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बिन बरसे जा रहे उमड़-घुमड़ कर आने वाले मेघ
ब्यूरो, अमर उजाला, मिर्जापुर।
Updated Thu, 30 Jun 2016 12:36 AM IST
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गर्मी से राहत नहीं
- फोटो : अमर उजाला
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बादलों के उमड़ घुमड़ कर आने और बिन बरसे चले जाने से किसान परेशान हैं। अहरौरा एवं जरगो जलाशय में पानी नदारद है वहीं जलस्तर नीचे खिसकने से ट्यूबवेल व पंप पानी देना बंद कर दिए हैं, जिसके चलते किसान धान की नर्सरी नहीं डाल पा रहे हैं। दो से 15 जून तक धान की नर्सरी डाल दी जानी चाहिए, लेकिन 30 जून बीतने को है, जहां खेतों में हरियाली देखने को मिलती थी, वह नहीं दिखाई दे रही है।
धान के कटोरे के नाम से विख्यात जमालपुर में अधिकांश कृषक अभी तक धान की नर्सरी नहीं डाल पाए हैं। किसानाें का मानना है कि ऐसा पहली बार हो रहा है कि सूखा और बाढ़ की विभिषिका को झेलने के बाद भी किसान येन केन प्रकारेण 25 जून तक धान की नर्सरी डाल देते थे, लेकिन इस वर्ष मौसम के दगा देने के चलते मौसम वैज्ञानिकों का दावा भी झूठा साबित हो रहा है। महाकवि घाघ की कहावतें सच साबित होने लगी हैं।
क्षेत्र के बुजुर्गों का मानना है कि मौसम वैज्ञानिकों का दावा झूठा साबित हुआ तथा महाकवि घाघ की कहवातें सच साबित हो रही हैं। वर्तमान में अहरौरा एवं जरगो जलाशय में पानी नदारद है, जलस्तर नीचे खिसकने से किसानाें के ट्यूबवेल व पंप पानी देना बंद कर दिए हैं, जिसके चलते किसान धान की नर्सरी नहीं डाल पा रहे हैं। प्रकृति पर आधारित खेती किसानी करने वाले किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं। जमालपुर ब्लाक में पांच हजार एकड़ में धान की खेती की जाती है, जहां अभी तक मात्र साधन संपन्न किसानाें द्वारा निजी संसाधनों से करीब पांच प्रतिशत धान की नर्सरी पड़ पाई है, शेष किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं।
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प्रगतिशील किसान श्रीकांत द्विवेदी, रमेश सिंह, राम आसरे कुशवाहा, शरण शंकर चतुर्वेदी, चंद्रभान सिंह, घनश्याम सिंह, मोती सिंह, सतीश चंद्र त्रिपाठी, शैलेष श्रीवास्तव आदि का कहना है कि 30 जून तक जहां खेतों में धान की नर्सरी की हरियाली दिखाई देती थी, वह हरियाली अभी तक नहीं दिखाई दे रही है। बादलों की लुकाछिपी से किसानों की मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं। लगातार पुरवा व पछुआ हवा के चलने से किसानाें के होश उड़े हुए हैं।
वीरेंद्र
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धान के कटोरे के नाम से विख्यात जमालपुर में अधिकांश कृषक अभी तक धान की नर्सरी नहीं डाल पाए हैं। किसानाें का मानना है कि ऐसा पहली बार हो रहा है कि सूखा और बाढ़ की विभिषिका को झेलने के बाद भी किसान येन केन प्रकारेण 25 जून तक धान की नर्सरी डाल देते थे, लेकिन इस वर्ष मौसम के दगा देने के चलते मौसम वैज्ञानिकों का दावा भी झूठा साबित हो रहा है। महाकवि घाघ की कहावतें सच साबित होने लगी हैं।
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क्षेत्र के बुजुर्गों का मानना है कि मौसम वैज्ञानिकों का दावा झूठा साबित हुआ तथा महाकवि घाघ की कहवातें सच साबित हो रही हैं। वर्तमान में अहरौरा एवं जरगो जलाशय में पानी नदारद है, जलस्तर नीचे खिसकने से किसानाें के ट्यूबवेल व पंप पानी देना बंद कर दिए हैं, जिसके चलते किसान धान की नर्सरी नहीं डाल पा रहे हैं। प्रकृति पर आधारित खेती किसानी करने वाले किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं। जमालपुर ब्लाक में पांच हजार एकड़ में धान की खेती की जाती है, जहां अभी तक मात्र साधन संपन्न किसानाें द्वारा निजी संसाधनों से करीब पांच प्रतिशत धान की नर्सरी पड़ पाई है, शेष किसान आसमान की तरफ टकटकी लगाए हुए हैं।
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प्रगतिशील किसान श्रीकांत द्विवेदी, रमेश सिंह, राम आसरे कुशवाहा, शरण शंकर चतुर्वेदी, चंद्रभान सिंह, घनश्याम सिंह, मोती सिंह, सतीश चंद्र त्रिपाठी, शैलेष श्रीवास्तव आदि का कहना है कि 30 जून तक जहां खेतों में धान की नर्सरी की हरियाली दिखाई देती थी, वह हरियाली अभी तक नहीं दिखाई दे रही है। बादलों की लुकाछिपी से किसानों की मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं। लगातार पुरवा व पछुआ हवा के चलने से किसानाें के होश उड़े हुए हैं।
वीरेंद्र