लालगंज को नहीं बनाया मुद्दा
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इसके बावजूद इस चुनाव में किसी प्रत्याशी के एजेंडे मे लालगंज को नगर पंचायत बनाने का मुद्दा शामिल नहीं है। लालगंज गांव छानबे का विधानसभा का हिस्सा है। इलाके के तीन लाख 12 हजार वोट में यहां की 10 हजार की आबादी का कोई मायने ही नहीं है। लिहाजा कोई नेता इसकी परवाह तक नहीं करता।
उपरौध क्षेत्र के लोग विकास को लेकर चिंतित हैं। लालगंज तहसील के गांव को नगर पंचायत बनाने की मांग लंबे अरसे से चली आ रही है। लगभग एक दशक पहले दो बार यह मुद्दा विधानसभा में उठाया गया। कानपुर के तत्कालीन विधायक संजीव दरियावादी और अजय कपूर ने स्थानीय निवासियों के कहने पर वर्ष 2006 मे विधानसभा में लालगंज को नगर पंचायत बनाने का मुद्दा उठाया था।
इस पर सरकार ने जबाब दिया गया था कि आबादी 85 सौ है जबकि इसके लिए आबादी कम से कम दस हजार होनी चाहिए इसलिए नगर पंचायत का दर्जा नही दिया जा सकता है। उसके बाद से मामला ठ़ढे बस्ते में डाल दिया गया और लंबा समय गुजर गया लेकिन किसी जनप्रतिनिधि ने इस मुद्दे को उठाने की जरूरत नहीं समझी। विचारणीय प्रश्न है कि किसी तहसील का मुख्यालय गांव में क्यों है? अब लालगंज की आबादी भी दस हजार से ऊपर हो चुकी है। इसके बावजूद किसी स्थानीय नेता को यहां के लोगों की आकांक्षा से कोई मतलब नहीं।
लालगंज बाजार के ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र का विकास समुचित ढ़ंग से नही किया जा रहा है। लालगंज बाजार की उपेक्षा हो रही है। यह इलाका मध्यप्रदेश सोनभद्र इलाहाबाद के मध्य स्थित होने के कारण सर्वाधिक उपेक्षित है। सामाजिक कार्यकर्ता शशिभूषण दुबे का कहना कि लालगंल नगर पंचायत बनाने की मांग जारी रहेगी। चाहे कोई दल प्रयास करे या नही। वहीं संतोष केशरी का कहना है कि तहसील के बाजार की दस आबादी की किसी जनप्रतिनिधि को चिंता नहीं है। इसका एक कारण यह है कि बाजार के बालाशंकर दुबे ने कहा कि तहसील के गांव लालगंज के विकास से समाज का विकास होता लेकिन अभी तक किसी दल ने इसे मुद्दा ही नही बनाया।