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सेना के रिटायर्ड डॉग्स को मिलेगी जिंदगी, अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही प्रथा खत्म

Sun, 20 May 2018 02:48 PM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ Updated Sun, 20 May 2018 02:48 PM IST
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Retired Dogs of Army will get life, British rule ends
फाइल फोटो

देश सेवा में तत्पर रहने के बावजूद रिटायरमेंट होने पर गोली खाने वाले भारतीय सेना के साइलेंट वॉरियर्स को मौत की जगह अब लोगों को गोद दिया जा रहा है। पहले इनको रिटायरमेंट के बाद मौत की नींद सुला दिया जाता था। अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही इस प्रथा को मेरठ रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स में खत्म कर दिया है। 40 के रिटायर्ड जर्मन शेफर्ड डॉग्स अब लोगों के घरों में पहरेदारी करेंगे।

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भारतीय सेना में डॉग्स को सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। सैनिकों की तरह यह भी देश सेवा में तत्पर रहते हैं। लेकिन इन डॉग्स को तब तक ही जिंदा रखा जाता था, जब तक कि ये सेना का काम कर रहे होते थे। कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने रिटायरमेंट के बाद इन डॉग्स को मारने की प्रथा को बंद करा दिया। इसके बाद सेना ने अपने आठ साल से ज्यादा उम्र के रिटायर्ड डॉग्स को लोगों को गोद देने की पहल की। 
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जारी किया विज्ञापन
मेरठ स्थित रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स ने इस बार विज्ञापन देकर इन डॉग्स को गोद लेने वालों से आवेदन मांगे थे। इसके लिए लोगों ने खासी रुचि दिखाई। सैन्य अधिकारियों ने बताया कि 40 डॉग्स को गोद देने की प्रक्रिया पूरी हो गई है। बता दें कि ड्यूटी नहीं कर पाने पर कुत्ते को मार दिया जाता था। इसके बाद पूरे सम्मान के साथ विदाई की जाती थी। बता दें कि कुत्ते की उम्र करीब 12 साल होती है।

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ये हैं तर्क

Retired Dogs of Army will get life, British rule ends
फाइल फोटो

डॉग्स को रिटायरमेंट के बाद मारे जाने के दो तर्क थे। पहला ये कि उन्हें सेना के बेस लोकेशन्स और कैंप की पूरी जानकारी होती है। वे गुप्त जानकारियां भी रखते हैं। ऐसे में यदि आम लोगों को सौंपा जाए तो कहीं वे सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा न बन जाएं। दूसरा तर्क ये था कि इन डॉग्स को किसी एनिमल वेलफेयर सोसाइटी या निजी हाथों में दिया जाता है तो वे उसे सुविधाएं नहीं दे सकते जो सेना में मिलती हैं।   

वेटनरी कॉर्प्स का जलवा 
मेरठ छावनी स्थित रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स के ट्रेंड डॉग्स को साइलेंट वॉरियर्स कहा जाता है। वजह दुश्मनों को चीर देने की क्षमता रखने वाले ये डॉग्स किसी चीते से कम नहीं हैं। आरवीसी ने अब तक कई मित्र देशों को भी अपने ट्रेंड डॉग दिए हैं। यहां पर पहले जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर जैसी नस्लों को ट्रेंड किया जाता था। अब भारतीय नस्ल के देशी कुत्तों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। छह से नौ माह की उम्र के डॉग्स को कठोर ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद ये डॉग्स तीस फीट बर्फ में दबे सेना के जवानों को खोजने और जमीन में कई फीट नीचे बिछे एक्सप्लोसिव का चंद सेकेंड में पता लगा लेते हैं। सीमा पर घुसपैठियों को पकड़ने से लेकर माइन डिटेक्शन में इनकी अहम भूमिका है। रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स में दुनियाभर से अफसर स्पेशल कोर्स करने के लिए आते हैं।

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