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15 साल बाद इंसाफ, स्मिता को याद कर नम हुईं आंखें
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
Updated Tue, 15 Dec 2015 02:01 AM IST
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मोदीपुरम। 15 साल लंबे इंतजार के बाद जब बेटी के कातिलों को सजा होने की जानकारी मिली तो स्मिता को याद कर परिजनों की आंखें नम हो गईं। स्मिता भादुडी फर्जी एनकाउंटर केस में दोषी तीनों पुलिसकर्मियों (तत्कालीन इंस्पेक्टर दौराला और दो सिपाही) को सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने उम्रकैद और अर्थदंड की सजा सुनाई है।
स्मिता के पिता और भाई ने जहां इस पर संतुष्टि जताई है तो स्मिता की बड़ी बहन का कहना है कि दोषियों को फांसी होनी चाहिए थी। वहीं, भाई ने दोषी पुलिसकर्मियों को कांट्रैक्ट किलर की संज्ञा देते हुए आरोप लगाया है कि इस पूरे चक्रव्यूह के पीछे कोई और भी है।
स्मिता के पिता एसके भादुड़ी और भाई सुप्रियो ने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। इस दिन के इंतजार में पंद्रह साल बीत चुके हैं। हालांकि अब सजा का कोई औचित्य नहीं रह जाता। लेकिन फिर भी कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह उससे संतुष्ट हैं।
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आगे जो होगा देखा जाएगा। वहीं, सुप्रियो ने कहा कि मेरी बहन को साजिश के तहत मारा गया। 15 साल बाद अब जाकर कुछ इंसाफ मिला है। लेकिन इस पूरे चक्रव्यूह में पुलिस तो मोहरा बनायी गई। पूरी कहानी के पीछे कोई और है। आरोपी पुलिसकर्मियों ने कांट्रैक्ट किलर का काम किया है। इसके बाद आरोपी इंस्पेक्टर को प्रमोशन देकर मेरठ में ही तैनात कर दिया गया था। जिसके बाद हमने शिकायत की तो उसे यहां से हटाया गया।
और कड़ी होती सजा
पिता एसके भादुड़ी ने कोर्ट का फैसला आने पर बंगलूरू में रह रही अपनी बड़ी बेटी प्रीता को फोन पर इसकी जानकारी दी। इस पर प्रीता ने कहा कि फैसला काफी देर से आया है। ऐसी घटना के बाद जल्दी कार्यवाही होनी चाहिए थी। अच्छा हुआ कि उन्हें सजा मिली। जो चला गया वह वापस नही आएगा।
मगर मुझे लगता है कि ऐसे आरोपियों के खिलाफ और कड़ी सजा होनी चाहिए थी। क्योंकि इन्होंने जानबूझकर इस घटना को अंजाम दिया है। ऐसे आरोपियों को फांसी की सजा होनी चाहिए थी।
टीवी पर रही नजर
पल्लवपुरम फेस दो की पी पॉकेट में रहने वाले एसके भादुड़ी और उनके बेटे सुप्रियो की नजरें दिन भी टीवी पर लगी रहीं। शाम को दोषी पुलिसकर्मियों को सजा की जानकारी मिलने पर उन्होंने अपनी बेटी प्रीता के अलावा अपने रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को खुद फोन कर इसकी सूचना दी।
यह था मामला
14 जनवरी 2000 की शाम दौराला थाने पर तैनात तत्कालीन इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, सिपाही सुरेंद्र और भगवान सहाय ने फर्जी मुठभेड़ कर मेरठ कॉलेज की स्नातक की छात्रा पल्लवपुरम निवासी स्मिता भादुड़ी पुत्री एसके भादुड़ी को मार डाला था।
स्मिता उस समय अपने दोस्त शास्त्रीनगर निवासी मोहित त्यागी के साथ कार में थी। विगत 10 दिसंबर को सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने तीनों पुलिस कर्मियों को दोषी करार दिया था। सोमवार को कोर्ट ने शाम करीब 4:30 बजे तीनों आरोपियों को आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा से दंडित किया।
आपकी बेटी को पुलिस ने गलती से मार दिया
