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आज भी जिंदा हैं क्रांतिकारियों की यादें
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मुरादाबाद।
मुरादाबाद में स्वतंत्रता आंदोलन की यादें आज भी जिंदा हैं। 1857 की क्रांति से लेकर आजादी के आंदोलन तक मुरादाबाद क्रांतिकारियों का प्रमुख गढ़ रहा। आजादी की लड़ाई में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने बलिदान देकर देश को आजाद कराने में भूमिका निभाई। क्रांतिकारियों की यादें सिविल लाइन स्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवन में सहेजी गई हैं।
आजादी के आंदोलन में मुरादाबाद का गौरवशाली इतिहास रहा है। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांतिकारियों ने आवाज बुलंद की। 1857 की क्रांति में गुलाब राय समेत सैकड़ों क्रांतिकारियों ने प्राणों की आहुति दी। 10 अगस्त 1942 को जलिया वाला बाग की तरह पान दरीबा में गोली कांड हुआ और सैकड़ों क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोली का निशाना बने। नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने मुंबई से असहयोग आंदोलन की घोषणा की। इसकी खबर फैलते ही मुरादाबाद में भी अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को शाम को उठा लिया। इसके विरोध में 10 अगस्त को हजारों लोग पान दरीबा पर एकत्र हुए और अंग्रेज सरकार का विरोध किया। विरोध प्रदर्शन के बीच अंग्रेज सैनिकों ने गोलीबारी कर दी। जिसमें सैकड़ों लोग मार गए, लेकिन अंग्रेजों ने महज छह क्रांतिकारियों को शहीद दर्शाया। 11 साल के जगदीश प्रसाद को बिजली के खंभे पर गोली मार दी गई। जगदीश प्रसाद युवा क्रांतिकारी थे और बिजली के खंभे पर तिरंगा फहराने चढ़े थे। अंग्रेज सैनिकों ने जगदीश प्रसाद को गोली मार दी, और जिसके निशान आज भी खंभे पर गवाह हैं। बिजली का खंभा संरक्षित किया गया है।
गलशहीद स्थित इमली का पेड़ भी क्रांतिकारियों के गवाह है। इमली के पेड़ पर सैकड़ों क्रांतिकारियों को लटका दिया गया। उनके शव को उतारने वालों को गोली मार दी गई। क्रांतिकारियों के शव पेड़ पर लटके रहे। क्रांतिकारियों की शहादत से ही बाद में जगह का नाम गलशहीद पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के महामंत्री धवल दीक्षित बताते हैं, मुरादाबाद में 450 क्रांतिकारी एवं आंदोलनकारी चिह्नित हैं। क्रांतिकारियों की यादों को सहेजने के लिए 1990 में सेनानी परिवारों ने पेंशन से सेनानी भवन का निर्माण की नींव रखी। पहले अध्यक्ष राधा कृष्ण और महामंत्री रामअवतार दीक्षित बने। उनके प्रयासों से 1994 में भवन का विस्तार हुआ और 2013 में हॉल तैयार किया गया। सेनानी भवन में क्रांतिकारियों की हर याद को सहेजा गया है।
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मुरादाबाद में स्वतंत्रता आंदोलन की यादें आज भी जिंदा हैं। 1857 की क्रांति से लेकर आजादी के आंदोलन तक मुरादाबाद क्रांतिकारियों का प्रमुख गढ़ रहा। आजादी की लड़ाई में सैकड़ों क्रांतिकारियों ने बलिदान देकर देश को आजाद कराने में भूमिका निभाई। क्रांतिकारियों की यादें सिविल लाइन स्थित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवन में सहेजी गई हैं।
आजादी के आंदोलन में मुरादाबाद का गौरवशाली इतिहास रहा है। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रांतिकारियों ने आवाज बुलंद की। 1857 की क्रांति में गुलाब राय समेत सैकड़ों क्रांतिकारियों ने प्राणों की आहुति दी। 10 अगस्त 1942 को जलिया वाला बाग की तरह पान दरीबा में गोली कांड हुआ और सैकड़ों क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोली का निशाना बने। नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने मुंबई से असहयोग आंदोलन की घोषणा की। इसकी खबर फैलते ही मुरादाबाद में भी अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को शाम को उठा लिया। इसके विरोध में 10 अगस्त को हजारों लोग पान दरीबा पर एकत्र हुए और अंग्रेज सरकार का विरोध किया। विरोध प्रदर्शन के बीच अंग्रेज सैनिकों ने गोलीबारी कर दी। जिसमें सैकड़ों लोग मार गए, लेकिन अंग्रेजों ने महज छह क्रांतिकारियों को शहीद दर्शाया। 11 साल के जगदीश प्रसाद को बिजली के खंभे पर गोली मार दी गई। जगदीश प्रसाद युवा क्रांतिकारी थे और बिजली के खंभे पर तिरंगा फहराने चढ़े थे। अंग्रेज सैनिकों ने जगदीश प्रसाद को गोली मार दी, और जिसके निशान आज भी खंभे पर गवाह हैं। बिजली का खंभा संरक्षित किया गया है।
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गलशहीद स्थित इमली का पेड़ भी क्रांतिकारियों के गवाह है। इमली के पेड़ पर सैकड़ों क्रांतिकारियों को लटका दिया गया। उनके शव को उतारने वालों को गोली मार दी गई। क्रांतिकारियों के शव पेड़ पर लटके रहे। क्रांतिकारियों की शहादत से ही बाद में जगह का नाम गलशहीद पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के महामंत्री धवल दीक्षित बताते हैं, मुरादाबाद में 450 क्रांतिकारी एवं आंदोलनकारी चिह्नित हैं। क्रांतिकारियों की यादों को सहेजने के लिए 1990 में सेनानी परिवारों ने पेंशन से सेनानी भवन का निर्माण की नींव रखी। पहले अध्यक्ष राधा कृष्ण और महामंत्री रामअवतार दीक्षित बने। उनके प्रयासों से 1994 में भवन का विस्तार हुआ और 2013 में हॉल तैयार किया गया। सेनानी भवन में क्रांतिकारियों की हर याद को सहेजा गया है।
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