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Moradabad News: शादी के बाद कारगिल से बुलावा, गोलियां लगीं पर लड़ते रहे कैप्टन अखिलेश
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मुरादाबाद। कारगिल की हजारों फीट ऊंची बर्फीली पहाड़ियों पर दुश्मन की बरसती गोलियां…सीधी चढ़ाई...और दिलों में तिरंगा फहराने का जोश… 1999 में हुए भारत और पाकिस्तान के कारगिल युद्ध को आज 26 साल हो गए हैं। शहर के नवीन नगर निवासी सेवानिवृत्त कैप्टन अखिलेश सक्सेना के मन-मस्तिष्क में कारगिल युद्ध की यादें अब भी ताजा हैं। युद्ध में साथियों के बलिदान को यादकर उनकी आंखें अब भी डबडबा जाती हैं।
कैप्टन अखिलेश बताते हैं कि कारगिल युद्ध में पहुंचने के दो महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी। पोस्टिंग पंजाब में थी। युद्ध में जाने से एक सप्ताह पहले पत्नी को मां के पास घर पहुंचा दिया था। युद्ध में गोलियां लगने से जब वह घायल हुए तो परिजन उन्हें को बेस अस्पताल दिल्ली में देखने पहुंचे थे। उस समय की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि पाकिस्तानी घुसपैठिए ऐसे स्थान पर बैठे हुए थे, जहां से वह भारतीय सैनिकों पर गोलाबारी कर रहे थे। भारतीय सेना के दो हमले विफल हो चुके थे। ऐसे में उन्हें दुश्मनों से सीधा मोर्चा लेने के लिए कमान सौंपी गई।
दुश्मन ऊंची चोटियों पर बैठे थे और भारतीय सैनिकों को नीचे से ऊपर जाकर लड़ना पड़ता था। ऐसे में भारतीय सैनिकों को दुश्मनों को मार गिराने में काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। दो जुलाई को देर रात करीब तीन बजे तोलोलिंग चौकी को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराकर आगे कूच करने के लिए कैपिटन सैनिकों को निर्देशित कर रहे थे। उसी समय दुश्मन की तीन गोलियां उनके हाथों में लगीं, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बराबर मोर्चा संभाले रखा। उन्होंने ब्लैक रॉक पर तिरंगा फहराया था। युद्ध में घायल होने के एक साल बाद वह अस्पताल से घर आए। उसके बाद सेना में सेवाएं नहीं दे सके। उन्होंने बताया कि सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी आज भी उन्हें बेचैन कर देती है।
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पाकिस्तानी हलवा खाकर मनाया जीत का जश्न
कैप्टन अखिलेश कहते हैं कि जब हम तोलोलिंग पर पहुंचे तो कुछ साथी वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। घायल साथी दो दिन से भूखे-प्यासे लड़ रहे थे। हमारे पास केवल गोलियां और बारूद थे। हमने चोटी पर दुश्मन का किचन ढूंढ निकाला। दुश्मन अपनी जीत को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे हुए थे कि उन्होंने जश्न की पूरी तैयारी कर रखी थी। वहां हलवा, बिरयानी, ड्राई फ्रूट्स रखे हुए थे। भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी हलवा खाकर वहां जीत का जश्न मनाया।
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कैप्टन अखिलेश बताते हैं कि कारगिल युद्ध में पहुंचने के दो महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी। पोस्टिंग पंजाब में थी। युद्ध में जाने से एक सप्ताह पहले पत्नी को मां के पास घर पहुंचा दिया था। युद्ध में गोलियां लगने से जब वह घायल हुए तो परिजन उन्हें को बेस अस्पताल दिल्ली में देखने पहुंचे थे। उस समय की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि पाकिस्तानी घुसपैठिए ऐसे स्थान पर बैठे हुए थे, जहां से वह भारतीय सैनिकों पर गोलाबारी कर रहे थे। भारतीय सेना के दो हमले विफल हो चुके थे। ऐसे में उन्हें दुश्मनों से सीधा मोर्चा लेने के लिए कमान सौंपी गई।
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दुश्मन ऊंची चोटियों पर बैठे थे और भारतीय सैनिकों को नीचे से ऊपर जाकर लड़ना पड़ता था। ऐसे में भारतीय सैनिकों को दुश्मनों को मार गिराने में काफी परेशानी उठानी पड़ती थी। दो जुलाई को देर रात करीब तीन बजे तोलोलिंग चौकी को पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुक्त कराकर आगे कूच करने के लिए कैपिटन सैनिकों को निर्देशित कर रहे थे। उसी समय दुश्मन की तीन गोलियां उनके हाथों में लगीं, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बराबर मोर्चा संभाले रखा। उन्होंने ब्लैक रॉक पर तिरंगा फहराया था। युद्ध में घायल होने के एक साल बाद वह अस्पताल से घर आए। उसके बाद सेना में सेवाएं नहीं दे सके। उन्होंने बताया कि सीमा पर पाकिस्तान की तरफ से होने वाली गोलीबारी आज भी उन्हें बेचैन कर देती है।
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पाकिस्तानी हलवा खाकर मनाया जीत का जश्न
कैप्टन अखिलेश कहते हैं कि जब हम तोलोलिंग पर पहुंचे तो कुछ साथी वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। घायल साथी दो दिन से भूखे-प्यासे लड़ रहे थे। हमारे पास केवल गोलियां और बारूद थे। हमने चोटी पर दुश्मन का किचन ढूंढ निकाला। दुश्मन अपनी जीत को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे हुए थे कि उन्होंने जश्न की पूरी तैयारी कर रखी थी। वहां हलवा, बिरयानी, ड्राई फ्रूट्स रखे हुए थे। भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी हलवा खाकर वहां जीत का जश्न मनाया।