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यहां महज दिखावे के लिए स्वास्थ्य सेवाएं
ब्यूरो/ अमर उजाला, मिर्जापुर
Updated Mon, 25 Apr 2016 11:50 PM IST
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मंडलीय चिकित्सालय मंडल के रोगियों को चिकित्सीय सुविधा मुहैया कराने में अक्षम साबित हो रहा है। अब अधिकांश बीमारियों में ब्लड से लेकर एक्सरे और अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़ती है लेकिन यहां स्थिति यह है कि ये सेवाएं केवल बड़े अधिकारियों को दिखाने के लिए हैं, मरीजों के लिए नहीं। शासन की ओर से फ्री सेवाओं की स्थिति यह है कि एक्सरे की सुविधा है लेकिन प्लेट नहीं। अल्ट्रासाउंड मशीन चलाने वाला कोई नहीं है। इसका फायदा आसपास के जांचघर उठाते हैं। यहां के ओपीडी में रोजाना आने वाले रोगी निराश लौटने को मजबूर हैं।
जिले के चिकित्सालय को मंडलीय चिकित्सालय का दर्जा मिला हुआ है लेकिन सुविधा सीएचसी पीएचसी जैसी है। यहां मरीज सिर्फ डॉक्टरों को दिखा कर अपने मर्ज की दवा लिखवा सकता है, पूरा इलाज नहीं करा सकता है, क्योंकि सुविधाएं मौजूद हैं लेकिन कागजों पर। सारी जांचें फ्री हैं फिर भी पूरी जांच नहीं हो पा रही है। छोटी जांच कराई जा सकती है लेकिन जब बड़ी जांच की बारी आती है तो बाहर भेज देते हैं।
ऑपरेशन थियेटर में अच्छी मशीनें और सुविधा नहीं होने पर चिकित्सक अधिकांश मरीजों को वाराणसी या इलाहाबाद रेफर कर कर देते हैं। इससे समझा जा सकता है कि किस कदर की सुविधा यहां मौजूद है। पिछले वित्तीय वर्ष में एक करोड़ का बजट आने के बावजूद मरीजों को इलाज व जांच के लिए भटकना पड़ता है। मंडलीय चिकित्सालय में प्रतिदिन 1500 से 2000 मरीज अपना इलाज कराने आते हैं।
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घंटों लाइन में खड़े होकर परची कटवाने के बाद जब ओपीडी में जाते हैं तो वहां इतनी भीड़ रहती है कि काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है। कभी कभी तो ऐसा होता है कि कुछ मरीजों का नंबर आते आते समय समाप्त हो जाता है और डॉक्टर उठकर चले जाते हैं। अस्पताल से दवा भी पूरी नहीं मिलती है। अधिकांश दवा डॉक्टर बाहर की लिख रहे हैं। अस्पताल के काउंटर पर सोमवार को पर्ची कटवाने के लिए मरीजों व उनके तीमारदारों का रेला उमड़ पड़ा। महिला और पुरुष काउंटर पर लगी लाइन कम होने का नाम नहीं ले रही थी।
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जिले के चिकित्सालय को मंडलीय चिकित्सालय का दर्जा मिला हुआ है लेकिन सुविधा सीएचसी पीएचसी जैसी है। यहां मरीज सिर्फ डॉक्टरों को दिखा कर अपने मर्ज की दवा लिखवा सकता है, पूरा इलाज नहीं करा सकता है, क्योंकि सुविधाएं मौजूद हैं लेकिन कागजों पर। सारी जांचें फ्री हैं फिर भी पूरी जांच नहीं हो पा रही है। छोटी जांच कराई जा सकती है लेकिन जब बड़ी जांच की बारी आती है तो बाहर भेज देते हैं।
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ऑपरेशन थियेटर में अच्छी मशीनें और सुविधा नहीं होने पर चिकित्सक अधिकांश मरीजों को वाराणसी या इलाहाबाद रेफर कर कर देते हैं। इससे समझा जा सकता है कि किस कदर की सुविधा यहां मौजूद है। पिछले वित्तीय वर्ष में एक करोड़ का बजट आने के बावजूद मरीजों को इलाज व जांच के लिए भटकना पड़ता है। मंडलीय चिकित्सालय में प्रतिदिन 1500 से 2000 मरीज अपना इलाज कराने आते हैं।
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घंटों लाइन में खड़े होकर परची कटवाने के बाद जब ओपीडी में जाते हैं तो वहां इतनी भीड़ रहती है कि काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है। कभी कभी तो ऐसा होता है कि कुछ मरीजों का नंबर आते आते समय समाप्त हो जाता है और डॉक्टर उठकर चले जाते हैं। अस्पताल से दवा भी पूरी नहीं मिलती है। अधिकांश दवा डॉक्टर बाहर की लिख रहे हैं। अस्पताल के काउंटर पर सोमवार को पर्ची कटवाने के लिए मरीजों व उनके तीमारदारों का रेला उमड़ पड़ा। महिला और पुरुष काउंटर पर लगी लाइन कम होने का नाम नहीं ले रही थी।