मोदीपुरम। 14 जनवरी सन 2000 की वह सर्द रात थी। करीब आठ बजे पुलिस की जीप पल्लवपुरम फेस दो के पी पॉकेट स्थित एक मकान पर आकर रुकी। जीप से कुछ पुलिसकर्मी उतरे और मकान का दरवाजा खुलवाया। दरवाजा खोलने के लिए मकान मालिक एसके भादुड़ी पहुंचे तो पुलिसकर्मियों ने पूछा कि स्मिता भादुड़ी आपकी बेटी है।
हां कहने पर पुलिसकर्मियों ने कहा कि उन्हें इसी वक्त दौराला थाने चलना होगा। कई आशंकाएं लेकर थाने पहुंचने पर वहां मौजूद एसएसपी ने कहा कि पुलिस ने गलती से आपकी बेटी को मार दिया है। आप साइट पर जाकर देख लें।
दोषी पुलिसकर्मियों को सजा होने की जानकारी मिलने पर स्मिता के पिता एसके भादुड़ी बेटी को याद कर रो पड़े। उस मनहूस रात का वाक्या सुनाते हुए कहा कि जब पुलिसकर्मियों ने मुझसे थाने चलने के लिए कहा था तो मैंने पुलिसकर्मियों से बहुत पूछा कि क्या हुआ, मुझे थाने क्यों ले जाया जा रहा है।
मगर पुलिसकर्मियों ने उन्हें कुछ नही बताया। इतना ही कहा कि थाने चलकर सब पता चल जाएगा। मैं बहुत भारी मन और तमाम बुरी आशंकाओं के साथ दौराला थाने के लिए चल दिया।
कुछ देर सोचकर एसके भादुड़ी बोले कि थाने जाते वक्त मेरे मन में तरह-तरह के बुरे खयाल आ रहे थे। दौराला थाने के गेट पर पहुंचा तो देखा कि थाने के अंदर पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों की भीड़ लगी थी। अंदर पहुंचे तो तत्कालीन एसएसपी ने उन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि स्मिता आपकी बेटी है?
मेरे हां में सिर हिलाने पर एसएसपी ने बड़े ठहरे स्वर में कहा कि ‘पुलिस ने गलती से आपकी बेटी स्मिता को गोली मार दी है जिससे उसकी डेथ हो गई है, आप साइट (मौके) पर जाकर देख लें’। इतना सुनने के बाद मेरे पैरों तले जमीन निकल चुकी थी।
मैं वहीं जड़ होकर रह गया। किसी तरह मैं अपने आपको संभालकर दौराला के जंगल में मौके पर पहुंचा तो वहां मेरी लाडली बेटी स्मिता की लाश पड़ी थी। मैं उसे देखकर फफक पड़ा।
मैं समझ नहीं पाया कि आखिर एकाएक ऐसा कैसे हो सकता है। थाने में ही स्मिता का दोस्त मोहित त्यागी ठीक ठाक बैठा था। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ा तो आरोपी पुलिस कर्मियों (तत्कालीन इंस्पेक्टर दौराला अरुण कौशिक और सिपाही सुरेंद्र व भगवान सहाय) के नाम दौराला थाने पर तहरीर दी गई। मैं तभी से आज के दिन का इंतजार कर रहा था। आखिरकार 15 साल बाद कही जाकर मुझे कुछ इंसाफ मिला है।
सिपाही रो पड़े, हंसता रहा रिटायर्ड सीओ
गाजियाबाद। चर्चित स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर का मुख्य आरोपी रिटायर्ड डीएसपी अरुण कौशिक अपनी सजा के लिए जैसे पहले ही तैयार था। हालांकि दोनों अन्य आरोपी रिटायर्ड कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह के चेहरे पर टेंशन साफ झलक रही थी। अरुण कौशिक जहां कोर्ट परिसर में भी मुस्कुराता रहा, वहीं भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह गुमसुम नजर आए।
सुबह 11 बजे :
तीनों आरोपियों को डासना जेल से सीबीआई विशेष कोर्ट में पेश किया गया। इस दौरान भी अरुण कौशिक टेंशन फ्री नजर आया। अपने अधिवक्ताओं और अन्य परिजनों से बात करते हुए भी वह हंसता रहा। कोर्ट 10 दिसंबर को ही इस एनकाउंटर में दोषी करार दे चुकी थी, इसके बावजूद रिटायर्ड डीएसपी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
दोपहर 1.20 बजे :
सजा पर बहस पूरी होने पर तीनों आरोपियों को कोर्ट के आदेश पर वापस कचहरी हवालात पहुंचा दिया गया। कोर्ट से कचहरी जाते हुए भी कौशिक मीडिया को देखकर मुस्कुराता रहा। इस दौरान वह यह भी कह गए कि ‘अभी फोटो मत खींचो भाई. फैसला आ जाने दो, तब खींच लेना।’
शाम 4:15 बजे :
