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हाशिमपुरा कांड: पीड़ितों को मुस्लिम लॉ के तहत मुआवजा देने पर रोक, हाईकोर्ट ने आयोग को दिया निर्देश

Fri, 16 Dec 2016 10:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ Updated Fri, 16 Dec 2016 10:28 AM IST
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stay order by court on compulsation for hasimpura
लोगो - फोटो : अमर उजाला
हाईकोर्ट ने हाशिमपुरा नरसंहार मामले में पीड़ितों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुआवजा प्रदान करने संबंधी मेरठ विधिक सेवा आयोग के निर्णय पर रोक लगा दी है। अदालत ने आयोग को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत कितने लोगों को मुआवजा प्रदान किया गया और अब कितने लोग मुआवजा पाने से रह गए हैं।
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वहीं न्यायमूर्ति गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की आपत्ति पर यह रोक लगाई है। एनएचआरसी की ओर से पेश अधिवक्ता रुबेका जॉन ने अदालत को बताया कि आयोग पीड़ितों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुआवजा प्रदान कर रहा है। तय नियमों के तहत यानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 (ए) के तहत सेक्युलर लॉ के अनुसार मुआवजा किसी भी हालत में किसी धार्मिक आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
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गौरतलब है कि मुस्लिम लॉ में किसी व्यक्ति की मौत होने पर उसकी पत्नी के अलावा माता-पिता व अन्य को भी मुआवजे की राशि का हक मिलता है, जबकि लॉ के अनुसार मृतक की पत्नी ही मुआवजे की हकदार है। यूपी सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि मुआवजा तय करने में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती और आयोग का सदस्य न्यायिक अधिकारी होता है। खंडपीठ ने सभी तथ्यों को देखने के बाद अगले आदेश तक पीड़ितों को मुस्लिम लॉ के अनुसार मुआवजा प्रदान करने पर रोक लगा दी। अदालत ने आयोग को इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश देेते हुए सुनवाई के लिए 12 जनवरी की तारीख तय कर दी।
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खंडपीठ इस मामले में आरोपी बनाए गए पीएसी के 16 जवानों को निचली अदालत द्वारा 21 मार्च 2015 को बरी करने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही है। निचली अदालत के फैसले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), यूपी सरकार के साथ ही पीड़ित परिवारों ने चुनौती दी है।


क्या है मामला
मेरठ स्थित हाशिमपुरा में 22 मई 1987 को बड़ी संख्या में पीएसी के जवान पहुंचे थे। इन जवानों ने वहां मस्जिद के सामने चल रही धार्मिक सभा में से एक समुदाय के करीब 50 लोगों को हिरासत में लिया। आरोप था कि 42 लोगों की गोली मारकर हत्या करने के बाद उनके शव गंग नहर में फेंक दिए गए थे। उत्तर प्रदेश पुलिस ने वर्ष 1996 में गाजियाबाद, मुख्य न्यायिक न्यायाधीश की अदालत में आरोप पत्र दायर किया था। आरोप पत्र में 19 लोगों को हत्या, हत्या का प्रयास, साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ और साजिश करने की धाराओं में आरोपी बनाया गया था। वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दिल्ली अदालत में स्थानांतरित कर दिया था। वर्तमान में मामले में आरोपी बनाए गए 16 लोग जीवित हैं, जबकि तीन की मौत हो चुकी है।
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