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एक मजलिस के तीन तलाक गलत, हलाला भी गैर इस्लामी : मौलाना फुरकान
अमर उजाला ब्यूरो/ बिजनौर
Updated Thu, 20 Apr 2017 09:32 AM IST
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तीन तलाक के मुद्दे पर मदनी ने लिखा पत्र
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तीन तलाक को लेकर इन दिनों सियासी पारा चढ़ा हुआ है। ऐसे में पैगामे-अमन कमेटी के संरक्षक व जमीअतुल कुरआन वस्सुन्नह के मोहतमिम डॉ. मौलाना फुरकान मेहरबान अली अल कासमी अल मदनी खुलकर एक मजलिस के तीन तलाक व हलाला के विरोध में उतर आए हैं। उन्होंने तीन तलाक व हलाला को हराम करार दिया है। साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को कुरान व हदीस की रोशनी में फैसले करने की हिदायत दी है।
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मौलाना फुरकान मदनी ंने देशभर के आलिमों को तीन तलाक व हलाला पर किसी भी मंच पर बहस करने की चुनौती दी है। एक लिखित बयान में उन्होंने कहा कि कुरान व हदीस के मुताबिक, एक मजलिस की तीन तलाक एक ही मानी जाती है। इसके विपरीत दिए जा रहे फतवे सरासर गलत हैं। उन्होंने कहा कि एक मजलिस की तीन तलाक को तीन मानना और हलाला पूरी तरह से हराम है। इसके बाद भी फिकही तकलीदी मसलक की आड़ लेकर मुकल्लिदीन उलेमा इसे सही साबित करने में लगे हैं।
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उन्होंने कहा कि कुछ उलेमा इस्लाम की आवाज को दबाना चाहते हैं। तीन तलाक लागू करके खानदानों तबाह किया जा रहा है। मासूम बच्चों को मां की मोहब्बत से महरूम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक मजलिस की तीन तलाक के एक तलाक-ए रजई लागू होने का फतवा वह 20 वर्षों से देशभर में दे रहे हैं। सैकड़ों परेशान मर्द और औरतें उनसे फतवा ले जा चुके हैं और अपने उजड़े घरों को आबाद करने के लिए दुआए दे रहे हैं।
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मौलाना फुरकान मदनी ने कहा कि एक मजलिस के तीन तलाक के तीन लागू करने से पति-पत्नी के बीच सुलह के तमाम रास्ते खत्म हो जाते हैं। तलाकशुदा महिलाओं के सामने मुसीबत का पहाड़ खड़ा हो जाता है। इद्दत के समय महिलाएं पति की तरफ से मिलने वाले खर्च से अछूती रह जाती हैं। उलेमा पहले पति की तरफ लौटने के लिए हलाला की शर्त रखते हैं। खानदान वाले किसी और शख्स से उसका निकाह एक-दो रात के बाद तलाक की शर्त पर करा देते हैं। यह पूरी तरह गलत और गैरइस्लामी है।