Ram Mandir: मुरादाबाद से उठी आवाज से बने राम के काज, पूर्व मंत्री खन्ना ने इंदिरा गांधी को लिखी थी चिट्ठी
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति की आवाज पहली बार मुरादाबाद में उठी थी। इसके समर्थन में यूपी के स्वास्थ्य मंत्री दाऊदयाल खन्ना ने खुले मंच से वकालत की थी। इसके साथ ही उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पत्र लिखा था। इसमें अयोध्या के साथ मथुरा और काशी हिंदुओं को सौंपने पर जोर दिया था।
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अयोध्या और राम...इन दिनों हर तरफ, हर किसी के बीच यही दो शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहे हैं। भव्य राममंदिर में 22 जनवरी के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर हर शहर में जबरदस्त हलचल है। इस राममय माहौल के बनने में मुरादाबाद का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति की मजबूती के साथ पहली आवाज मुरादाबाद से ही उठी थी।
1962 से 1967 तक यूपी के स्वास्थ्य मंत्री रहे मुरादाबाद निवासी दाऊदयाल खन्ना ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति के लिए न सिर्फ खुले मंचों से वकालत की बल्कि इस आजीवन कांग्रेसी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इस बाबत पत्र भी लिखा था। पत्र में उन्होंने अयोध्या के साथ मथुरा और काशी हिंदुओं को सौंपने पर जोर दिया था।
आजीवन कांग्रेसी की जुबान और कलम से श्रीराम जन्मभूमि की बात को उस वक्त कुछ लोगों ने सवालिया निगाहों से देखा था। आज भी तमाम लोग इस सवाल का जवाब तलाशते नजर आते हैं। इसका जवाब मिलता है एमएलसी एवं भाजपा नेता डॉ. जयपाल सिंह व्यस्त से। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से शुरुआती दौर से जुड़े रहे डॉ. व्यस्त बताते हैं कि खन्ना जी मुिस्लमों के करीबी थे।
सांप्रदायिक सौहार्द के पक्षधर थे लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की सरकारी की नीतियां उन्हें नहीं सुहाती थीं। डॉ. व्यस्त के अनुसार मुरादाबाद में सन 80 के दंगे और उस समय सरकार के रवैये नेे उनको हिंदू धर्मस्थलों की रक्षा के प्रति मुखर किया। संयोग से उस वक्त मुरादाबाद के आरएसएस के विभाग प्रचारक रहे दिनेश चंद्र त्यागी और खन्ना जी की नजदीकी ने पीतलनगरी को राम नाम के पावन काम का प्लेटफॉर्म बना दिया।
1981 में मीनाक्षीपुरम में धर्म परिवर्तन की बड़ी घटना ने राम के माध्यम से हिंदुत्व की बात को और मजबूती दी। मुरादाबाद से तय हुई योजना के आधार पर अमरोहा, लखीमपुर, शाहजहांपुर समेत यूपी के कई शहरों में इस मुद्दे पर सम्मेलन हुए। 1982 में काशीपुर (वर्तमान में उत्तराखंड, तब यूपी) में बड़ा हिंदू सम्मेलन हुआ। इसमें मीनाक्षीपुरम प्रकरण के हवाले से हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार की कड़ी आलोचना की गई। समय के साथ आवाज मजबूत होती गई। लोग जुड़ते गए और श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति के विषय ने विशाल आंदोलन का रूप से लिया।
इंदिरा जी को लिखा...आपकी भगवान में बहुत आस्था है
डॉ. ओंकारनाथ खन्ना ने बताया कि पिता जी ने 23 मई 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा था। पत्र में कहा था-आपकी तो भगवान में बहुत आस्था है। भारत में दौरा करते समय जहां भी कोई प्रसिद्ध मंदिर होता है, आप उसमें पूजा अर्चना करती हैं। आप जैसी धार्मिक प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के तीनों धर्मस्थान (अयोध्या, मथुरा और काशी) को हिंदुओ को सौंप कर ऐतिहासिक और धार्मिक कार्य करती हैं तो यह भगवान की सच्ची सेवा होगी। बदले में नई मस्जिदें मुसलमान भाइयों को भेंट किए जाने से तमाम देश में हिंदू और मुसलमानों में भावनात्मक एकता कायम होगी। भारत में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी।
हिंदू धर्मस्थल रक्षा समिति के संयोजक थे खन्ना
दाऊदयाल खन्ना के बेटे रिटायर्ड सीएमओ डॉ. ओंकारनाथ खन्ना ने बताया कि 06 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में हिंदू जागरण मंच का विशाल सम्मेलन हुआ था। इसमें श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा, काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी को हिंदू समाज को सौंपने की मांग का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ।
इस मौके पर हिंदू धर्मस्थल रक्षा समिति का भी गठन किया गया। इसका संयोजक पिता जी को बनाया गया। इसके कुछ समय बाद दिल्ली में ऐतिहासिक धर्म संसद हुई। इसमें भी इन तीनों स्थलों की मुक्ति के लिए संघर्ष का आह्वान किया गया। इसके बाद 1984 से विश्व हिंदू परिषद मुक्ति आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गई। अशोक सिंघल ने पिता जी और उन जैसी सोच के अन्य लोगों के साथ इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।
खन्ना परिवार को प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण मिला
22 जनवरी के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने के लिए दाऊदयाल खन्ना के पुत्र डॉ. ओंकारनाथ खन्ना को भी अयोध्या से निमंत्रण पत्र आया है। विहिप के कुछ पदाधिकारी इसे लेकर उनके कांठ रोड स्थित आवास पर पहुंचे। डॉ. खन्ना के विदेश में होने के कारण यह निमंत्रण पत्र दाऊदयाल खन्ना के पोते अंबुज खन्ना ने प्राप्त किया। डॉ. खन्ना ने इसे हर्ष और सौभाग्य का अवसर बताया है।