{"_id":"575864254f1c1b1f349c54cb","slug":"martyrdom-of-guru-arjun-dev-feast","type":"story","status":"publish","title_hn":"मनाया गया शहीदी दिवस ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मनाया गया शहीदी दिवस
ब्यूरो/ अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Wed, 08 Jun 2016 11:59 PM IST
विज्ञापन
गुरु अर्जुनदेव का शहीदी पर्व
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुरुद्वारा श्री निर्मल संगत नारायण घाट त्रिमोहानी के तत्वावधान में बुधवार को श्री गुरु अर्जुनदेवजी महाराज का शहीदी दिवस श्रद्धा पूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर शहर के विभिन्न चौराहों पर आम लोगों को शर्बत पिलाया गया। श्री गुरुग्रंथ साहब जी के पाठ की समाप्ति के बाद सनातनीय निर्मल मर्यादा के अनुसार गुरुवाणी का कीर्तन, कथा, विचार और आरती अरदास किया गया।
इस मौके पर गुरु अर्जुनदेवजी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए भूपेन्द्र सिंह डंग, हरदीप सिंह खुराना ने कहा कि गुरु अर्जुनदेवजी ने धैर्य और धीरता की मिसाल प्रस्तुत की थी। भारतीय सनातनीय संस्कृति कायम की। इसके लिए उन्होंने परम पिता परमेश्वर का हुक्म मान कर अपना बलिदान देना स्वीकार किया, लेकिन अपने सत्य कर्म और सत्यमार्ग से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। वक्ताओं ने कहा कि गुरु ग्रंथ साहब जी का प्रथम संपादन और पहली बार स्वर्ण मंदिर में पूजा करवाने का काम गुरु अर्जुनदेव जी ने किया था।
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गुरुजी की शहादत के समय साई मियां मीर नामक व्यक्ति ने न केवल उनकी शहादत का विरोध किया, बल्कि मुगल बादशाह जहांगीर के खिलाफ ईंट से ईंट बजा देने का एलान भी किया था, लेकिन गुरुजी ने तेरा किया मीठा लागे नाम पदारथ नानक मांगे कहकर कर उन्हें शांत करा दिया। गुरुजी के मानवीय दृष्टिकोण की वजह से उन्हें हर धर्म और संप्रदाय के लोग मानते थे।
विज्ञापन
नैनीताल से आए संत कुलदीप सिंह ने कहा कि गुरुजी ने स्वर्ण मंदिर के अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कराने का काम किया, वहीं उन्होंने बहुत से गुरु स्थानों की स्थापना भी कराई। वह सनातनीय संस्कृति के प्रखर पुजारी थे। वे भेदभाव से वह सदैव कोसों दूर रहते थे। सामूहिक प्रार्थना के बाद गुरुद्वारे में सामूहिक लंगर का आयोजन किया गया। इस मौके पर अखंड पाठ की सेवा माता लल्ली देवी द्वारा किया गया। इस मौके पर भोलानाथ शास्त्री, अरविंद सिंह, जसप्रीत सिंह, सागर सिंह, सोनू जी जत्थेदार, कन्हैयालाल शास्त्री, गिरीशचंद्र पांडे, जगमग कपूर, अनिल त्रिपाठी आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
इस मौके पर गुरु अर्जुनदेवजी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए भूपेन्द्र सिंह डंग, हरदीप सिंह खुराना ने कहा कि गुरु अर्जुनदेवजी ने धैर्य और धीरता की मिसाल प्रस्तुत की थी। भारतीय सनातनीय संस्कृति कायम की। इसके लिए उन्होंने परम पिता परमेश्वर का हुक्म मान कर अपना बलिदान देना स्वीकार किया, लेकिन अपने सत्य कर्म और सत्यमार्ग से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। वक्ताओं ने कहा कि गुरु ग्रंथ साहब जी का प्रथम संपादन और पहली बार स्वर्ण मंदिर में पूजा करवाने का काम गुरु अर्जुनदेव जी ने किया था।
विज्ञापन
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गुरुजी की शहादत के समय साई मियां मीर नामक व्यक्ति ने न केवल उनकी शहादत का विरोध किया, बल्कि मुगल बादशाह जहांगीर के खिलाफ ईंट से ईंट बजा देने का एलान भी किया था, लेकिन गुरुजी ने तेरा किया मीठा लागे नाम पदारथ नानक मांगे कहकर कर उन्हें शांत करा दिया। गुरुजी के मानवीय दृष्टिकोण की वजह से उन्हें हर धर्म और संप्रदाय के लोग मानते थे।
विज्ञापन
नैनीताल से आए संत कुलदीप सिंह ने कहा कि गुरुजी ने स्वर्ण मंदिर के अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कराने का काम किया, वहीं उन्होंने बहुत से गुरु स्थानों की स्थापना भी कराई। वह सनातनीय संस्कृति के प्रखर पुजारी थे। वे भेदभाव से वह सदैव कोसों दूर रहते थे। सामूहिक प्रार्थना के बाद गुरुद्वारे में सामूहिक लंगर का आयोजन किया गया। इस मौके पर अखंड पाठ की सेवा माता लल्ली देवी द्वारा किया गया। इस मौके पर भोलानाथ शास्त्री, अरविंद सिंह, जसप्रीत सिंह, सागर सिंह, सोनू जी जत्थेदार, कन्हैयालाल शास्त्री, गिरीशचंद्र पांडे, जगमग कपूर, अनिल त्रिपाठी आदि मौजूद रहे।