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वीरांगनाओं के सती मठों का होगा कायाकल्प, मिलेगी पहचान
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रेहड़ में सतीमठ। संवाद
बिजनौर। यूं तो सतीत्व की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाली वीरांगनाओं के मठ जर्जर हो गए है मगर अब इनका कायाकल्प होने जा रहा है। दरअसल जिले के सती मठों के सुंदरीकरण का प्रस्ताव तैयार किया गया है। जिसमें सती मठ के विकास के साथ साथ इतिहास की जानकारी भी प्रदर्शित की जाएगी।
ब्रिटिश काल से पहले तक भारत में सती प्रथा प्रचलन में रही। ब्रिटिश शासनकाल के वक्त इस प्रथा पर महिला अधिकारों का हवाला देते हुए पाबंदी लगा दी। मगर, जिले में सती मठ उस वक्त की वीरांगनाओं का इतिहास खंडहरों में समेटे हुए हैं। ये सती मठ अब जर्जर हो गए हैं। जिनके इतिहास को देखते हुए प्रशासन ने कायाकल्प का खाका तैयार किया है। कायाकल्प के साथ ही संबंधित मठ की वीरांगना के बारे में जानकारी प्रदर्शित होगी।
खिलजी को चुनौती का प्रमाण हैं रेहड़ के मठ
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से कालागढ़ दर्रा होते हुए अफगानिस्तान गया, जिसने बरसात के चलते रेहड़ के पास कुछ दिनों के लिए अपना पड़ाव डाला। खिलजी की सेना ने रसद की आपूर्ति के लिए स्थानीय लोगों और जागीरदारों के पशुओं को पकड़कर भोजन में इस्तेमाल शुरू कर दिया। फसलें भी लूटी गई। खिलजी की सेना के विरोध में संघर्ष हुआ और तमाम लोग मारे गए थे। इन परिवारों की महिलाएं सती हो गई थी। जिनकी याद में सतीमठ बन गए।
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विजयपुर में 1794 में सती हो गई थीं चार रानी
साहनपुर रियासत के कुंवर भारतेंद्र सिंह बताते हैं कि साल 1794 में राजपरिवार के लोगों पर ज्वालापुर में हमला करते हुए मार दिया गया था, उस वक्त चार रानी विजयपुर में सती हो गई थी। चार रानियों के सती मठ बने हुए हैं, जिनका रखरखाव रियासत करती है।
मंडावर और किरतपुर में भी हैं सती मठ
एक सती मठ किरतपुर में हैं, जोकि अब सरस्वती शिशु मंदिर के परिसर में आ चुका है। इसके अलावा एक सती मठ स्वाहेड़ी में हैं। स्वाहेड़ी की बेटी का साहनपुर राजपरिवार में रिश्ता हुआ था, मगर ज्वालापुर में हुए हमले के बाद बिना ब्याह के ही सिर्फ सगाई के चलते स्वाहेड़ी की बेटी सती हो गई थी। इसके अलावा मंडावर में भी वीरांगनाओं के सती मठ हैं।
जिले में सभी सती मठों को चिह्नित कर उनके सुंदरीकरण का प्रस्ताव बनाया है। सबसे पहले चरण में इनके इतिहास को तलाश कर इन्हें पहचान दिलाई जाएगी। इसके बाद इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी है।
-- पूर्ण बोरा, सीडीओ, बिजनौर
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ब्रिटिश काल से पहले तक भारत में सती प्रथा प्रचलन में रही। ब्रिटिश शासनकाल के वक्त इस प्रथा पर महिला अधिकारों का हवाला देते हुए पाबंदी लगा दी। मगर, जिले में सती मठ उस वक्त की वीरांगनाओं का इतिहास खंडहरों में समेटे हुए हैं। ये सती मठ अब जर्जर हो गए हैं। जिनके इतिहास को देखते हुए प्रशासन ने कायाकल्प का खाका तैयार किया है। कायाकल्प के साथ ही संबंधित मठ की वीरांगना के बारे में जानकारी प्रदर्शित होगी।
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खिलजी को चुनौती का प्रमाण हैं रेहड़ के मठ
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से कालागढ़ दर्रा होते हुए अफगानिस्तान गया, जिसने बरसात के चलते रेहड़ के पास कुछ दिनों के लिए अपना पड़ाव डाला। खिलजी की सेना ने रसद की आपूर्ति के लिए स्थानीय लोगों और जागीरदारों के पशुओं को पकड़कर भोजन में इस्तेमाल शुरू कर दिया। फसलें भी लूटी गई। खिलजी की सेना के विरोध में संघर्ष हुआ और तमाम लोग मारे गए थे। इन परिवारों की महिलाएं सती हो गई थी। जिनकी याद में सतीमठ बन गए।
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विजयपुर में 1794 में सती हो गई थीं चार रानी
साहनपुर रियासत के कुंवर भारतेंद्र सिंह बताते हैं कि साल 1794 में राजपरिवार के लोगों पर ज्वालापुर में हमला करते हुए मार दिया गया था, उस वक्त चार रानी विजयपुर में सती हो गई थी। चार रानियों के सती मठ बने हुए हैं, जिनका रखरखाव रियासत करती है।
मंडावर और किरतपुर में भी हैं सती मठ
एक सती मठ किरतपुर में हैं, जोकि अब सरस्वती शिशु मंदिर के परिसर में आ चुका है। इसके अलावा एक सती मठ स्वाहेड़ी में हैं। स्वाहेड़ी की बेटी का साहनपुर राजपरिवार में रिश्ता हुआ था, मगर ज्वालापुर में हुए हमले के बाद बिना ब्याह के ही सिर्फ सगाई के चलते स्वाहेड़ी की बेटी सती हो गई थी। इसके अलावा मंडावर में भी वीरांगनाओं के सती मठ हैं।
जिले में सभी सती मठों को चिह्नित कर उनके सुंदरीकरण का प्रस्ताव बनाया है। सबसे पहले चरण में इनके इतिहास को तलाश कर इन्हें पहचान दिलाई जाएगी। इसके बाद इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी है।