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मोदी और जातिगत गणित के भरोसे भाजपा
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Wed, 31 Aug 2016 01:50 AM IST
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भाजपा विधायक सत्य प्रकाश अग्रवाल
- फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटें हासिल करने वाली भाजपा के लिए सत्ता पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। यूपी चुनाव जहां भाजपा की केंद्र सरकार का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करेगा, वहीं भविष्य की राजनीति की इबारत भी लिखेगा। जिले की सात विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा नेताओं का दावा बेशक बेहतर प्रदर्शन करने का है। लेकिन उनके विधायक भी कड़े संघर्ष में फंसे हैं।
आसान नहीं शहर सीट पर वापसी
शहर सीट भाजपा के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है तो मतों का ध्रुवीकरण अहम रहा है। हिंदू-मुस्लिम मतों के बंटवारे और ध्रुवीकरण पर टिके इस विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में भाजपा कभी भी लगातार दो बार नहीं जीत पायी है। 1989 से लगातार इस सीट से प्रत्याशी रहे वर्तमान विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जीत मुस्लिम मतों के बंटवारे पर केंद्रित रही है। सपा से यहां पूर्व प्रत्याशी रहे रफीक अंसारी फिर मैदान में हैं तो बसपा ने कुंवर दिलशाद पर दांव लगाया है। इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी का बेचैनी से इंतजार है। क्योंकि पिछली बार वाजपेयी की जीत और रफीक अंसारी की हार में कांग्रेस के डॉ. युसूफ कुरैशी की अहम भूमिका रही थी। मुस्लिम वोट नहीं बंटा तो वाजपेयी के लिए मुश्किल हो सकती हे। इस सीट पर अभी भाजपा प्रत्याशी घोषित नहीं हुआ है। लेकिन क्षेत्रीय उपाध्यक्ष अरुण वशिष्ठ और महानगर अध्यक्ष कमल दत्त शर्मा दावेदारी में हैं। हालांकि पार्टी की वर्तमान नीति के अनुसार वाजपेयी का प्रत्याशी होना लगभग तय है।
दावा : यह सही है कि वोटों का ध्रुवीकरण हमेशा अहम रहा है। लेकिन इस बार भी भाजपा की जीत निश्चित रुप से होगी। चुनाव में भाजपा को मुस्लिम वोट भी मिलेंगे। - डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, वर्तमान विधायक
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दक्षिण में जातीय समीकरण हावी
मेरठ दक्षिण सीट पर नये परिसीमन के बाद पहली बार हुए चुनाव में ही यहां से वर्तमान विधायक रविंद्र भड़ाना जीते थे। यह सीट पूरी तरह जातीय समीकरण पर टिकी है। वैश्य बिरादरी पंरपरागत वोट होने के कारण भाजपा ने यहां से गुर्जर कार्ड खेला था, जो सफल रहा था। जिससे यहां फिर से रविंद्र भड़ाना को टिकट मिल सकता है। हालांकि यहां से युवा मोर्चा के राष्ट्रीय मंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर, भाजपा नेता विनीत अग्रवाल शारदा, पथिक सेना के अध्यक्ष मुखिया गुर्जर भी दावेदार हैं। बसपा से यहां पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी प्रत्याशी हैं तो सपा ने पिछली बार के प्रत्याशी आदिल चौधरी को ही मैदान में उतारा है। मुस्लिम मतों के बंटवारे पर उम्मीद लगाए बैठी भाजपा कांग्रेस और रालोद द्वारा कोई दमदार गुर्जर या जाट प्रत्याशी मैदान में उतारने पर खतरे में पड़ सकती है। कुल मिलाकर भाजपा इस बार आराम की स्थिति में नहीं है।
दावा : हम लगातार जनता के बीच मौजूद रहे हैं। प्रदेश सरकार के अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए क्षेत्र में विकास भी कराया है। ऐसे में इस बार भी भाजपा की जीत पहले से बेहतर मतों से होगी।- रविंद्र भड़ाना, वर्तमान विधायक
आसान नहीं है कैंट
