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जनपद की सांस्कृतिक धरोहर है मिर्जापुरी कजली
Updated Thu, 13 Jul 2017 12:39 AM IST
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मिर्जापुर। जनपद की सांस्कृतिक धरोहर कजली दिन गर्दिश में है लेकिन युवा पीढ़ी इसे तेजी से अपना रही है। कजली को संरक्षण व संवर्धन के लिए कुछ युवा लोक गायक सामने आए हैं। वे वरिष्ठ गायकों से पुरानी गायकी के गुर सीख रहे हैं और सामने ला रहे हैं। उनका कहना है कि मिर्जापुरी कजली के संरक्षण की इस मुहिम में स्वयं सेवी संगठनों और कला प्रेमियों को भी योगदान करना होगा।
गायक मोहम्मद मुस्तकीम अहमद का कहना है कि कजली जनपद की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने की जरूरत है, जहां नवोदित कलाकारों को कजली की बारीकियों से परिचित कराया जा सके। देश के तमाम हिस्सों में कजली के रसिक हैं। उन तक अपनी पारंपरिक गायकी के सभी रूपों को पहुंचाने की जरूरत है। कलाकार युवाओं को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। लोक गायक अमित दूबे ने बताया कि कजली की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है। परंतु यह निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और प्रकृति के सौंदर्य ने उन्हें आकृष्ट किया होगा तभी कजरी के बोल फूटे होंगे। तब यह विधा किसी न किसी रूप में हमारे बीच है। मिर्जापुर की कजली तो मां विंध्यवासिनी की आराधना का जरिया है। इसका कोई जोड़ नहीं है। कजली के उत्थान के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। लोक गायिका खुशबू तिवारी ने बताया कि कजली के दिन अच्छे नहीं है लेकिन कुछ स्वयंसेवी संगठन और कला-साधक उसकी बेहतरी के लिए संघर्ष जरूर कर रहे हैं। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में देवी का ही गुणगान मिलता है, जिनके आशीर्वाद से आज भी कजली सावन भर गाई जाती है। गायक बालेश दूबे कहते हैं कि जनपद के लोक कलाकारों ने मिर्जापुरी कजली को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। आज उन कलाकारों के उत्साहवर्धन की जरूरत है। इसके लिए सरकार को योजना बनाकर कार्य करना होगा।
गायक मोहम्मद मुस्तकीम अहमद का कहना है कि कजली जनपद की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने की जरूरत है, जहां नवोदित कलाकारों को कजली की बारीकियों से परिचित कराया जा सके। देश के तमाम हिस्सों में कजली के रसिक हैं। उन तक अपनी पारंपरिक गायकी के सभी रूपों को पहुंचाने की जरूरत है। कलाकार युवाओं को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। लोक गायक अमित दूबे ने बताया कि कजली की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है। परंतु यह निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और प्रकृति के सौंदर्य ने उन्हें आकृष्ट किया होगा तभी कजरी के बोल फूटे होंगे। तब यह विधा किसी न किसी रूप में हमारे बीच है। मिर्जापुर की कजली तो मां विंध्यवासिनी की आराधना का जरिया है। इसका कोई जोड़ नहीं है। कजली के उत्थान के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। लोक गायिका खुशबू तिवारी ने बताया कि कजली के दिन अच्छे नहीं है लेकिन कुछ स्वयंसेवी संगठन और कला-साधक उसकी बेहतरी के लिए संघर्ष जरूर कर रहे हैं। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में देवी का ही गुणगान मिलता है, जिनके आशीर्वाद से आज भी कजली सावन भर गाई जाती है। गायक बालेश दूबे कहते हैं कि जनपद के लोक कलाकारों ने मिर्जापुरी कजली को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। आज उन कलाकारों के उत्साहवर्धन की जरूरत है। इसके लिए सरकार को योजना बनाकर कार्य करना होगा।
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