कारगिल युद्ध: सीने पर 40 गोलियां खाकर शहीद हुए थे जांबाज जुबैर, पत्नी से कही थी ये आखिरी बात
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26 जुलाई! कारगिल विजय दिवस। भारतीय सेना के अदम्य साहस और शौर्य का प्रतीक यह दिवस दास्तां कहता है उन शहीदों की, जो मातृभूमि पर न्यौछावर हो गए। लेकिन दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया। इस जंग में मेरठ के रणबांकुरों ने भी अद्भुत पराक्रम का परिचय दिया। कई जवानों ने कारगिल की चोटियों पर तिरंगा फहराने और दुश्मन का खात्मा करने के बाद ही शहादत पाई। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ‘अमर उजाला’ द्वारा शुरू की गई इस शृंखला में शहीदों के पराक्रम की गाथा है। वहीं वर्तमान में उनका परिवार कैसा है और आज क्या सोचता है, इस पर भी नजर डाली गई है....
छुट्टी लेकर घर आए थे कि अचानक कारगिल में लड़ाई छिड़ गई। रेडियो पर जैसे ही सुना तो सामान लगाने लगे। मैने पूछा क्या हो गया? तो मुस्कुराने लगे। कहने लगे कि जिसका इंतजार था... वो वक्त आ गया है। देश के लिए दुश्मन से सीधे लड़ने का मौका मिल गया। जाना पड़ेगा।
अभी तो छुट्टी बची हैं..., इतना खतरा है.... मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कहने लगे ...फौजी हूं। जंग में घर बैठ गया तो जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा। यही तो मौका है देश के लिए कुछ कर दिखाने का। जिंदगी रही तो फिर मिलूंगा। वह चले गए। लेकिन लौटकर वापस नहीं आए। तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर आया। सीने पर 40 गोलियां खाईं थीं। बहुत जिंदादिल थे। इतना कहकर वीर नारी इमराना अतीत में खो जाती हैं।
मूल रूप से मेरठ के थाना परीक्षितगढ़ के गांव ललियाना निवासी जुबैर अहमद की 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद में तैनाती थी। वर्तमान में उनका परिवार नौचंदी थाना क्षेत्र में जैदी फार्म गली नंबर दो में रह रहा है। यहां अपनी बेटियों सना परवीन, निशा परवीन और बेटे खालिद जुबैर के साथ रहने वालीं वीर नारी इमराना उर्फ रानी के लिए वो वक्त आज भी भुलाए नहीं भूलता। जून 1999 की बात है। जुबैर अहमद का हैदराबाद से जम्मू के लिए तबादला हो गया था। जुबैर पत्नी और बच्चों को छोड़ने के लिए छुट्टी लेकर मेरठ आ गए। इसी दौरान कारगिल की जंग शुरू हो गई। जुबैर आनन फानन में घर पहुंचे और अपना बैग लगाने लगे। उन्होंने इमराना को बताया कि कारगिल में दुश्मन ने हमारे सैनिकों पर हमला बोल दिया है। मुझे भी जाना होगा।
इमराना ने कहा कि अभी तो 20 दिन की छुट्टी बची है। लेकिन जुबैर अहमद बेचैन हुए जा रहे थे। कहा कि सेना में जिस तरह से मेरे दादा सरफतउल्ला खां ने देश के लिए कई लड़ाई लड़ी हैं, मुझे भी लड़नी हैं। दुश्मन से आमने-सामने लड़ने का बहुत मन है इसलिए तो सेना में भर्ती हुआ था। परिवार को दिलासा देकर वे चले गए। इसके बाद कोई सूचना नहीं आई। कुछ दिन बाद थाने से सिपाही पहुंचा तो पता चला कि तीन जुलाई को जुबैर हिंद पहाड़ी पर लड़ते-लड़ते शहीद हो गए।
इमराना बताती हैं कि निकाह को छह साल हुए थे। बेटा खालिद महज छह माह का था। बड़ी बेटी सना साढ़े चार साल और छोटी ढाई साल की थी। बच्चों को तो कुछ पता ही नहीं था। जिंदगी को जैसे तैसे खींचकर यहां तक लाई हैं। बच्चों को पढ़ा रही हैं ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। उनकी इच्छा थी कि छोटी बेटी को खिलाड़ी बनाऊं। वे खुद भी तो खिलाड़ी थे। बॉक्सिंग में कितने ही पुरस्कार जीतकर लाए थे।
दादा की तरह लड़ूंगा देश के लिए
बीबीए सेकेंड ईयर की छात्रा निशा परवीन की इच्छा सेना में अफसर बनने की है। बड़ी बेटी सना एमए अंग्रेजी करने के बाद पीएचडी करके प्रोफेसर बनना चाहती हैं। दोनों बेटियां बताती हैं कि जब भी पापा के बारे में बात होती है तो उन्हें फख्र होता है कि वे देश पर कुर्बान होने वाले शहीद की बेटी हैं।
इमराना बताती हैं कि शहीद के परिवार का दर्द कोई नहीं समझता है। नम आंखों से बताती हैं कि बहुत दिक्कतें आईं। इतनी कि जिक्र करने लगें तो कई दिन के पेज भर जाएंगे। इमराना ने बताया कि बेटी को 12वीं के बाद एएमयू में दाखिला दिलाना चाहती थीं। लेकिन नहीं हुआ। शहीद परिवार का कोटा भी नहीं दिया। उत्तर प्रदेश सरकार से आज तक पेंशन नहीं बनी है। जो जमीन सरकार ने देने की घोषणा की थी, आज तक उसके लिए डीएम हापुड़ के ऑफिस के चक्कर लगा रही हैं।
आगे बेटियों को नौकरी मिलेगी या नहीं, इसका भी पता नहीं है। जब तिरंगे में लिपटे शहीदों के शव आते हैं तो पता नहीं क्या-क्या वादे होते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हर कोई भूल जाता है। और तो छोड़िए शहीद परिवारों का सम्मान तक भूल जाते हैं।
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