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यहां तो बच्चा पढ़ाई छोड़ स्क्रैप तोलता है
ब्यूरो/अमर उजाला/मुरादाबाद
Updated Fri, 10 Mar 2017 02:37 AM IST
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- फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
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देश के भविष्य को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकारें विभिन्न योजनाएं और अभियान चलाती रही हैं। हर वर्ग के बच्चों को शिक्षा मिल सके इसके लिए सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मिल, स्कूल चलें हम जैसे तमाम अभियान व स्लोग के माध्यमों से हर वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का काम किया।
इसी के परिणाम स्वरूप नगर क्षेत्र में 2010 में 106 स्कूलाें में छात्र संख्या 15000 के करीब थी। लेकिन दो अधिकारियों के तुगलकी फरमान ने ऐसा कहर ढाया कि आज स्कूलों में छात्र संख्या आधी रह गई है।
2011 के तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी और बीएसए ने मिलकर नगर क्षेत्र के 24 स्कूलों को बंद कर दिया। इन अधिकारियों ने बिना किसी नए आदेश के 1987 का एक जीओ निकाला जिसके अनुसार उन दो स्कूलों जो एक छत के नीचे चलते हैं और उनकी छात्र संख्या सौ से कम है तो उनमें से एक को बंद कर दसरे में मर्ज करना था।
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हैरत की बात है कि 2011 में या इससे पहले इस जीओ को लागू करने के कोई आदेश नहीं हुए थे। अधिकारियों ने अपनी मर्जी से जीओ का हवाला देकर स्कूल तो बंद किए ही साथ ही नियमों का उल्लंघन भी किया। जिन 24 स्कूलों को बंद किया गया, उनकी छात्र संख्या सौ से कहीं अधिक थी।
इन्होंने 300 छात्र संख्या वाले स्कूल भी बंद कर दिए। कुल मिलाकर 24 स्कूल जो बंद करने के मानक में नहीं आते थे उन्हें भी बंद कर दिया। इसका खामियाजा यह हुआ कि इन स्कूलों में पालियों में पढ़ने वाले कामगारों, मजदूरों के बच्चों ने पढ़ना छोड़ दिया।
बच्चे अपनी सहूलियत के अनुसार पालियों का चयन करते थे और पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे। लेकिन स्कूल बंद होने से पढ़ाई एक ही पाली में होने लगी और छात्रों को मजबूरन स्कूल छोड़ना पड़ा। यानी सिस्टम में जमे अधिकारियों और सरकारी नुमाइंदों का काम बोलता है!
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इसी के परिणाम स्वरूप नगर क्षेत्र में 2010 में 106 स्कूलाें में छात्र संख्या 15000 के करीब थी। लेकिन दो अधिकारियों के तुगलकी फरमान ने ऐसा कहर ढाया कि आज स्कूलों में छात्र संख्या आधी रह गई है।
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2011 के तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी और बीएसए ने मिलकर नगर क्षेत्र के 24 स्कूलों को बंद कर दिया। इन अधिकारियों ने बिना किसी नए आदेश के 1987 का एक जीओ निकाला जिसके अनुसार उन दो स्कूलों जो एक छत के नीचे चलते हैं और उनकी छात्र संख्या सौ से कम है तो उनमें से एक को बंद कर दसरे में मर्ज करना था।
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हैरत की बात है कि 2011 में या इससे पहले इस जीओ को लागू करने के कोई आदेश नहीं हुए थे। अधिकारियों ने अपनी मर्जी से जीओ का हवाला देकर स्कूल तो बंद किए ही साथ ही नियमों का उल्लंघन भी किया। जिन 24 स्कूलों को बंद किया गया, उनकी छात्र संख्या सौ से कहीं अधिक थी।
इन्होंने 300 छात्र संख्या वाले स्कूल भी बंद कर दिए। कुल मिलाकर 24 स्कूल जो बंद करने के मानक में नहीं आते थे उन्हें भी बंद कर दिया। इसका खामियाजा यह हुआ कि इन स्कूलों में पालियों में पढ़ने वाले कामगारों, मजदूरों के बच्चों ने पढ़ना छोड़ दिया।
बच्चे अपनी सहूलियत के अनुसार पालियों का चयन करते थे और पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे। लेकिन स्कूल बंद होने से पढ़ाई एक ही पाली में होने लगी और छात्रों को मजबूरन स्कूल छोड़ना पड़ा। यानी सिस्टम में जमे अधिकारियों और सरकारी नुमाइंदों का काम बोलता है!