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Mirzapur News: गोमुख से गंगा सागर तक हो रही अमृत की वर्षा
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लालगंज। जयकर परमहंस आश्रम में रविवार को श्रद्धालुओं को प्रवचन सुनाते हुए स्वामी भावानंद महाराज ने कहा कि गोमुख से लेकर गंगासागर तक अमृत की वर्षा हो रही है। यह दिव्य संयोग पूरे वर्ष 2025 तक बना रहेगा। उन्होंने कहा कि जो भक्त इस वर्ष गंगा में स्नान करेगा, वह अमृत वर्षा का पुण्य लाभ प्राप्त करेगा और आत्मिक तृप्ति का अनुभव करेगा।
स्वामी भावानंद महाराज ने भक्ति और भोग की प्रवृत्तियों पर गहन विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भोग की प्रवृत्ति क्षणिक और नश्वर होती है जबकि भक्ति संपूर्ण विश्वास, आस्था, विकास, श्रद्धा और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।
उन्होंने कुंभ स्नानार्थियों के लिए कुछ सुगम मार्ग भी बताए और कहा कि भक्ति गंगा, जमुना और सरस्वती की एकाकार धारा की तरह है जो गंगासागर तक अमृत की वर्षा कर रही है। स्वामी जी ने भक्ति को मां के भाव से जोड़ते हुए कहा कि यह केवल एक भाव नहीं बल्कि चेतना की गंगा है। जिसमें मानव कल्याण की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
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उन्होंने कहा कि भजन, कीर्तन और गीता के श्रवण से भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और इससे जीवन में आध्यात्मिक उन्नति होती है। उन्होंने योग और भोग की प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि भोग की प्रवृत्ति अस्थायी है जबकि योग का मार्ग उन्नति की ओर ले जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि किसी भी ऐसे ज्ञान या माध्यम का त्याग कर देना चाहिए। इच्छाओं पर नियंत्रण रखना भक्ति की पहली शर्त होती है। अनियंत्रित इच्छाएं व्यक्ति को मोह, माया और भोग की ओर ले जाती हैं।
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स्वामी भावानंद महाराज ने भक्ति और भोग की प्रवृत्तियों पर गहन विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भोग की प्रवृत्ति क्षणिक और नश्वर होती है जबकि भक्ति संपूर्ण विश्वास, आस्था, विकास, श्रद्धा और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।
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उन्होंने कुंभ स्नानार्थियों के लिए कुछ सुगम मार्ग भी बताए और कहा कि भक्ति गंगा, जमुना और सरस्वती की एकाकार धारा की तरह है जो गंगासागर तक अमृत की वर्षा कर रही है। स्वामी जी ने भक्ति को मां के भाव से जोड़ते हुए कहा कि यह केवल एक भाव नहीं बल्कि चेतना की गंगा है। जिसमें मानव कल्याण की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
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उन्होंने कहा कि भजन, कीर्तन और गीता के श्रवण से भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और इससे जीवन में आध्यात्मिक उन्नति होती है। उन्होंने योग और भोग की प्रवृत्तियों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि भोग की प्रवृत्ति अस्थायी है जबकि योग का मार्ग उन्नति की ओर ले जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि किसी भी ऐसे ज्ञान या माध्यम का त्याग कर देना चाहिए। इच्छाओं पर नियंत्रण रखना भक्ति की पहली शर्त होती है। अनियंत्रित इच्छाएं व्यक्ति को मोह, माया और भोग की ओर ले जाती हैं।