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आत्मा का मूल तत्व शुद्ध और शक्तिशाली होता है : विमर्श सागर
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मेरठ। आचार्य मुनि दिगंबराचार्य विमर्श सागर ने कहा कि आत्मा स्वयं परिष्कृत होकर ही परमात्मा बनती है। ठीक उसी तरह जैसे एक बीज विकसित होकर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। आत्मा का मूल तत्व शुद्ध और शक्तिशाली होता है।
शनिवार को शारदा रोड पर महावीर जयंती भवन में हुए धार्मिक कार्यक्रम में उन्होंने यह बात कही। महावीर जयंती भवन में समवसरण की स्थापना की गई है। श्रद्धालुओं ने इंद्र-इंद्राणी बनकर भगवान जिनेंद्र की आराधना की। यह आयोजन मेरठ धर्मनगरी के लिए विशेष सौभाग्य का विषय है।
आचार्य विमर्श सागर ने कहा कि इस पृथ्वी पर केवल तीर्थंकर परमात्मा ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी धर्मसभा को समवसरण सभा कहा जाता है। उनके पुण्य के सामने तीनों लोक के समस्त जीवों का संचित पुण्य भी नगण्य है। ऐसे महान महापुरुषों के सानिध्य में रहकर साधारण जीव भी पुण्य संचय करने लगता है। यदि बाजार से लाए गए फलों में एक सड़ा हुआ हो तो सामान्य व्यक्ति उसे फेंक देता है। एक ज्ञानी पुरुष उसे नहीं फेंकता क्योंकि वह जानता है कि भले ही उसका गूदा सड़ा हो लेकिन उसके बीज में नए वृक्ष को जन्म देने की क्षमता विद्यमान है।
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इसी प्रकार मनुष्य जीवन में भी अनेक विकार मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और प्रमाद की सड़न होती है मगर आत्मा का मूल तत्व शुद्ध और शक्तिशाली रहता है। आचार्य ने बताया कि तीर्थंकर परमात्मा ने दो प्रकार की दृष्टि द्रव्य दृष्टि और पर्याय दृष्टि प्रदान की है। एकांगी दृष्टिकोण के कारण मनुष्य केवल दोषों को ही देखता है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक व्यक्ति को इन विकारों को दूर कर आत्मतत्त्व को पहचानना चाहिए। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानकर, उसे साधकर और उसी का अभ्यास कर मनुष्य आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।
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शनिवार को शारदा रोड पर महावीर जयंती भवन में हुए धार्मिक कार्यक्रम में उन्होंने यह बात कही। महावीर जयंती भवन में समवसरण की स्थापना की गई है। श्रद्धालुओं ने इंद्र-इंद्राणी बनकर भगवान जिनेंद्र की आराधना की। यह आयोजन मेरठ धर्मनगरी के लिए विशेष सौभाग्य का विषय है।
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आचार्य विमर्श सागर ने कहा कि इस पृथ्वी पर केवल तीर्थंकर परमात्मा ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी धर्मसभा को समवसरण सभा कहा जाता है। उनके पुण्य के सामने तीनों लोक के समस्त जीवों का संचित पुण्य भी नगण्य है। ऐसे महान महापुरुषों के सानिध्य में रहकर साधारण जीव भी पुण्य संचय करने लगता है। यदि बाजार से लाए गए फलों में एक सड़ा हुआ हो तो सामान्य व्यक्ति उसे फेंक देता है। एक ज्ञानी पुरुष उसे नहीं फेंकता क्योंकि वह जानता है कि भले ही उसका गूदा सड़ा हो लेकिन उसके बीज में नए वृक्ष को जन्म देने की क्षमता विद्यमान है।
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इसी प्रकार मनुष्य जीवन में भी अनेक विकार मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और प्रमाद की सड़न होती है मगर आत्मा का मूल तत्व शुद्ध और शक्तिशाली रहता है। आचार्य ने बताया कि तीर्थंकर परमात्मा ने दो प्रकार की दृष्टि द्रव्य दृष्टि और पर्याय दृष्टि प्रदान की है। एकांगी दृष्टिकोण के कारण मनुष्य केवल दोषों को ही देखता है। उन्होंने आह्वान किया कि प्रत्येक व्यक्ति को इन विकारों को दूर कर आत्मतत्त्व को पहचानना चाहिए। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानकर, उसे साधकर और उसी का अभ्यास कर मनुष्य आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।