{"_id":"5d4893348ebc3e6cb025cdf1","slug":"jammu-kashmir-city-news-mbd3176466143","type":"story","status":"publish","title_hn":"सालता है कश्मीर का घर छोड़ना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सालता है कश्मीर का घर छोड़ना
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मुरादाबाद। राज्यसभा में अनुच्छेद 370 को संशोधित करने के संकल्प पत्र के साथ पूरा देश खुशियों में डूब गया। सबसे ज्यादा खुशी कश्मीर के मूल निवासियों को हो रही है, जो अपनी चौखट को छोड़कर वर्षों से दूसरे स्थानों पर रह रहे हैं। उनका कहना है कि अब भले ही वह दूसरी जगह अपनी दुनिया बसा चुके हों, लेकिन घर छूटने का दर्द हर पल सालता है।
पर्यटन को करना होगा जिंदा
आशियाना निवासी सुशील धर का कहना है कि वह पढ़ाई के लिए पहले ही घर से आ गए थे। पिता मोहनलाल धर का लाल चौक से चार किलोमीटर आगे रैनाबारी बाग जौगीलंकर में घर था और कश्मीर में कालीन और शॉल का व्यापार था। लेकिन वर्ष 1985 में वहां के हालात खराब होने लगे थे। इसके बाद उन्हें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा। ताऊ और बुआ को भी विस्थापित होना पड़ा। बुआ की दो बेटियों का घर श्रीनगर के इंद्रा नगर में घर है। वहां पर बीएसएफ का कब्जा होने की वजह से वह घर बच गया है। अभी जून में वहां पर एक दिन रुककर आया हूं। दोनों बहनें भी दो-तीन महीने वहीं रहती हैं। उसी घर में बीएसएफ के जवान भी रहते हैं। उस घर में जाते ही आत्मिक सुकून मिलता है। वहां पर वापसी अभी आसान नहीं है। दूसरे समुदाय के लोगों के लिए ही बहुत परेशानी है। हैंडीक्राफ्ट और कालीन का काम खत्म हो चुका है। यदि हम भी पहुंच जाएंगे तो मुश्किल होगा। सरकार को खुशहाली लानी है तो पहले पर्यटन को जिंदा करना होगा। इसके बाद कश्मीरी पंडितों को नौकरी भी देनी होगी।
ताऊ व उनके बेटों को किया था विस्थापित
जवाहर नगर गांधी नगर निवासी रवि कौल ने कहा कि उनके पिता वर्ष 1960 में मुरादाबाद आ गए थे। वर्ष 1982 में मेरी शादी भी श्रीनगर में हुई थी, लेकिन समस्या 1990 में शुरू हुई, जबकि ताऊ एलएन कौल और उनके बेटे विजय कौल को विस्थापित किया गया था। मस्जिदों से उन्हें घर छोड़ने के निर्देश दिए जाते थे। श्रीनगर के हब्बा कदल स्थित घर के दरवाजे पर नोटिस (हिट लिस्ट) चिपका दिए गए थे। ताऊजी डॉक्टर थे, लेकिन अपनी प्रैक्टिस छोड़नी पड़ी थी। भाई सिल्क विभाग में नौकरी के अलावा अपना व्यापार भी करते थे। सबकुछ वहीं का वहीं रह गया था। अब वहां कोई रिश्तेदार भी नहीं बचा। फैसला सराहनीय है, लेकिन कुछ देर हो गई है। ताऊजी और उनके बेटे जिंदा होते तो बहुत खुश होते। अब हम वहां रहने नहीं जाएंगे, लेकिन ताऊजी होते तो जरूर जाते।
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एक मां को अपना बच्चा वापस मिल गया
रामगंगा विहार निवासी अंजलि कौल विस्थापन के पल को याद कर सिहर जाती है। कहती हैं कि श्रीनगर में एग्जिबीशन रोड पर मम्मी-पापा, भाई-बहनों के साथ रहती थी। 19 जनवरी 1991 को उन्हें वहां से निकाला गया था। अलगाववादी लाउडस्पीकर पर घोषणा कर रहे थे कि कश्मीर छोड़ दीजिए। पुरुष चले जाइए, महिलाओं को छोड़ जाइए। घर और सामान छोड़ दिया। खूब खून-खराबा हो रहा था। वहां से जम्मू शिविर में आ गए थे। अपने ही देश में शरणार्थी हो गए थे। जिसने 30 डिग्री सेल्सियस तापमान नहीं देखा था, वह 40 डिग्री सेल्सियस में रहे। दो बार टूरिस्ट की तरह गए हैं। घरके सामने खड़े होकर देख रही थी और आंखों से आंसू बह रहे थे। बचपन गुजरा था। तब कोई नेता सामने नहीं आया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से मुमकिन हो गया। जो राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं, उनके परिवार विदेश में है। अपनी औलादों का भविष्य बनाकर दूसरों को अंधेरे में धकेल रहे हैं। अब अपने घर पर हक जता सकते हैं। आज दोबारा से आजादी देख ली। मानो एक मां को अपना बच्चा वापस मिल गया।
