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हर आरती में होता है मां का अलग स्वरूप
ब्यूरो/ अमर उजाला/ मिर्जापुर
Updated Sat, 08 Oct 2016 12:37 AM IST
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विंध्यवासिनी
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आदिशक्ति जगत जननी मां विंध्यवासिनी मंदिर में मां की चार आरतियां की जाती हैं। इन चार आरती में चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। चारों आरतियों मंे मांग का अलग स्वरूप होता है।
नवरात्र में ब्रम्ह मुहूर्त में तीन बजे की प्रथम मंगला आरती होती है। इसमें मां के बाल्यावस्था में दर्शन होता है। इससे धर्म की प्राप्ति होती है। मध्याह्न में मां की दूसरी आरती की जाती है, जिसे राजश्री आरती कहा जाता है। इस आरती में माता रानी का स्वरूप राज राजेश्वरी युवावस्था का दर्शन होता है।
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नवरात्र में ब्रम्ह मुहूर्त में तीन बजे की प्रथम मंगला आरती होती है। इसमें मां के बाल्यावस्था में दर्शन होता है। इससे धर्म की प्राप्ति होती है। मध्याह्न में मां की दूसरी आरती की जाती है, जिसे राजश्री आरती कहा जाता है। इस आरती में माता रानी का स्वरूप राज राजेश्वरी युवावस्था का दर्शन होता है।
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इस आरती से भक्तों को अर्थ अर्थात् समृद्धि एवं वैभव की प्राप्ति होती है, जिससे भक्त धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है। सांयकाल साढ़े सात बजे तीसरी छोटी आरती में मां का स्वरूप प्रौढ़ावस्था का होता है। इससे वंश वृद्धि की प्राप्ति होती है। मां की चौथी आरती जिसे शयन आरती भी कहते हैं। यह रात साढ़े नौ बजे शुरू होती है। इसमें मां का स्वरूप वृद्धावस्था का होता है, इस आरती में शामिल होने वाले भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। विंध्याचल के वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. त्रियोगी नारायण मिश्र ने बताया कि आरती की लौ जीवन के अंधकार को हर लेती है और उनके जीवन में खुशियों का उजाला ला देती है।
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