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हाशिमपुरा कांड : 31 साल बाद सजा से सुकून, मगर टपके गम के आंसू

Fri, 23 Nov 2018 07:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ Updated Fri, 23 Nov 2018 07:10 AM IST
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relief after 31 years as culpits gets punishment, eyes wet  
हाशिमपुरा केस - फोटो : SELF
नरसंहार के 31 साल बाद हाशिमपुरा के दोषी और रिटायर हो चुके 16 पीएसी जवानों में से चार के कोर्ट में समर्पण से पीड़ितों ने राहत महसूस की है। 31 साल बाद दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा सुनाए जाने से पीड़ितों ने संतोष जताया था, लेकिन समर्पण के बहाने उभरी नरसंहार की स्मृतियों ने हाशिमपुरा के पीड़ितों के जख्म फिर से कुरेद डाले। कई पीड़ित परिवारों की तो अपनों को खोने का गम याद करके गुरुवार को फिर आंखें छलक पड़ीं। पीड़ितों ने फिर दोहराया कि उनका कानून पर विश्वास और बढ़ गया है। हालांकि उन्हें दोषियों को फांसी न मिलने का मलाल भी है।
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नरसंहार के दौरान गोली लगने के बावजूद जीवित बचे मुकदमे के अहम गवाह बाबूद्दीन ने बताया कि आरोपियों की सरेंडर करने की जानकारी उन्हें नहीं है, लेकिन उनकी कोशिश अब यही रहेगी कि जो सजा पिछले दिनों हाईकोर्ट ने दी है, वह बरकरार रहे। उन्होंने ने बताया कि इससे पहले जब 21 मार्च 2015 को निचली अदालत का फैसला आया था, जिसमें आरोपियों को कुसूरवार नहीं माना गया था, तब उन्हें बहुत दुख हुआ था। हाईकोर्ट के फैसले से सभी पीड़ित परिवारों को राहत मिली है। 
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नरसंहार में मारे गए कमरुद्दीन के भाई रियाजुद्दीन का कहना है कि आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा के चलते जेल जाना ही पड़ेगा। अगर आरोपी सुप्रीम कोर्ट जाते हैं तो वे वहां भी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं। उधर, पीड़ित परिजनों की आंखें गुरुवार को फिर नम हो गईं। चार दोषियों के कोर्ट में समर्पण की खबर के बाद डरावनी पुरानी स्मृतियां जहन में उभर आई और आंखों से टप टप आंसू बह निकले। पीड़ितों का कहना था कि जब भी उस दिन की याद आती है तो ऐसा लगता है कि उनके साथ यह हादसा फिर से हो रहा है।  
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गौरतलब है कि 22 मई 1987 को सांप्रदायिक दंगों के बाद कर्फ्यू के दौरान हाशिमपुरा से पीएसी के जवान एक ट्रक में 50 युवकों को उठा ले गए थे और उन्हें गाजियाबाद के मोदीनगर में गोलियां मारकर हिंडन नदी और गंग नहर में फेंक दिया था। इस नरसंहार में 42 लोगों की हत्या की गई थी, जबकि पांच लोग गोलियां लगने के बावजूद जिंदा बच निकले थे। इस संबंध में बाबूदीन ने ही गाजियाबाद के लिंक रोड थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसके बाद हाशिमपुरा कांड पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था।
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