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पर्यटन को करना होगा जिंदा
आशियाना निवासी सुशील धर का कहना है कि वह पढ़ाई के लिए पहले ही घर से आ गए थे। पिता मोहनलाल धर का लाल चौक से चार किलोमीटर आगे रैनाबारी बाग जौगीलंकर में घर था और कश्मीर में कालीन और शॉल का व्यापार था। लेकिन वर्ष 1985 में वहां के हालात खराब होने लगे थे। इसके बाद उन्हें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा। ताऊ और बुआ को भी विस्थापित होना पड़ा। बुआ की दो बेटियों का घर श्रीनगर के इंद्रा नगर में घर है। वहां पर बीएसएफ का कब्जा होने की वजह से वह घर बच गया है। अभी जून में वहां पर एक दिन रुककर आया हूं। दोनों बहनें भी दो-तीन महीने वहीं रहती हैं। उसी घर में बीएसएफ के जवान भी रहते हैं। उस घर में जाते ही आत्मिक सुकून मिलता है। वहां पर वापसी अभी आसान नहीं है। दूसरे समुदाय के लोगों के लिए ही बहुत परेशानी है। हैंडीक्राफ्ट और कालीन का काम खत्म हो चुका है। यदि हम भी पहुंच जाएंगे तो मुश्किल होगा। सरकार को खुशहाली लानी है तो पहले पर्यटन को जिंदा करना होगा। इसके बाद कश्मीरी पंडितों को नौकरी भी देनी होगी।
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ताऊ व उनके बेटों को किया था विस्थापित
जवाहर नगर गांधी नगर निवासी रवि कौल ने कहा कि उनके पिता वर्ष 1960 में मुरादाबाद आ गए थे। वर्ष 1982 में मेरी शादी भी श्रीनगर में हुई थी, लेकिन समस्या 1990 में शुरू हुई, जबकि ताऊ एलएन कौल और उनके बेटे विजय कौल को विस्थापित किया गया था। मस्जिदों से उन्हें घर छोड़ने के निर्देश दिए जाते थे। श्रीनगर के हब्बा कदल स्थित घर के दरवाजे पर नोटिस (हिट लिस्ट) चिपका दिए गए थे। ताऊजी डॉक्टर थे, लेकिन अपनी प्रैक्टिस छोड़नी पड़ी थी। भाई सिल्क विभाग में नौकरी के अलावा अपना व्यापार भी करते थे। सबकुछ वहीं का वहीं रह गया था। अब वहां कोई रिश्तेदार भी नहीं बचा। फैसला सराहनीय है, लेकिन कुछ देर हो गई है। ताऊजी और उनके बेटे जिंदा होते तो बहुत खुश होते। अब हम वहां रहने नहीं जाएंगे, लेकिन ताऊजी होते तो जरूर जाते।
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एक मां को अपना बच्चा वापस मिल गया
रामगंगा विहार निवासी अंजलि कौल विस्थापन के पल को याद कर सिहर जाती है। कहती हैं कि श्रीनगर में एग्जिबीशन रोड पर मम्मी-पापा, भाई-बहनों के साथ रहती थी। 19 जनवरी 1991 को उन्हें वहां से निकाला गया था। अलगाववादी लाउडस्पीकर पर घोषणा कर रहे थे कि कश्मीर छोड़ दीजिए। पुरुष चले जाइए, महिलाओं को छोड़ जाइए। घर और सामान छोड़ दिया। खूब खून-खराबा हो रहा था। वहां से जम्मू शिविर में आ गए थे। अपने ही देश में शरणार्थी हो गए थे। जिसने 30 डिग्री सेल्सियस तापमान नहीं देखा था, वह 40 डिग्री सेल्सियस में रहे। दो बार टूरिस्ट की तरह गए हैं। घरके सामने खड़े होकर देख रही थी और आंखों से आंसू बह रहे थे। बचपन गुजरा था। तब कोई नेता सामने नहीं आया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से मुमकिन हो गया। जो राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं, उनके परिवार विदेश में है। अपनी औलादों का भविष्य बनाकर दूसरों को अंधेरे में धकेल रहे हैं। अब अपने घर पर हक जता सकते हैं। आज दोबारा से आजादी देख ली। मानो एक मां को अपना बच्चा वापस मिल गया।