आरोपियों को एक बार फिर से कचहरी हवालात से सीबीआई कोर्ट में पेश किया गया। चौथी मंजिल पर स्थित सीबीआई विशेष न्यायाधीश नवनीत कुमार की कोर्ट में पेशी से पूर्व तीनों आरोपियों को बाहर गैलरी में ही रोक लिया गया।
शाम 4.40 बजे
ठीक इसी समय पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। फैसला सुनते ही कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह की आंखों में आंसू आ गए, मगर डीएसपी की मुस्कान पर कोई असर नहीं पड़ा।
अधिवक्ता ने कहा ठीक हुआ...तो चिल्लाए परिजन
सजा सुनाए जाने के बाद अरुण कौशिक समेत तीनों आरोपियों को लेकर पुलिसकर्मी जब कचहरी हवालात की ओर जा रहे थे, तभी एक अधिवक्ता ने आरोपियों पर कमेंट्स करते हुए कहा कि ‘ठीक हुआ इनके साथ... जैसी करनी-वैसी भरनी।’
अधिवक्ता के इस कमेंट्स पर दोषियों के साथ आया एक युवक झल्ला उठा और गालीगलौज करने लगा। उधर से अधिवक्ता ने विरोध किया तो लोगों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर शांत कराया।
अभियोजन की दलील:
स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की अपील सीबीआई के वरिष्ठ लोक अभियोजक कुलदीप पुष्कर ने की। अपनी दलील में सीनियर पीपी का कहना था कि ‘अभियुक्तों के खिलाफ 302/307/34 और 323 आईपीसी के आरोप साबित हो चुके हैं। अभियुक्त घटना के समय पुलिसकर्मी थे।
उन पर कानून का पालन करने और कराने का दायित्व था। घटना के समय भी अभियुक्तों पर सरकारी असलाह थे, परंतु अभियुक्तों द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन न कर हत्या जैसा अपराध कारित किया गया है। एक 20 वर्षीया तरुणी की हत्या की है। इसके साथ ही मोहित त्यागी की हत्या का प्रयास किया गया है। ऐेसे में अभियुक्तों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।
बचाव पक्ष की दलील:
बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर त्यागी ने तर्क दिया कि सभी अभियुक्त सेवा से बाहर हो चुके हैं। वह अब वृद्धावस्था में हैं। उन्होंने जानबूझकर अपराध नहीं किया। यह केस विरल से विरलतम अपराध की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में उनके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए कम से कम दंड दिए जाने की प्रार्थना की गई।
खाकी नहीं लेती सबक
मेरठ। स्मिता भादुड़ी फर्जी एनकाउंटर केस तथाकथित बहादुर पुलिसकर्मियों के लिए सबक बना है। जो मेडल और प्रमोशन की चाह में अंधे हो जाते हैं। यही नहीं, पुलिस कस्टडी डेथ या थानों से बाहर भी खाकी का भयावह चेहरा कई बार उजागर हुआ है। मानवाधिकार और महिला आयोग में यूपी पुलिस की शिकायतों की भरमार है।
स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर केस में सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद के आए फैसले पर पुलिस महकमे की भी नजर टिकी थी कि आखिर दोषी पुलिसकर्मियों को क्या सजा मिलेगी। सोमवार को इसकी चर्चा भी रही कि स्नातक की एक छात्रा को फर्जी एनकाउंटर में मार गिराना पुलिस महकमे के लिए बड़ा सबक है। लेकिन धरातल पर पुलिस की स्थिति आज भी क्या है, कौन नहीं जानता।
यूपी पुलिस को सुधारने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर गाइड लाइन जारी की जाती है। थानों में भी सर्वोच्च न्यायालय के बोर्ड लगे हैं। लेकिन सच्चाई इससे अलग है।
पुलिस झूठी वाहवाही बटोरने के चक्कर में इतनी गंभीर लापरवाही कर बैठती है कि एक निर्दोष के खून से हाथ रंग लेती है। कस्टडी डेथ के अलावा थानों में पीड़ितों का उत्पीड़न आज भी होता है। पीड़ितों की सुनवाई तक नहीं होती।
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स्मिता के पिता और भाई ने जहां इस पर संतुष्टि जताई है तो स्मिता की बड़ी बहन का कहना है कि दोषियों को फांसी होनी चाहिए थी। वहीं, भाई ने दोषी पुलिसकर्मियों को कांट्रैक्ट किलर की संज्ञा देते हुए आरोप लगाया है कि इस पूरे चक्रव्यूह के पीछे कोई और भी है।
