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Meerut News: सीसीएसयू की शोध क्रांति से स्मार्ट तकनीक को नई उड़ान
Sun, 28 Jun 2026 01:39 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
Updated Sun, 28 Jun 2026 01:39 AM IST
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- सीसीएसयू ने विकसित की तकनीक
- सात देशों के वैज्ञानिकों संग किया शोध
मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के वैज्ञानिकों ने सात देशों के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर ऐसी नई तकनीक विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है, जिससे भविष्य में स्मार्टफोन, चिकित्सा उपकरण, एआई आधारित मशीनें, स्वचालित वाहन और संचार प्रणाली पहले से अधिक तेज, सटीक और ऊर्जा की बचत करने वाली बन सकती हैं।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भारत सहित सात देशों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर पेरोव्स्काइट फोटोडिटेक्टर पर महत्वपूर्ण शोध किया है। आसान भाषा में समझें तो पेरोव्स्काइट एक विशेष प्रकार की सामग्री है, जिससे बेहद संवेदनशील प्रकाश सेंसर बनाए जा सकते हैं। वहीं फोटोडिटेक्टर ऐसा उपकरण होता है, जो प्रकाश को पहचानकर उसे विद्युत संकेतों में बदल देता है। यही तकनीक कैमरा, मोबाइल, मेडिकल उपकरण और कई स्मार्ट मशीनों में उपयोग होती है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका कार्बन एनर्जी में प्रकाशित हुआ है। इसमें भारत, मलेशिया, चीन, ग्रीस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और चेक गणराज्य के वैज्ञानिक शामिल रहे। भारत की ओर से सीसीएसयू के डॉ. दीपक कुमार, डॉ. नैनी जैन और प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
शोध के अनुसार नई तकनीक से बने प्रकाश सेंसर अभी उपयोग में आने वाले सिलिकॉन आधारित सेंसरों की तुलना में अधिक तेज, अधिक संवेदनशील और कम बिजली खर्च करने वाले हैं। ये पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट), सामान्य दिखाई देने वाली रोशनी और निकट-अवरक्त (इन्फ्रारेड) प्रकाश तक को आसानी से पहचान सकते हैं। इसका मतलब है कि ये अलग-अलग तरह की रोशनी में भी बेहतर ढंग से काम कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इस तकनीक का उपयोग स्मार्टफोन, स्वास्थ्य जांच करने वाले उपकरण, बिना चालक वाले वाहन, पर्यावरण की निगरानी, उपग्रह संचार, सुरक्षा प्रणालियों और एआई यानी इंसानों की तरह सीखने और निर्णय लेने वाली स्मार्ट मशीनों में किया जा सकेगा। इसकी एक और खासियत यह है कि इसे कम लागत में हल्के, लचीले और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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अभी और शोध की जरूरत
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को बाजार में बड़े स्तर पर लाने से पहले इसकी मजबूती, नमी और गर्मी में लंबे समय तक टिके रहने, इसमें उपयोग होने वाले सीसे के सुरक्षित विकल्प खोजने और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसी चुनौतियों पर अभी और शोध की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और लगातार अनुसंधान से इन चुनौतियों का समाधान संभव है।
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- सात देशों के वैज्ञानिकों संग किया शोध
मेरठ: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के वैज्ञानिकों ने सात देशों के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर ऐसी नई तकनीक विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है, जिससे भविष्य में स्मार्टफोन, चिकित्सा उपकरण, एआई आधारित मशीनें, स्वचालित वाहन और संचार प्रणाली पहले से अधिक तेज, सटीक और ऊर्जा की बचत करने वाली बन सकती हैं।
विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भारत सहित सात देशों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर पेरोव्स्काइट फोटोडिटेक्टर पर महत्वपूर्ण शोध किया है। आसान भाषा में समझें तो पेरोव्स्काइट एक विशेष प्रकार की सामग्री है, जिससे बेहद संवेदनशील प्रकाश सेंसर बनाए जा सकते हैं। वहीं फोटोडिटेक्टर ऐसा उपकरण होता है, जो प्रकाश को पहचानकर उसे विद्युत संकेतों में बदल देता है। यही तकनीक कैमरा, मोबाइल, मेडिकल उपकरण और कई स्मार्ट मशीनों में उपयोग होती है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका कार्बन एनर्जी में प्रकाशित हुआ है। इसमें भारत, मलेशिया, चीन, ग्रीस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और चेक गणराज्य के वैज्ञानिक शामिल रहे। भारत की ओर से सीसीएसयू के डॉ. दीपक कुमार, डॉ. नैनी जैन और प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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शोध के अनुसार नई तकनीक से बने प्रकाश सेंसर अभी उपयोग में आने वाले सिलिकॉन आधारित सेंसरों की तुलना में अधिक तेज, अधिक संवेदनशील और कम बिजली खर्च करने वाले हैं। ये पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट), सामान्य दिखाई देने वाली रोशनी और निकट-अवरक्त (इन्फ्रारेड) प्रकाश तक को आसानी से पहचान सकते हैं। इसका मतलब है कि ये अलग-अलग तरह की रोशनी में भी बेहतर ढंग से काम कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इस तकनीक का उपयोग स्मार्टफोन, स्वास्थ्य जांच करने वाले उपकरण, बिना चालक वाले वाहन, पर्यावरण की निगरानी, उपग्रह संचार, सुरक्षा प्रणालियों और एआई यानी इंसानों की तरह सीखने और निर्णय लेने वाली स्मार्ट मशीनों में किया जा सकेगा। इसकी एक और खासियत यह है कि इसे कम लागत में हल्के, लचीले और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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अभी और शोध की जरूरत
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को बाजार में बड़े स्तर पर लाने से पहले इसकी मजबूती, नमी और गर्मी में लंबे समय तक टिके रहने, इसमें उपयोग होने वाले सीसे के सुरक्षित विकल्प खोजने और बड़े पैमाने पर उत्पादन जैसी चुनौतियों पर अभी और शोध की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और लगातार अनुसंधान से इन चुनौतियों का समाधान संभव है।