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नक्काशीदार डाक चौकियां खोती जा रहीं पहचान
ब्यूरो, अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Wed, 18 May 2016 12:30 AM IST
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शेरवां में क्षतिग्रस्त प्राचीन डाक चौकी।
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अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में संचार प्रणाली व व्यावसायिक गतिविधियों को मजबूत करने के उद्देश्य से डाक चौकियों का निर्माण करवाया था। चौकियों का निर्माण नक्काशीदार पत्थरों से किया गया था, जो रखरखाव के अभाव में वर्तमान समय में जीर्ण शीर्ण अवस्था में पहुंच चुकी हैं। डाक चौकी स्थापित करने के पीछे उसकी मंशा राज्य में शांति व्यवस्था का पता लगाना था।
मुगल सम्राट हुमायूं को पराजित करने के पश्चात अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने अल्पकालीन शासन काल में संचार प्रणाली व व्यवसायिक गतिविधियों को मजबूत करने के उद्देश्य से डाक चौकियों का निर्माण करवाया था। विंध्य पर्वत शृंखला के पहाड़ी के उत्तरी छोर पर अदलहाट, सिकंदरपुर, चकिया, शेरवां, भुइली की पहाड़ियों पर डाक चौकियां स्थापित की गईं थीं। जनपद के चुनार तहसील क्षेत्र में बनवाई गई इन डाक चौकियों पर कर्मचारियों की तैनाती भी की जाती थी।
प्रत्येक चौकी पर शांति व्यवस्था की सूचना देने के लिए प्रतीकात्मक ध्वज का भी इस्तेमाल किया जाता था। ध्वज अलग अलग रंग के लगाए जाते थे, जो विभिन्न परिस्थितियों के लिए संकेत दिया करते थे। प्रत्येक चौकी की जिम्मेदारी बनती थी कि वह अपने पूर्ववर्ती चौकी पर लगे ध्वज को देखकर दूसरी चौकी को सूचित करे। इस प्रकार से संचार व्यवस्था एवं व्यवसायिक गतिविधियों का संचालन हुआ करता था। इस व्यवस्था से बहुत की कम समय में पूरे साम्राज्य का हाल राजधानी तक आसानी से पहुंच जाता था।
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मुगल सम्राट हुमायूं को पराजित करने के पश्चात अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने अल्पकालीन शासन काल में संचार प्रणाली व व्यवसायिक गतिविधियों को मजबूत करने के उद्देश्य से डाक चौकियों का निर्माण करवाया था। विंध्य पर्वत शृंखला के पहाड़ी के उत्तरी छोर पर अदलहाट, सिकंदरपुर, चकिया, शेरवां, भुइली की पहाड़ियों पर डाक चौकियां स्थापित की गईं थीं। जनपद के चुनार तहसील क्षेत्र में बनवाई गई इन डाक चौकियों पर कर्मचारियों की तैनाती भी की जाती थी।
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प्रत्येक चौकी पर शांति व्यवस्था की सूचना देने के लिए प्रतीकात्मक ध्वज का भी इस्तेमाल किया जाता था। ध्वज अलग अलग रंग के लगाए जाते थे, जो विभिन्न परिस्थितियों के लिए संकेत दिया करते थे। प्रत्येक चौकी की जिम्मेदारी बनती थी कि वह अपने पूर्ववर्ती चौकी पर लगे ध्वज को देखकर दूसरी चौकी को सूचित करे। इस प्रकार से संचार व्यवस्था एवं व्यवसायिक गतिविधियों का संचालन हुआ करता था। इस व्यवस्था से बहुत की कम समय में पूरे साम्राज्य का हाल राजधानी तक आसानी से पहुंच जाता था।
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