27 साल से कैंट सीट पर काबिज भाजपा का ग्राफ लगातार गिरा है। उस पर आपसी गुटबाजी के बीच इस बार यहां कब्जा बरकरार रखना आसान नजर नहीं आ रहा है। जाट कार्ड खेलने वाली बसपा इस बार भी यहां चुनौती होगी। दलित जाट समीकरण के तहत भाजपा को यहां भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। क्योंकि यदि मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण बसपा के पक्ष में हुआ तो इसका सीधा नुकसान भाजपा को ही होगा। सपा पहले ही यहां सिख पंजाबी प्रत्याशी उतारकर भाजपा खेमे में बेचैनी पैदा कर चुकी है। ऐसे में कांग्रेस ने भी किसी मजबूत पंजाबी या ब्राह्मण यहां से मैदान में उतारा तो नुकसान भाजपा को जाएगा। इस सीट पर लगातार तीसरी बार भाजपा विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल फिर से लाइन में है। लेकिन करीब 80 साल की उम्र उनके टिकट की राह में बाधा बन सकती है। ऐसे में यहां से पूर्व विधायक अमित अग्रवाल, विनीत शारदा, मुकेश सिंघल, संजीव जैन सिक्का, बिजेंद्र अग्रवाल, अजय गुप्ता नटराज, अजय गुप्ता, योगेश मोहन गुप्ता, जयकरण गुप्ता और महापौर हरिकांत अहलूवालिया दावेदारी में हैं।
दावा : हमें इस बार भी सर्व समाज का वोट मिलेगा। क्षेत्र में हर समय उपलब्धता, विकास कार्य जीत का मुख्य आधार होगा। भाजपा का मजबूत कार्यकर्ता और संगठन हमारा प्रमुख हथियार है।- सत्यप्रकाश अग्रवाल, वर्तमान विधायक
सरधना में फिर पुराने समीकरण
सरधना सीट यूपी की चर्चित सीटों में शुमार हो चुकी है। इसका कारण यहां से वर्तमान विधायक ठा. संगीत सोम हैं। भाजपा के कब्जे वाली इस सीट पर समीकरण इस बार भी पहले जैसे नजर आ रहे हैं। भाजपा से एक बार फिर वर्तमान विधायक ठा. संगीत सोम का आना तय हो चुका है तो सपा से पिछली बार के प्रत्याशी अतुल प्रधान हैं। बसपा ने इस बार पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान कुरैशी को प्रत्याशी बनाया है। इस सीट पर रालोद और कांग्रेस प्रत्याशी पर सबकी नजर है। लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले ही इन तीनों के बीच घमासान शुरू हो चुका है। भाजपा की जीत का आधार एक बार फिर ठाकुर वोटों के साथ भाजपा का पंरपरागत वोट बैंक होगा। देखना यह होगा कि कांग्रेस से टिकट किस बिरादरी के प्रत्याशी को मिलेगा। यदि मुस्लिम मतों का बंटवारा न होकर भाजपा के खिलाफ एकमुश्त होकर किसी दल को मिला तो कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है।
दावा : मुझे सभी जातियों का समर्थन मिल रहा है। विधायक बनने के बाद क्षेत्र में लगातार मौजूदगी, हर व्यक्ति के दुख दर्द में शामिल होना और अन्याय के खिलाफ मुखर होना हमारी जीत का मुख्य आधार होगा। मैं अपनी पार्टी की बेदाग छवि और क्षेत्र में अपने द्वारा की गयी सेवा के आधार पर दावा कर रहा हूं कि इस बार जीत पहले से बहुत ज्यादा मतों से होगी।- ठा. संगीत सोम, वर्तमान विधायक
सिवाल अब भी नहीं आसान
सिवालखास सीट भाजपा आज तक नहीं जीत पायी। 2007 तक सुरक्षित सीट रहने पर भी यहां रालोद का कब्जा रहा। सिर्फ 2007 में बसपा यहां से जीती थी। सीट सामान्य हुई तो 2012 में सपा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया। जाट बहुल इस सीट पर मुस्लिम वोट बैंक जाट के बराबर होने पर अपनी अलग राजनीतिक हैसियत बना चुके हैं। यहां बसपा से नदीम चौहान और सपा से गुलाम मोहम्मद का आना तय हो चुका है। इनके बीच रालोद यहां इन सभी को टक्कर देने के लिए खड़ा होगा। जाट या गैर जाट प्रत्याशी के चयन में फंसी भाजपा ने अभी यहां से प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। दावेदारों में जिपं सदस्य डॉ. मीनाक्षी भराला, ईलम सिंह इंटर कॉलेज सतवाई के प्रधानाचार्य जितेंद्र सिंह, पूर्व जिपं अध्यक्ष मनिंदरपाल सिंह, युवा नेता अतुल सिंह, संजय सिंह, अंकुर राणा, अनिता सिंह और पं. सुनील भराला हैं। लगातार हार का सिलसिला तोड़ना यहां भाजपा के लिए काफी कठिन हो सकता है।
किठौर में चुनौती बरकरार
किठौर विस से 2002 से लगातार सपा के शाहिद मंजूर जीतते आ रहे हैं। हालांकि इससे पूर्व यहां से भाजपा एक बार तो रालोद का तीन बार कब्जा रहा। कांग्रेस के कब्जे में भी सीट रही। शाहिद मंजूर इस बार भी सभी के लिए चुनौती होंगे। भाजपा यहां गुर्जर या त्यागी पर दांव खेलने की तैयारी में है। प्रदेश उपाध्यक्ष अश्वनी त्यागी और सतबीर त्यागी के अलावा पूर्व विधायक रामकृष्ण वर्मा के पुत्र जितेंद्र वर्मा प्रमुख दावेदार हैं। पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना की पत्नी की दावेदारी की भी चर्चा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर गुर्जर और दलित जहां लगभग बराबर हैं तो त्यागी, जाट और ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में हैं। लेकिन असली वोट अन्य बिरादरियों के बीच हैं। भाजपा इस बार इसी वोट बैंक को साधकर यहां 23 साल बाद काबिज होना चाहेगी। बसपा ने यहां पहले ही गुर्जर बिरादरी से प्रत्याशी तय कर भाजपा का गणित बिगाड़ने का प्रयास किया है। हालांकि लोस चुनाव में किठौर में भाजपा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
