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शीतलहर में 40 किलोमीटर पैदलकर चलकर पहुंचे कैफे
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मुरादाबाद। चंदौसी के रजत जोहान ने बताया कि वह लवीव शहर में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र हैं। उनके साथ सहारनपुर निवासी पारस सिंह भी है।
उन्होंने बताया कि पॉलेंड बॉर्डर पर भारतीयों को वीजा नहीं दिया जा रहा है। वहां पर पहले नाइजिरिया और इजिप्टिशियन और यूक्रेन के स्थानीय लोगों को वीजा दे रहे हैं। दोनों छात्र अंबेसी के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे छात्रावास से निकले थे, लेकिन बॉर्डर से पहले ही जाम लगा हुआ है। ठंडी तेज हवा के बीच सामान को खींचते हुए वह पैदल ही बॉर्डर के लिए निकले। 40 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वह एक कैफे में पहुंचे। कड़ाके की ठंड की वजह से हाथ और पैर यहां से भी बॉर्डर 12 किलोमीटर दूर रहे है। कैफे की संचालिका ने उन्हें खाना खिलाया। जब उन्होंने रुपये देना चाहा तो महिला ने रुपये नहीं लिए।
रात उन्होंने कैफे में बैठकर ठिठुरते हुए बिताई। सुबह छह बजे दिन का खाना देने के बाद महिला उन्हें वहीं पास में एक स्कूल में बने शेल्टर होम में पहुंचा गई। उन्होंने बताया कि दस छात्रों का ग्रुप है। हालात बहुत खराब हो रहे हैं। बॉर्डर से उन्हें कब और कैसे फ्लाइट मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। उनके पास अभी खाने के लिए जूस के पैकेट, चिप्स और बिस्किट हैं।
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उन्होंने बताया कि पॉलेंड बॉर्डर पर भारतीयों को वीजा नहीं दिया जा रहा है। वहां पर पहले नाइजिरिया और इजिप्टिशियन और यूक्रेन के स्थानीय लोगों को वीजा दे रहे हैं। दोनों छात्र अंबेसी के निर्देश पर शुक्रवार शाम चार बजे छात्रावास से निकले थे, लेकिन बॉर्डर से पहले ही जाम लगा हुआ है। ठंडी तेज हवा के बीच सामान को खींचते हुए वह पैदल ही बॉर्डर के लिए निकले। 40 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वह एक कैफे में पहुंचे। कड़ाके की ठंड की वजह से हाथ और पैर यहां से भी बॉर्डर 12 किलोमीटर दूर रहे है। कैफे की संचालिका ने उन्हें खाना खिलाया। जब उन्होंने रुपये देना चाहा तो महिला ने रुपये नहीं लिए।
रात उन्होंने कैफे में बैठकर ठिठुरते हुए बिताई। सुबह छह बजे दिन का खाना देने के बाद महिला उन्हें वहीं पास में एक स्कूल में बने शेल्टर होम में पहुंचा गई। उन्होंने बताया कि दस छात्रों का ग्रुप है। हालात बहुत खराब हो रहे हैं। बॉर्डर से उन्हें कब और कैसे फ्लाइट मिलेगी, इसकी कोई जानकारी नहीं है। उनके पास अभी खाने के लिए जूस के पैकेट, चिप्स और बिस्किट हैं।
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