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योगी सरकार ने क्यों कराई 'रावण' की रिहाई, जानिए इसके पीछे का गणित

Fri, 14 Sep 2018 06:12 PM IST
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ Updated Fri, 14 Sep 2018 06:12 PM IST
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Why Yogi adityanath Government released Chandrashekhar Ravan
Chandrashekhar Ravan

सहारनपुर में मई 2017 की जातीय हिंसा के आरोपी भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर ‘रावण’ की राज्य सरकार की ओर से जेल से रिहाई का फैसला अकारण नहीं है। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करना और दूसरा लोकसभा चुनाव से पहले दलितों के प्रति हमदर्दी का संदेश देना। 

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दरअसल, रावण की सभी मामलों में पहले ही जमानत हो चुकी थी और केवल राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत ही उसकी महज 26 दिन की कारावास अवधि शेष थी। ऐसे में इस फैसले को ही नहीं, बल्कि भाजपा को भी सियासी नफा-नुकसान की तराजू में तौला जाएगा।
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बड़ा सवाल है कि सवर्णों का विरोध झेल रही भाजपा क्या इस दांव से दलितों के दिल जीत पाएगी? और रावण की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को क्या बसपा के खिलाफ भाजपा इस्तेमाल कर पाएगी? 
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2 अप्रैल को दलितों के भारत बंद के दौरान हिंसा और फिर 6 अगस्त को एससी-एसटी एक्ट के मूल स्वरूप को बहाल करने के फैसले से केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी देश भर में सवर्ण जातियों के निशाने पर है।

उधर 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को दलित विरोधी दाग छुड़ाने में हर संभव प्रयास लगातार करने पड़ रहे हैं। 

सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर कांड को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के दलित विरोध का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो 18 जुलाई 2017 को इसी के विरोध में राज्यसभा से अपना इस्तीफा देकर भाजपा पर बाकायदा ऐसे आरोप भी लगाए। 

हालांकि मायावती ने शब्बीरपुर हिंसा का विरोध किया, लेकिन भीम आर्मी का समर्थन नहीं किया और बिना नाम लिए इसे ‘छोटा मोटा संगठन’ बताया था।

8 जून 2017 को हिमाचल प्रदेश के डलहौजी से एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार किए गए चंद्रशेखर ‘रावण’ के समर्थन में यूपी कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक इमरान मसूद पहले ही दिन से खड़े थे। 

मायावती के बाद राहुल गांधी ने भी सहारनपुर पहुंचकर खुद को दलित हितैषी के रूप में पेश किया था। तमाम दलित संगठन भी इस मसले पर सहारनपुर से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक जुटे। 

ऐसे में संघ और भाजपा अपने ऊपर लगे दलित विरोध के धब्बे साफ करने में लगातार जुटी रही है। इसी साल मार्च में संघ ने पहले बनारस, फिर आगरा और मेरठ अपने समागमों के जरिए दलित प्रेम की ब्रांडिंग की। 

आगरा में नीला मंच और दलित महापुरुषों की तस्वीरें मंच पर लगाने और मेरठ में दलितों के घरों से मंगाया गया खाना स्वयं सेवकों को परोसने से संघ दलितों को लेकर चर्चाओं में आया। 

भाजपा ने भी मेरठ में 11 और 12 अगस्त को जिस स्थान पर प्रदेश कार्यसमिति की बैठक की, उसे ‘शहीद मातादीन बाल्मीकि नगर’ नाम दिया गया और परिसर में तमाम दलित क्रांतिकारियों व महापुरुषों के नामों को प्रदर्शित किया था। 

लेकिन इस सबके बावजूद भी दलितों में अपेक्षित उम्मीद नहीं जग पा रही थी। रही सही कसर इसी हफ्ते शब्बीरपुर हिंसा के आरोपी ठाकुर पक्ष के रासुका में बंद तीनों युवकों की रिहाई ने पूरी कर दी थी। 

चंद्रशेखर रावण के खिलाफ नवंबर से अब तक तीन-तीन महीने के लिए चार बार रासुका की अवधि बढ़ाई जा चुकी थी जो एक नवंबर को समाप्त हो रही थी। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद रावण की ओर से सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ माह पहले एसएलपी दाखिल की गई थी। 

अधिवक्ता हरपाल सिंह जीवन के मुताबिक इस पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किए गए थे और शुक्रवार को इन्हें जवाब दाखिल करने हैं। अब दोनों सरकारें जवाब दे सकती हैं कि रावण की रिहाई हो चुकी है और इसके बाद जिरह के लिए कुछ नहीं बचता है। 

देखना अब यह है कि भाजपा रिहाई के बदले रावण की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बसपा के खिलाफ कितना इस्तेमाल कर पाएगी?  

पुरानी अर्जी को बनाया आधार

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की मां की जिस अर्जी को यूपी शासन ने रिहाई का आधार बनाया है, वह बहुत पुरानी है। रावण के अधिवक्ता हरपाल सिंह जीवन कहते हैं, ‘‘छह महीने से हमने इस संबंध में कोई आवेदन शासन से नहीं किया था।

वैसे भी शासन एक साल तक ही रासुका बढ़ा सकता है और यह अवधि 1 नवंबर को पूरी हो रही थी।’’ वहीं, कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद ने सरकार के इस फैसले पर कहा कि देर से ही सही, लेकिन इससे दोनों पक्षों में सौहार्द बहाल होगा।

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