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गए थे रोजी-रोटी की तलाश में, मिली मौत

Fri, 13 Sep 2013 12:02 AM IST
अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Updated Fri, 13 Sep 2013 12:02 AM IST
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muzaffarnagar riots pain of victims

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगे के शिकार बने ज्यादातर लोग किसान, मजदूर और गरीब तबके के थे।

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हिंसा वाले दिन ये बेकसूर लोग अपनी रोजी-रोटी की तलाश में निकले थे, लेकिन वापस घर नहीं लौट पाए। किसी की लाश सड़क किनारे मिली तो किसी के शव नहर और खेतों में मिले।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मुजफ्फरनगर और शामली में भड़की हिंसा 50 से अधिक लोगों की जान ले चुकी है। 38 की शिनाख्त हो चुकी है, जबकि 12 शवों की पहचान अभी नहीं हो पाई है।
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कृष्णापुरी में मारा गया दामोदर आरटीओ कार्यालय पर छोले चावल की रेहड़ी लगाता था। राजबीर किसान था। सारिक फल विक्रेता था।

गंगोह का मोहम्मद सादिक रसपीस फैक्ट्री में ड्राइवर था। खेड़ी तगान के नवाब, शाहिद दूध बेचने का काम करते थे।

कासमपुर पठेड़ी का ऋषिपाल किसान था। बहसूमा का जोगेंद्र मजदूर तो कांधला का इसरार फोटोग्राफर थे। सुशील आटा चक्की चला कर अपने परिवार का पालन पोषण करता था। शाहपुर का वृद्ध अंबरीश भी किसान था।
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कुटबा की वृद्धा हसीना और शाहपुर की बूढ़ी खातून ने भला किसी क्या छिना था। सरकारी मदद मिलेगी तब मिलेगी, लेकिन अपनों के खोने का गम लोगों को जिंदगी भर सालता रहेगा।

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