अमर उजाला पड़ताल: मेरठ में सिंचाई विभाग से माइनर का रिकॉर्ड भी गुम, खबर छपते ही नींद से जागे अफसर
अमर उजाला में मेरठ माइनर का मामला प्रमुखता से उजागर होने के बाद सिंचाई विभाग के अधिकारी रिकॉर्ड तलाशने में जुट गए हैं। सोमवार को दिन भर माइनर का नक्शा और राजस्व विभाग के अभिलेखों को तलाशने का काम चलता रहा...
अंग्रेजों की हुकूमत में खेतों की सिंचाई के लिए नहर, रजबहा, माइनरों का जाल बिछाया गया था। उसी में मेरठ माइनर भी शामिल था। गंगनहर से निकलकर बिजली बंबा से गुजर रहे रजबहा से मेरठ माइनर निकाला गया। जिससे मलियाना, मोहकमपुर, लिसाड़ी, फतेहउल्लापुर के गांवों के किसान फसलों की सिंचाई करते थे।
जिससे साफ हो रहा है कि माइनर 25 साल पहले सिंचाई विभाग के ही अधिकारियों ने प्राइवेट बिल्डरों से साठगांठ करके चीरहरण के लिए सौंप दिया था। जहां बिल्डर ने माइनर पर सड़क बना दी। वहीं पटरी को कॉलोनियों में शामिल कर दिया गया। अब तो माइनर पर बनी सड़क को भी कॉलोनियों के नाम से ही जाना जाता है।
फाइल खंगाल रहे हैं, जरूर मिलेगा रिकॉर्ड
सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आशुतोष सारस्वत का कहना है कि मेरठ माइनर था, यह तो साफ हो गया है। 30-40 साल पुराना रिकॉर्ड है। उसे तलाश किया जा रहा है। उस समय के अधिकारियों और कर्मचारियों के रिटायर होने के कारण रिकॉर्ड मिलने में दिक्कत आ रही है।
फिर भी ऐसा नहीं है कि रिकॉर्ड नहीं मिलेगा। सभी संबंधित अधिकारी व कर्मचारियों को जिम्मेदारी दी गई है। एक सप्ताह के भीतर पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। मेरठ माइनर की फाइल मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
माइनर के साथ ही तो नष्ट नहीं कर दिया रिकॉर्ड
अमर उजाला में मेरठ माइनर का इतिहास उजागर होने के बाद सोमवार को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता आशुतोष सारस्वत के कार्यालय में सभी अधिकारियों की बैठक हुई। सभी लिपिकों को साथ लेकर माइनर के रिकॉर्ड की तलाश में जुटे रहे।
नक्शा विभाग और रिकॉर्ड रूम में रखी अलमारियों को खंगाला गया। शाम तक चली मशक्कत में अधिकारियों को सफलता हाथ नहीं लगी। जिससे यह भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं उस समय विभाग के अधिकारियों ने माइनर के साथ सरकारी भूमि के अभिलेख भी तो गायब नहीं कर दिए।