाम पाने के बावजूद भी चौधरी टिकैत ने अपनी वेशभूषा, आहार और व्यवहार नहीं बदला। उनकी उम्र तब 15 की थी, जब वह पहली बार कपड़े सिलवाने आए थे। खोखली बांह का कंठीदार कुर्ता और टोपी सिलवाते थे। 14 मीटर की खादी की दोहर उनके कंधे पर रहती थी। देश-विदेश में कहीं भी किसान आंदोलनों में गए, मगर किसान की सादगी की पहचान बनाए रखी।

कसबे के इंदर रहतू की दुकान से वह खादी खरीदते थे। भाकियू का रणसिंघा जब भी बजता, वह भी किसानों के कारवां में शामिल हो जाते थे। मित्रता का लगाव इतना बना कि किसान आंदोलन में जब भी जाते, मैं पहले से बैग में एक नया कुर्ता लेकर चलता था। हैदराबाद में प्रदर्शन के दौरान चौधरी टिकैत का कुर्ता फट गया। बोले, पंडित जी अब क्या होगा? मैने बैग से कुर्ता निकाला और पहनवा दिया। जिंदगी की अंतिम सांस तक उनका साथ बना रहा।

वर्ष 2011 में अस्वस्थ हो गए और बिना कुर्ते के खाट पर आंगन में बैठे थे। कुर्ता पहनने पर गर्मी की दिक्कत बताई, तो मैने तुरंत उनके लिए खादी के दो बनियान बनाए। उन्हें पहन कर चौधरी टिकैत ने आराम महसूस किया। उनके जाने के बाद हमने भी कुर्ता सिलना छोड़ दिया है। उम्र भी बढ़ गई है। अब तो बस भाकियू की टोपी और झंडे बनाने का काम कर लेता हूं। पत्नी बलवंती देवी की मदद से दर्जी के काम में मशगूल रहता हूं। बेटे कपड़े सिलाई का काम नहीं करते, वे सब नौकरीपेशा है।

सिलाई के कभी नहीं लिए पैसे
दर्जी जगबीर कौशिक ने चौधरी टिकैत से कभी कुर्ता सिलने के पैसे नहीं लिए। कहते हैं कि उनका जीवन किसानों की सेवा में बीता, ऐसे में हमें भी फख्र होता है। उनकी बदौलत सिसौली किसानों की राजधानी बनी। सादा देहाती खाना उन्हें पसंद था। बिना भेदभाव के सभी से भाईचारा रखते थे। मक्का की रोटी, साग, कढ़ी और शक्कर-चावल उनके पसंदीदा भोजन था।

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