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शराब का सुरूर, नजर कमजोर, हाथों में खतरनाक सफर का स्टेयरिंग  

Fri, 05 May 2017 02:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 05 May 2017 02:37 AM IST
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wine effect eyesight and create hand shivering
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
रोडवेज की खटारा और जर्जर बसें ही यात्रियों के लिए खतरा नहीं बल्कि इन्हें चलाने वाले अधिकांश चालक भी शराबी व कमजोर आंखों वाले हैं। जिनके भरोसे रोजाना हजारों यात्री खतरनाक सफर तय करते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि निगम के 860 में से 55 चालकों की तो कमजोर नजर, कलर ब्लाइंडनेस, मोतियाबिंद, अस्थमा, हार्ट संबंधी बीमारी की पुष्टि चार माह पहले हो चुकी है। लेकिन फिर भी इनके हाथों में रोजाना स्टेयरिंग थमाया जा रहा है। बाकी चालकों में से कितने ऐसी गंभीर बीमारी वाले होंगे, इसके लिए रूटीन हेल्थ कैंप तक नहीं लगता। 
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रोडवेज को तो ये हाल है
मेरठ रोडवेज रीजन में भैसाली, सोहराब गेट, बड़ौत डिपो सहित पांच डिपो के पास करीब 780 बसों का बेड़ा है। इसमें करीब 350 बसें अनुबंधित तो बाकी 430 निगम की बसों पर दो-दो चालक तैनात रहते हैं। यहां बात केवल विभागीय चालकों की ही हो रही है। लोग अनुबंधित बसों के चालकों के बजाय सरकारी बसों में सफर करने पर ज्यादा विश्वास करते हैं। आम सोच है कि रोडवेज बसों में सफर सुरक्षित और सुगम होता है। लेकिन हकीकत तो चौंकाने वाली है।
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इंतजार किसी गंभीर हादसे का
हकीकत यह है कि रोडवेज में अक्षम चालकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जनवरी में निगम ने जो स्वास्थ्य कैंप लगाया था, उसमें 26 चालकों की नजर कमजोर होने के साथ ही कलर ब्लाइंडनेस (रोगी में सभी रंगों को पहचानने की शक्ति न होना), मोतियाबिंद (रात में या कम रोशनी में धुंधला दिखाई देना, धूप या तेज रोशनी में देखने में परेशानी), अस्थमा (दमा, सांस लेने में परेशानी) और हार्ट संबंधी बीमारियां पाईं गईं। इसके दो माह बाद फिर कैंप लगा तो ऐसे अन्य 29 चालक इन गंभीर बीमारियों से ग्रस्त पाए गए। लेकिन इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि ये 55 चालक अभी भी रोडवेज बसों को चला रहे हैं। चूंकि बसें सरकारी होती हैं इसलिए उनके चालकों की कहीं पर चेकिंग भी नहीं होती। ऐसे में कब कोई बड़ा हादसा हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
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लापरवाही का मकड़जाल
लखनऊ में बैठने वाला मेडिकल बोर्ड इन चालकों को आधिकारिक तौर पर अक्षम घोषित करता है। इसके बाद ऐसे चालकों को रूट से हटाकर सामान्य कार्य करने की ड्यूटी दी जाती है। वर्तमान में इन बीमारियों से ग्रस्त दो दर्जन से ज्यादा चालकों ने अपने को बस चलाने के लिए अक्षम घोषित करने के लिए आवेदन तक कर रखे हैं। लेकिन सरकारी लापरवाही से इस पर निर्णय तक नहीं लिया गया है।

ब्रीथ एनलाइजर तक नहीं
मेरठ रोडवेज रीजन को रोजाना करीब 60-70 लाख रुपये की आमदनी है। लेकिन ताज्जुब है कि उसके पास शराबी चालकों की जांच करने के लिए 5-7 हजार की ब्रीथ एनलाइजर मशीन तक नहीं है। ऐसे में शराबी चालकों का मुंह सूंघकर काम चलाया जाता है। दो दिन पहले ही भैसाली डिपो पर खड़ी एसी बस संख्या यूपी-15एटी 7796 को जो चालक लेने पहुंचा, उसने शराब पी रखी थी। हालांकि स्टेशन अधीक्षक भारत भूषण ने समय रहते चालक को देख लिया और उसे कड़ी फटकार लगाकर भगा दिया था। 

बिना फिटनेस दौड़ती हैं बसें 
रोडवेज की अनुबंधित बसें तो बिना फिटनेस के दौड़ती हैं। पिछले दिनों सोहराबगेट डिपो में संचालित करीब एक दर्जन अनुबंधित बसें बिना फिटनेस दौड़ती मिली थीं। जबकि हर साल फिटनेस कराने का नियम है। लेकिन बस ऑपरेटर कमाई के फेर में अपनी बसों को रेस्ट में भी ऑन रोड रखकर कमाई करते हैं। यहां तक कि मेंटीनेंस आदि के लिए मिलने वाले साप्ताहिक रेस्ट को भी अधिकारियों की मिली भगत से नहीं लेते। 


अब कार्रवाई होगी
शराबी व अक्षम चालकों के मामले सामने आने की जानकारी संज्ञान में आती रहती है। इसके लिए समय-समय पर कार्रवाई भी करते हैं। अगर इस तरह के मामले अभी भी हैं तो यह वाकई गंभीर है। यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। इस बारे में डिपोवार रिपोर्ट मंगवाकर कार्रवाई करेंगे। -एसके बनर्जी, आरएम मेरठ रोडवेज रीजन 
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