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लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई
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मुजफ्फरनगर। ये जब्र भी देखे हैं तारीख की नर्जों ने
लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।
मुजफ्फरनगर में जन्में मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी का यह शेर बड़ी सीख देता है, लेकिन उनके ही जिले के लोग उस मर्म को नहीं समझ पाए। रज्मी के निधन के ठीक एक साल बाद ही हुए कवाल कांड के बाद आपसी सौहार्द छिन्न-भिन्न हो गया। कुछ सियासी लोगों ने इसका फायदा उठाया, लेकिन बहुत से घर बर्बाद हो गए। दो घरों के चिराग बुझ गए और तीन घरों का भविष्य सलाखों में कैद हो गया।
27 अगस्त 2013 को कवाल में जो कुछ भी हुआ वह मात्र 25 मिनट में निपट गया, लेकिन उसका दर्द सैकड़ों परिवारों के लिए नासूर बन गया। घटना में आठ भाइयों में दूसरे नंबर के शाहनवाज की मौत हो गई थी, जबकि उसके बड़े भाई जहांगीर और तीसरे नंबर के नदीम को सचिन और गौरव की हत्या में जीवन भर जेल में रहना होगा। छोटा भाई शादाब बताता है कि जहांगीर की शादी घटना के छह माह पहले ही हुई थी। परिवार पूरी तरह टूट चुका है। मुजस्सिम और मुजम्मिल भी आपस में सगे भाई हैं। दोनों जेल चले गए। मुजम्मिल दिव्यांग है। मुजस्सिम के तीन छोटे बच्चे हैं। अफजाल और इकबाल पुत्रगण बुंदू की भी हालत ऐसी ही है। अफजाल के छह बच्चे हैं जबकि इकबाल की तीन बेटियां हैं। परिवार में अन्य भाई हैं जो अपने कामधाम में लगे हैं। फुरकान के भी तीन लड़के हैं। बड़े पुत्र की उम्र करीब 14 साल है। तीन भाइयों में सबसे बड़े फुरकान को भी ताउम्र जेल में रहना होगा। बेटों के जेल जाने से परिवार पूरी तरह टूट गए हैं। उधर गौरव और सचिन के परिजनों का भी बुरा हाल है।
दुख में चल बसी शाहनवाज की मां
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड में मारे गए शाहनवाज के सात भाई और पांच बहनें हैं। इनमें से केवल तीन की शादी हुई है। एक बेटे की मौत और दो बेटों के जेल जाने के गम में मां इमराना की दो साल पहले मौत हो गई। छोटा बेटा शादाब बताता है कि मां घटना के बाद से गम में रहती थी।
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यहीं नहीं रुकी थी बर्बादी की दास्तां
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड में केवल इससे जुड़े घरों को ही बर्बाद नहीं किया, बल्कि इसके बाद फैली सांप्रदायिक आग में हजारों घर होम हो गए। दंगे में 65 से ज्यादा मौतें हुईं थी। 550 मुकदमे दर्ज हुए। इनमें करीब छह हजार लोगों को नामजद किया गया। 1480 गिरफ्तारियां तुरंत कर ली गईं थी। गिरफ्तार हुए लोगों के परिवार कोर्ट के चक्कर काटने को मजबूर हैं। हजारों परिवारों को लंबे समय तक शरणार्थी की तरह जीवन बिताना पड़ा था। अभी शाहनवाज की हत्या का मामला भी न्यायालय में विचाराधीन है। इसमें सचिन और गौरव के परिवार के लोगों के गैर जमानती वारंट जारी हैं।
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लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।
मुजफ्फरनगर में जन्में मशहूर शायर मुजफ्फर रज्मी का यह शेर बड़ी सीख देता है, लेकिन उनके ही जिले के लोग उस मर्म को नहीं समझ पाए। रज्मी के निधन के ठीक एक साल बाद ही हुए कवाल कांड के बाद आपसी सौहार्द छिन्न-भिन्न हो गया। कुछ सियासी लोगों ने इसका फायदा उठाया, लेकिन बहुत से घर बर्बाद हो गए। दो घरों के चिराग बुझ गए और तीन घरों का भविष्य सलाखों में कैद हो गया।
27 अगस्त 2013 को कवाल में जो कुछ भी हुआ वह मात्र 25 मिनट में निपट गया, लेकिन उसका दर्द सैकड़ों परिवारों के लिए नासूर बन गया। घटना में आठ भाइयों में दूसरे नंबर के शाहनवाज की मौत हो गई थी, जबकि उसके बड़े भाई जहांगीर और तीसरे नंबर के नदीम को सचिन और गौरव की हत्या में जीवन भर जेल में रहना होगा। छोटा भाई शादाब बताता है कि जहांगीर की शादी घटना के छह माह पहले ही हुई थी। परिवार पूरी तरह टूट चुका है। मुजस्सिम और मुजम्मिल भी आपस में सगे भाई हैं। दोनों जेल चले गए। मुजम्मिल दिव्यांग है। मुजस्सिम के तीन छोटे बच्चे हैं। अफजाल और इकबाल पुत्रगण बुंदू की भी हालत ऐसी ही है। अफजाल के छह बच्चे हैं जबकि इकबाल की तीन बेटियां हैं। परिवार में अन्य भाई हैं जो अपने कामधाम में लगे हैं। फुरकान के भी तीन लड़के हैं। बड़े पुत्र की उम्र करीब 14 साल है। तीन भाइयों में सबसे बड़े फुरकान को भी ताउम्र जेल में रहना होगा। बेटों के जेल जाने से परिवार पूरी तरह टूट गए हैं। उधर गौरव और सचिन के परिजनों का भी बुरा हाल है।
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दुख में चल बसी शाहनवाज की मां
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड में मारे गए शाहनवाज के सात भाई और पांच बहनें हैं। इनमें से केवल तीन की शादी हुई है। एक बेटे की मौत और दो बेटों के जेल जाने के गम में मां इमराना की दो साल पहले मौत हो गई। छोटा बेटा शादाब बताता है कि मां घटना के बाद से गम में रहती थी।
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यहीं नहीं रुकी थी बर्बादी की दास्तां
मुजफ्फरनगर। कवाल कांड में केवल इससे जुड़े घरों को ही बर्बाद नहीं किया, बल्कि इसके बाद फैली सांप्रदायिक आग में हजारों घर होम हो गए। दंगे में 65 से ज्यादा मौतें हुईं थी। 550 मुकदमे दर्ज हुए। इनमें करीब छह हजार लोगों को नामजद किया गया। 1480 गिरफ्तारियां तुरंत कर ली गईं थी। गिरफ्तार हुए लोगों के परिवार कोर्ट के चक्कर काटने को मजबूर हैं। हजारों परिवारों को लंबे समय तक शरणार्थी की तरह जीवन बिताना पड़ा था। अभी शाहनवाज की हत्या का मामला भी न्यायालय में विचाराधीन है। इसमें सचिन और गौरव के परिवार के लोगों के गैर जमानती वारंट जारी हैं।