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विंध्य धरा से ज्योतिष गणना करता था रावण
ब्यूरो/अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Sat, 09 Apr 2016 12:36 AM IST
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विंध्य धाम की महत्ता
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लंकाधिपति रावण भी अपनी ज्योतिष गणित की गणना के लिए विंध्याचल की शरण में आता था। तब से अब तक विंध्य धरा का अमरावती चौराहे के पास का स्थल भारत के मानक समय को प्रभावित कर रहा है। यह स्थान भारत की प्रधान मध्याह्न रेखा 82.5 पूर्वी देशांतर पर स्थित है।
भारत का मानक समय (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) विंध्याचल से ही लिया जाता है। वर्ष 2007 में भूगोल विदों के एक दल ने यहां पहुंच कर विन्ध्याचल के अमरावती चौराहे के पास स्थित स्थल को मानक समय के स्थल को चिह्नित किया था। सटीक भौगोलिक स्थिति के खोजकर्ता एसपीएसीई (साइज पाल्युराइजेशन एसोसिएशन आफ कम्यूनिकेट्स एंड एजूकेशन) हैं। इस स्थान का बीते एक सप्ताह पूर्व ही जिला प्रशासन की ओर से सुंदरीकरण करते हुए इस स्थल के महत्व को बताने वाला बोर्ड लगवा दिया है।
बोर्ड पर सूर्य एवं पृथ्वी की दूरी तथा व्यास आदि सहित भारतीय आध्यात्मिक जगत में इस स्थान के महत्व को दर्शाया गया है। विंध्याचल के वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र बताते हैं कि विंध्य धरा को मां बिंदुवासिनी का दरबार भी कहते हैं।
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महारानी मां बिंदुवासिनी अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ यहां विद्यमान हैं। बिंदु के बिना एक छोटी रेखा भी नहीं खींची जा सकती है और मां बिंदुवासिनी की कृपा के बिना सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। रावण भी अपनी ज्योतिष गणना के लिए समय यहीं से लिया करता था। यही नहीं रावण ने यहां मां के मंदिर के समीप शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे बिंदेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है, जो आध्यात्मिक जगत के मानक समय का सूचक भी है।
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भारत का मानक समय (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) विंध्याचल से ही लिया जाता है। वर्ष 2007 में भूगोल विदों के एक दल ने यहां पहुंच कर विन्ध्याचल के अमरावती चौराहे के पास स्थित स्थल को मानक समय के स्थल को चिह्नित किया था। सटीक भौगोलिक स्थिति के खोजकर्ता एसपीएसीई (साइज पाल्युराइजेशन एसोसिएशन आफ कम्यूनिकेट्स एंड एजूकेशन) हैं। इस स्थान का बीते एक सप्ताह पूर्व ही जिला प्रशासन की ओर से सुंदरीकरण करते हुए इस स्थल के महत्व को बताने वाला बोर्ड लगवा दिया है।
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बोर्ड पर सूर्य एवं पृथ्वी की दूरी तथा व्यास आदि सहित भारतीय आध्यात्मिक जगत में इस स्थान के महत्व को दर्शाया गया है। विंध्याचल के वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र बताते हैं कि विंध्य धरा को मां बिंदुवासिनी का दरबार भी कहते हैं।
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महारानी मां बिंदुवासिनी अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ यहां विद्यमान हैं। बिंदु के बिना एक छोटी रेखा भी नहीं खींची जा सकती है और मां बिंदुवासिनी की कृपा के बिना सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। रावण भी अपनी ज्योतिष गणना के लिए समय यहीं से लिया करता था। यही नहीं रावण ने यहां मां के मंदिर के समीप शिवलिंग की स्थापना की थी, जिसे बिंदेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है, जो आध्यात्मिक जगत के मानक समय का सूचक भी है।