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स्मिता के पिता एसके भादुड़ी और भाई सुप्रियो ने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। इस दिन के इंतजार में पंद्रह साल बीत चुके हैं। हालांकि अब सजा का कोई औचित्य नहीं रह जाता। लेकिन फिर भी कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह उससे संतुष्ट हैं।
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और कड़ी होती सजा
पिता एसके भादुड़ी ने कोर्ट का फैसला आने पर बंगलूरू में रह रही अपनी बड़ी बेटी प्रीता को फोन पर इसकी जानकारी दी। इस पर प्रीता ने कहा कि फैसला काफी देर से आया है। ऐसी घटना के बाद जल्दी कार्यवाही होनी चाहिए थी। अच्छा हुआ कि उन्हें सजा मिली। जो चला गया वह वापस नही आएगा।
मगर मुझे लगता है कि ऐसे आरोपियों के खिलाफ और कड़ी सजा होनी चाहिए थी। क्योंकि इन्होंने जानबूझकर इस घटना को अंजाम दिया है। ऐसे आरोपियों को फांसी की सजा होनी चाहिए थी।
टीवी पर रही नजर
पल्लवपुरम फेस दो की पी पॉकेट में रहने वाले एसके भादुड़ी और उनके बेटे सुप्रियो की नजरें दिन भी टीवी पर लगी रहीं। शाम को दोषी पुलिसकर्मियों को सजा की जानकारी मिलने पर उन्होंने अपनी बेटी प्रीता के अलावा अपने रिश्तेदारों और शुभचिंतकों को खुद फोन कर इसकी सूचना दी।
यह था मामला
14 जनवरी 2000 की शाम दौराला थाने पर तैनात तत्कालीन इंस्पेक्टर अरुण कौशिक, सिपाही सुरेंद्र और भगवान सहाय ने फर्जी मुठभेड़ कर मेरठ कॉलेज की स्नातक की छात्रा पल्लवपुरम निवासी स्मिता भादुड़ी पुत्री एसके भादुड़ी को मार डाला था।
स्मिता उस समय अपने दोस्त शास्त्रीनगर निवासी मोहित त्यागी के साथ कार में थी। विगत 10 दिसंबर को सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद ने तीनों पुलिस कर्मियों को दोषी करार दिया था। सोमवार को कोर्ट ने शाम करीब 4:30 बजे तीनों आरोपियों को आजीवन कारावास और अर्थदंड की सजा से दंडित किया।
आपकी बेटी को पुलिस ने गलती से मार दिया
मोदीपुरम। 14 जनवरी सन 2000 की वह सर्द रात थी। करीब आठ बजे पुलिस की जीप पल्लवपुरम फेस दो के पी पॉकेट स्थित एक मकान पर आकर रुकी। जीप से कुछ पुलिसकर्मी उतरे और मकान का दरवाजा खुलवाया। दरवाजा खोलने के लिए मकान मालिक एसके भादुड़ी पहुंचे तो पुलिसकर्मियों ने पूछा कि स्मिता भादुड़ी आपकी बेटी है।
हां कहने पर पुलिसकर्मियों ने कहा कि उन्हें इसी वक्त दौराला थाने चलना होगा। कई आशंकाएं लेकर थाने पहुंचने पर वहां मौजूद एसएसपी ने कहा कि पुलिस ने गलती से आपकी बेटी को मार दिया है। आप साइट पर जाकर देख लें।
दोषी पुलिसकर्मियों को सजा होने की जानकारी मिलने पर स्मिता के पिता एसके भादुड़ी बेटी को याद कर रो पड़े। उस मनहूस रात का वाक्या सुनाते हुए कहा कि जब पुलिसकर्मियों ने मुझसे थाने चलने के लिए कहा था तो मैंने पुलिसकर्मियों से बहुत पूछा कि क्या हुआ, मुझे थाने क्यों ले जाया जा रहा है।
मगर पुलिसकर्मियों ने उन्हें कुछ नही बताया। इतना ही कहा कि थाने चलकर सब पता चल जाएगा। मैं बहुत भारी मन और तमाम बुरी आशंकाओं के साथ दौराला थाने के लिए चल दिया।
कुछ देर सोचकर एसके भादुड़ी बोले कि थाने जाते वक्त मेरे मन में तरह-तरह के बुरे खयाल आ रहे थे। दौराला थाने के गेट पर पहुंचा तो देखा कि थाने के अंदर पुलिस अधिकारियों और पुलिस कर्मियों की भीड़ लगी थी। अंदर पहुंचे तो तत्कालीन एसएसपी ने उन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि स्मिता आपकी बेटी है?
