{"_id":"57094ec94f1c1bf02ac81275","slug":"vaswara-society-had-camped-vindhyachal","type":"story","status":"publish","title_hn":"मंत्र से ज्यादा भाव से करते हैं आराधना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मंत्र से ज्यादा भाव से करते हैं आराधना
ब्यूरो/ अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Sun, 10 Apr 2016 12:19 AM IST
विज्ञापन
मां विंध्यवासिनी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विंध्याचल में भाव और भक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो तो चैत्र नवरात्र में तृतीया से पंचमी तक आने वाले वैसवारा समाज की भक्ति देखी जा सकती है। वैसवारा समुदाय की पूजन पद्धति भाव पर आधारित होती है। इसमें परिवार के सभी सदस्य नया सफेद वस्त्र धारण कर मां विंध्यवासिनी का दर्शन करते हैं। ये मंत्र से ज्यादा भाव से आराधना करते हैं।
वैसवारा समाज के भक्तों के गले में एक कपड़े की पंखे जैसी माला होती है, जिसे यह रास्ते भर डोलाते चलते हैं, जिसे हंकनी कहते हैं। मां के चंवर डोलाने की भाव से यह जुड़ी है। साथ ही ये आटे से बने दीपक का ही इस्तेमाल करते हैं। गाजे-बाजे के साथ मां की पूजा आराधना भाव विभोर होकर करते हैं। देखने वालों को भी भक्ति रस में सराबोर कर देते हैं।
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहित प्रेमशंकर मिश्र ने बताया कि उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ, बुंदेलखंड, कानपुर देहात से वैसवारे समाज के लोग मां का दर्शन पूजन करने आते हैं। नवरात्र की पंचमी को दर्शन-पूजन करके चले जाते हैं। समूह में आने वाले वैसवारा समाज के लोग तमाम प्रकार के वाद्य यंत्र लेकर ढोल मंजीरा लेकर नाचते-गाते आते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके आते हैं। अन्नदान करते हैं।
विज्ञापन
मां विंध्यवासिनी के दरबार में वैसवारा समाज प्राचीन काल से आता रहा है। कहा जाता है कि 1200 ई. के आसपास वैसवारों में मध्यप्रदेश्ा के छतरपुर का मां का एक अनन्य भक्त भानु भगत हुआ करता था। उसे मां के साक्षात दर्शन होेते थे। एक बार भानु भगत ने मां से कहा कि आप उसके निवास पर ही चलिए, ताकि उसे यहां न आना पड़े।
मां ने कहा कि यदि तुम मेरे विग्रह को ले जाना ही चाहते हो तो रास्ते में उसे कहीं मत रखना। मां के ऐसा कहने पर भानु भगत ने मां के शर्त को स्वीकार कर लिया और मां के विग्रह को भक्त मंडली के साथ ले जाने लगा। जब भानु भगत प्रयाग की धरती पर पहुंचा तो थक जाने के बाद विग्रह को वहीं रख दिया। शर्त के अनुसार ऐसा करने पर मां वहां से अलोप हो गईं और विंध्याचल में आकर विराजमान हो गईं। प्रयाग में जहां से मां अलोप हुईं वहीं मां अलोपी हैं, जहां मां की पूजा बिना विग्रह के होती है।
विज्ञापन
वैसवारा समाज के भक्तों के गले में एक कपड़े की पंखे जैसी माला होती है, जिसे यह रास्ते भर डोलाते चलते हैं, जिसे हंकनी कहते हैं। मां के चंवर डोलाने की भाव से यह जुड़ी है। साथ ही ये आटे से बने दीपक का ही इस्तेमाल करते हैं। गाजे-बाजे के साथ मां की पूजा आराधना भाव विभोर होकर करते हैं। देखने वालों को भी भक्ति रस में सराबोर कर देते हैं।
विज्ञापन
विंध्याचल के तीर्थ पुरोहित प्रेमशंकर मिश्र ने बताया कि उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ, बुंदेलखंड, कानपुर देहात से वैसवारे समाज के लोग मां का दर्शन पूजन करने आते हैं। नवरात्र की पंचमी को दर्शन-पूजन करके चले जाते हैं। समूह में आने वाले वैसवारा समाज के लोग तमाम प्रकार के वाद्य यंत्र लेकर ढोल मंजीरा लेकर नाचते-गाते आते हैं। सफेद वस्त्र धारण करके आते हैं। अन्नदान करते हैं।
विज्ञापन
मां विंध्यवासिनी के दरबार में वैसवारा समाज प्राचीन काल से आता रहा है। कहा जाता है कि 1200 ई. के आसपास वैसवारों में मध्यप्रदेश्ा के छतरपुर का मां का एक अनन्य भक्त भानु भगत हुआ करता था। उसे मां के साक्षात दर्शन होेते थे। एक बार भानु भगत ने मां से कहा कि आप उसके निवास पर ही चलिए, ताकि उसे यहां न आना पड़े।
मां ने कहा कि यदि तुम मेरे विग्रह को ले जाना ही चाहते हो तो रास्ते में उसे कहीं मत रखना। मां के ऐसा कहने पर भानु भगत ने मां के शर्त को स्वीकार कर लिया और मां के विग्रह को भक्त मंडली के साथ ले जाने लगा। जब भानु भगत प्रयाग की धरती पर पहुंचा तो थक जाने के बाद विग्रह को वहीं रख दिया। शर्त के अनुसार ऐसा करने पर मां वहां से अलोप हो गईं और विंध्याचल में आकर विराजमान हो गईं। प्रयाग में जहां से मां अलोप हुईं वहीं मां अलोपी हैं, जहां मां की पूजा बिना विग्रह के होती है।