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म्यूनिख में एमटेक कर रहा छात्र बोला जर्मनी में तो हालात सुधर रहे, अब मेरठ में मम्मी-पापा की चिंता
Mon, 20 Apr 2020 01:30 AM IST
मेरठ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 20 Apr 2020 01:30 AM IST
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कुछ लोग चैनलों पे गला फाड़ रहे हैं, कुछ लोग मगर जान बचाने में व्यस्त हैं
- फोटो : social media
जर्मनी में कोरोना संक्रमण फैलने के बाद लॉकडाउन हुआ तो लोगों ने अच्छे नागरिक का परिचय देते हुए उसका पालन किया। यही कारण है कि जर्मनी में अब हालात सुधर रहे हैं। लेकिन मेरठ में तो कोरोना के मरीजों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। पहले मम्मी-पापा को मेरी चिंता थी, लेकिन अब मुझे उनकी चिंता है। रोजाना कई बार बात होती है तो यही कहता हूं कि मैं ठीक हूं। बस आप अपना ख्याल रखो। ये कहना है कि जर्मनी में फंसे शास्त्रीनगर सेक्टर आठ निवासी एमटेक के छात्र अर्जुन कौशिक का।
अर्जुन ने बताया कि मैंने आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग में टॉप किया। जिसके बाद भारत और जर्मनी के एजुकेशन एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत जर्मनी में एमटेक की पढ़ाई करने लगा। यहां पर कोरोना का संक्रमण फैला तो अपने देश आने का फैसला कर लिया। 29 मार्च को फ्लाइट थी, लेकिन अचानक से भारत में लॉकडाउन हो गया। मैं और मेरे साथी यहीं फंस गए। इस मुश्किल वक्त में डाड संगठन और आईआईटी के प्रोफेसर ने सुरक्षित रहने में बहुत मदद की। उनका धन्यवाद।
फिलहात जर्मनी में हालात दिन-ब-दिन बेहतर होते जा रहे हैं। इसका सारा श्रेय लॉकडाउन के दौरान आम जनता द्वारा दिखाई गई गंभीरता को जाता है। केवल सरकार ही सब कुछ नहीं कर सकती है, इस समय सरकार का समर्थन करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन जिस तरह से भारत में मामले सामने आ रहे हैं, वह गंभीर है।
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अर्जुन का कहना है कि मुझे अब मम्मी नीरा कौशिक और पिता श्रीकांत कौशिक की चिंता है। हमें जर्मनों से सीखना चाहिए कि यदि जनता और सरकार दोनों एक साथ खड़े हों तो किसी भी स्थिति को कैसे संभाला जा सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखकर मैं मम्मी-पापा के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित हूं। हम सभी अभी असहाय हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते है कि संसार को इस पीड़ा से जल्दी राहत मिले और सब अपने परिजनों से मिल पाए। मेरे साथ यहां 60 के करीब आईआईटी के छात्र हैं, हम अभी अपने देश नहीं लौट सकते हैं।
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अर्जुन ने बताया कि मैंने आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग में टॉप किया। जिसके बाद भारत और जर्मनी के एजुकेशन एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत जर्मनी में एमटेक की पढ़ाई करने लगा। यहां पर कोरोना का संक्रमण फैला तो अपने देश आने का फैसला कर लिया। 29 मार्च को फ्लाइट थी, लेकिन अचानक से भारत में लॉकडाउन हो गया। मैं और मेरे साथी यहीं फंस गए। इस मुश्किल वक्त में डाड संगठन और आईआईटी के प्रोफेसर ने सुरक्षित रहने में बहुत मदद की। उनका धन्यवाद।
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फिलहात जर्मनी में हालात दिन-ब-दिन बेहतर होते जा रहे हैं। इसका सारा श्रेय लॉकडाउन के दौरान आम जनता द्वारा दिखाई गई गंभीरता को जाता है। केवल सरकार ही सब कुछ नहीं कर सकती है, इस समय सरकार का समर्थन करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन जिस तरह से भारत में मामले सामने आ रहे हैं, वह गंभीर है।
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अर्जुन का कहना है कि मुझे अब मम्मी नीरा कौशिक और पिता श्रीकांत कौशिक की चिंता है। हमें जर्मनों से सीखना चाहिए कि यदि जनता और सरकार दोनों एक साथ खड़े हों तो किसी भी स्थिति को कैसे संभाला जा सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखकर मैं मम्मी-पापा के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर अधिक चिंतित हूं। हम सभी अभी असहाय हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते है कि संसार को इस पीड़ा से जल्दी राहत मिले और सब अपने परिजनों से मिल पाए। मेरे साथ यहां 60 के करीब आईआईटी के छात्र हैं, हम अभी अपने देश नहीं लौट सकते हैं।