मेरे हां में सिर हिलाने पर एसएसपी ने बड़े ठहरे स्वर में कहा कि ‘पुलिस ने गलती से आपकी बेटी स्मिता को गोली मार दी है जिससे उसकी डेथ हो गई है, आप साइट (मौके) पर जाकर देख लें’। इतना सुनने के बाद मेरे पैरों तले जमीन निकल चुकी थी।
मैं वहीं जड़ होकर रह गया। किसी तरह मैं अपने आपको संभालकर दौराला के जंगल में मौके पर पहुंचा तो वहां मेरी लाडली बेटी स्मिता की लाश पड़ी थी। मैं उसे देखकर फफक पड़ा।
मैं समझ नहीं पाया कि आखिर एकाएक ऐसा कैसे हो सकता है। थाने में ही स्मिता का दोस्त मोहित त्यागी ठीक ठाक बैठा था। इसके बाद मामले ने तूल पकड़ा तो आरोपी पुलिस कर्मियों (तत्कालीन इंस्पेक्टर दौराला अरुण कौशिक और सिपाही सुरेंद्र व भगवान सहाय) के नाम दौराला थाने पर तहरीर दी गई। मैं तभी से आज के दिन का इंतजार कर रहा था। आखिरकार 15 साल बाद कही जाकर मुझे कुछ इंसाफ मिला है।
सिपाही रो पड़े, हंसता रहा रिटायर्ड सीओ
गाजियाबाद। चर्चित स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर का मुख्य आरोपी रिटायर्ड डीएसपी अरुण कौशिक अपनी सजा के लिए जैसे पहले ही तैयार था। हालांकि दोनों अन्य आरोपी रिटायर्ड कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह के चेहरे पर टेंशन साफ झलक रही थी। अरुण कौशिक जहां कोर्ट परिसर में भी मुस्कुराता रहा, वहीं भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह गुमसुम नजर आए।
सुबह 11 बजे :
तीनों आरोपियों को डासना जेल से सीबीआई विशेष कोर्ट में पेश किया गया। इस दौरान भी अरुण कौशिक टेंशन फ्री नजर आया। अपने अधिवक्ताओं और अन्य परिजनों से बात करते हुए भी वह हंसता रहा। कोर्ट 10 दिसंबर को ही इस एनकाउंटर में दोषी करार दे चुकी थी, इसके बावजूद रिटायर्ड डीएसपी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी।
दोपहर 1.20 बजे :
सजा पर बहस पूरी होने पर तीनों आरोपियों को कोर्ट के आदेश पर वापस कचहरी हवालात पहुंचा दिया गया। कोर्ट से कचहरी जाते हुए भी कौशिक मीडिया को देखकर मुस्कुराता रहा। इस दौरान वह यह भी कह गए कि ‘अभी फोटो मत खींचो भाई. फैसला आ जाने दो, तब खींच लेना।’
शाम 4:15 बजे :
आरोपियों को एक बार फिर से कचहरी हवालात से सीबीआई कोर्ट में पेश किया गया। चौथी मंजिल पर स्थित सीबीआई विशेष न्यायाधीश नवनीत कुमार की कोर्ट में पेशी से पूर्व तीनों आरोपियों को बाहर गैलरी में ही रोक लिया गया।
शाम 4.40 बजे
ठीक इसी समय पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। फैसला सुनते ही कांस्टेबल भगवान सहाय और सुरेंद्र सिंह की आंखों में आंसू आ गए, मगर डीएसपी की मुस्कान पर कोई असर नहीं पड़ा।
अधिवक्ता ने कहा ठीक हुआ...तो चिल्लाए परिजन
