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फर्श से अर्श और फिर मौत तक का सफर
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Mon, 06 Feb 2017 03:12 AM IST
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omveer singh
- फोटो : फाइल चित्र
एक छोटे से गांव से आकर ओमवीर - प्रेमवीर ने एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में एंट्री की और रातोंरात इंडस्ट्री के शिखर तक जा पहुंचे। लेकिन एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के टॉप से उनके पैर ऐसे फिसले कि सीधा नीचे आकर गिरे।
करीब दस सालों तक इंडस्ट्री के टॉप पर रहने वाले ओमवीर सिंह पिछले दस सालों से कर्ज में दबे थे। इस दौरान उनकी फैक्ट्री बिक गई, तमाम प्रापर्टी बैंकों ने नीलाम कर दीं। लेकिन ओमवीर वापस इंडस्ट्री में अपनी जगह नहीं बना सके।
मूंढापांडे के छोटे से गांव जगर से आकर मुरादाबाद में बसे ओमवीर सिंह और उनके छोटे भाई प्रेम वीर सिंह ने पीतल कारोबार में अपनी किस्मत अजमाई। दोनों भाइयों ने दिन रात मेहनत की और लाकड़ी फाजलपुर में अपनी - अपनी फैक्ट्रियां बना कर खड़ी की।
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ओमवीर की एए इंटरनेशनल और प्रेमवीर की आरआर इंटरनेशनल का किसी वक्त निर्यात की दुनिया में बड़ा नाम था। दोनों भाइयों की गिनती शहर के टॉप निर्यातकों में होती थी। लेकिन ड्रा बैक की कुछ गड़बड़ियों और एक्सपोर्ट को जा रहे इनके कंटेनर में कुछ गड़बड़ियों ने पूरे खेल को पलट दिया।
करीब दस साल पहले ओमवीर सिंह को निर्यात में बड़ा घाटा हुआ। इसके बाद वह उबर नहीं पाए। ओमवीर कर्ज में इस कदर दब गए कि चाहकर भी उबर नहीं सके। पहले उनकी फैक्ट्री बंद हुई और फिर ओमवीर को कर्ज उतारने के लिए फैक्ट्री बेचनी पड़ी। शहर में अलग - अलग हिस्सों में स्थित उनकी कई संपत्तियों को बैंकों ने नीलाम कर दिया।
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करीब दस सालों तक इंडस्ट्री के टॉप पर रहने वाले ओमवीर सिंह पिछले दस सालों से कर्ज में दबे थे। इस दौरान उनकी फैक्ट्री बिक गई, तमाम प्रापर्टी बैंकों ने नीलाम कर दीं। लेकिन ओमवीर वापस इंडस्ट्री में अपनी जगह नहीं बना सके।
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मूंढापांडे के छोटे से गांव जगर से आकर मुरादाबाद में बसे ओमवीर सिंह और उनके छोटे भाई प्रेम वीर सिंह ने पीतल कारोबार में अपनी किस्मत अजमाई। दोनों भाइयों ने दिन रात मेहनत की और लाकड़ी फाजलपुर में अपनी - अपनी फैक्ट्रियां बना कर खड़ी की।
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ओमवीर की एए इंटरनेशनल और प्रेमवीर की आरआर इंटरनेशनल का किसी वक्त निर्यात की दुनिया में बड़ा नाम था। दोनों भाइयों की गिनती शहर के टॉप निर्यातकों में होती थी। लेकिन ड्रा बैक की कुछ गड़बड़ियों और एक्सपोर्ट को जा रहे इनके कंटेनर में कुछ गड़बड़ियों ने पूरे खेल को पलट दिया।
करीब दस साल पहले ओमवीर सिंह को निर्यात में बड़ा घाटा हुआ। इसके बाद वह उबर नहीं पाए। ओमवीर कर्ज में इस कदर दब गए कि चाहकर भी उबर नहीं सके। पहले उनकी फैक्ट्री बंद हुई और फिर ओमवीर को कर्ज उतारने के लिए फैक्ट्री बेचनी पड़ी। शहर में अलग - अलग हिस्सों में स्थित उनकी कई संपत्तियों को बैंकों ने नीलाम कर दिया।