सजा सुनाए जाने के बाद अरुण कौशिक समेत तीनों आरोपियों को लेकर पुलिसकर्मी जब कचहरी हवालात की ओर जा रहे थे, तभी एक अधिवक्ता ने आरोपियों पर कमेंट्स करते हुए कहा कि ‘ठीक हुआ इनके साथ... जैसी करनी-वैसी भरनी।’
अधिवक्ता के इस कमेंट्स पर दोषियों के साथ आया एक युवक झल्ला उठा और गालीगलौज करने लगा। उधर से अधिवक्ता ने विरोध किया तो लोगों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर शांत कराया।
अभियोजन की दलील:
स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की अपील सीबीआई के वरिष्ठ लोक अभियोजक कुलदीप पुष्कर ने की। अपनी दलील में सीनियर पीपी का कहना था कि ‘अभियुक्तों के खिलाफ 302/307/34 और 323 आईपीसी के आरोप साबित हो चुके हैं। अभियुक्त घटना के समय पुलिसकर्मी थे।
उन पर कानून का पालन करने और कराने का दायित्व था। घटना के समय भी अभियुक्तों पर सरकारी असलाह थे, परंतु अभियुक्तों द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन न कर हत्या जैसा अपराध कारित किया गया है। एक 20 वर्षीया तरुणी की हत्या की है। इसके साथ ही मोहित त्यागी की हत्या का प्रयास किया गया है। ऐेसे में अभियुक्तों को सख्त से सख्त सजा दी जाए।
बचाव पक्ष की दलील:
बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर त्यागी ने तर्क दिया कि सभी अभियुक्त सेवा से बाहर हो चुके हैं। वह अब वृद्धावस्था में हैं। उन्होंने जानबूझकर अपराध नहीं किया। यह केस विरल से विरलतम अपराध की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में उनके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए कम से कम दंड दिए जाने की प्रार्थना की गई।
खाकी नहीं लेती सबक
मेरठ। स्मिता भादुड़ी फर्जी एनकाउंटर केस तथाकथित बहादुर पुलिसकर्मियों के लिए सबक बना है। जो मेडल और प्रमोशन की चाह में अंधे हो जाते हैं। यही नहीं, पुलिस कस्टडी डेथ या थानों से बाहर भी खाकी का भयावह चेहरा कई बार उजागर हुआ है। मानवाधिकार और महिला आयोग में यूपी पुलिस की शिकायतों की भरमार है।
स्मिता भादुड़ी एनकाउंटर केस में सीबीआई कोर्ट गाजियाबाद के आए फैसले पर पुलिस महकमे की भी नजर टिकी थी कि आखिर दोषी पुलिसकर्मियों को क्या सजा मिलेगी। सोमवार को इसकी चर्चा भी रही कि स्नातक की एक छात्रा को फर्जी एनकाउंटर में मार गिराना पुलिस महकमे के लिए बड़ा सबक है। लेकिन धरातल पर पुलिस की स्थिति आज भी क्या है, कौन नहीं जानता।
यूपी पुलिस को सुधारने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर गाइड लाइन जारी की जाती है। थानों में भी सर्वोच्च न्यायालय के बोर्ड लगे हैं। लेकिन सच्चाई इससे अलग है।
पुलिस झूठी वाहवाही बटोरने के चक्कर में इतनी गंभीर लापरवाही कर बैठती है कि एक निर्दोष के खून से हाथ रंग लेती है। कस्टडी डेथ के अलावा थानों में पीड़ितों का उत्पीड़न आज भी होता है। पीड़ितों की सुनवाई तक नहीं होती।