हस्तिनापुर का सिंहासन नहीं आसान
हस्तिनापुर का सिंहासन भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगा। सपा सीट पर कब्जा जमाए रखने के लिए पूरे जोर लगाएगी तो बसपा से पूर्व विधायक योगेश वर्मा कम चुनौती नहीं होंगे। इस सुरक्षित सीट पर गुर्जर वोट निर्णायक होता है। अन्य बिरादरी के साथ मुस्लिम वोट भी खासी संख्या में है। लेकिन भाजपा के लिए यहां गुर्जर बिरादरी के साथ अन्य मतों को साधना चुनौती से कम नहीं होगा। भाजपा में यहां से पूर्व विधायक गोपाल काली, पूर्व विधायक अतुल खटीक, दिनेश खटीक और डॉ. चरण सिंह लिसाड़ी दावेदार हैं। लेकिन पिछले चुनाव में चौथे नंबर पर रहने वाली भाजपा के लिए पहले पर आना किसी बड़ी बाधा से कम नहीं होगा।
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आसान नहीं शहर सीट पर वापसी
शहर सीट भाजपा के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है तो मतों का ध्रुवीकरण अहम रहा है। हिंदू-मुस्लिम मतों के बंटवारे और ध्रुवीकरण पर टिके इस विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में भाजपा कभी भी लगातार दो बार नहीं जीत पायी है। 1989 से लगातार इस सीट से प्रत्याशी रहे वर्तमान विधायक डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जीत मुस्लिम मतों के बंटवारे पर केंद्रित रही है। सपा से यहां पूर्व प्रत्याशी रहे रफीक अंसारी फिर मैदान में हैं तो बसपा ने कुंवर दिलशाद पर दांव लगाया है। इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी का बेचैनी से इंतजार है। क्योंकि पिछली बार वाजपेयी की जीत और रफीक अंसारी की हार में कांग्रेस के डॉ. युसूफ कुरैशी की अहम भूमिका रही थी। मुस्लिम वोट नहीं बंटा तो वाजपेयी के लिए मुश्किल हो सकती हे। इस सीट पर अभी भाजपा प्रत्याशी घोषित नहीं हुआ है। लेकिन क्षेत्रीय उपाध्यक्ष अरुण वशिष्ठ और महानगर अध्यक्ष कमल दत्त शर्मा दावेदारी में हैं। हालांकि पार्टी की वर्तमान नीति के अनुसार वाजपेयी का प्रत्याशी होना लगभग तय है।
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दावा : यह सही है कि वोटों का ध्रुवीकरण हमेशा अहम रहा है। लेकिन इस बार भी भाजपा की जीत निश्चित रुप से होगी। चुनाव में भाजपा को मुस्लिम वोट भी मिलेंगे। - डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, वर्तमान विधायक
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दक्षिण में जातीय समीकरण हावी
मेरठ दक्षिण सीट पर नये परिसीमन के बाद पहली बार हुए चुनाव में ही यहां से वर्तमान विधायक रविंद्र भड़ाना जीते थे। यह सीट पूरी तरह जातीय समीकरण पर टिकी है। वैश्य बिरादरी पंरपरागत वोट होने के कारण भाजपा ने यहां से गुर्जर कार्ड खेला था, जो सफल रहा था। जिससे यहां फिर से रविंद्र भड़ाना को टिकट मिल सकता है। हालांकि यहां से युवा मोर्चा के राष्ट्रीय मंत्री डॉ. सोमेंद्र तोमर, भाजपा नेता विनीत अग्रवाल शारदा, पथिक सेना के अध्यक्ष मुखिया गुर्जर भी दावेदार हैं। बसपा से यहां पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी प्रत्याशी हैं तो सपा ने पिछली बार के प्रत्याशी आदिल चौधरी को ही मैदान में उतारा है। मुस्लिम मतों के बंटवारे पर उम्मीद लगाए बैठी भाजपा कांग्रेस और रालोद द्वारा कोई दमदार गुर्जर या जाट प्रत्याशी मैदान में उतारने पर खतरे में पड़ सकती है। कुल मिलाकर भाजपा इस बार आराम की स्थिति में नहीं है।
दावा : हम लगातार जनता के बीच मौजूद रहे हैं। प्रदेश सरकार के अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए क्षेत्र में विकास भी कराया है। ऐसे में इस बार भी भाजपा की जीत पहले से बेहतर मतों से होगी।- रविंद्र भड़ाना, वर्तमान विधायक
आसान नहीं है कैंट
27 साल से कैंट सीट पर काबिज भाजपा का ग्राफ लगातार गिरा है। उस पर आपसी गुटबाजी के बीच इस बार यहां कब्जा बरकरार रखना आसान नजर नहीं आ रहा है। जाट कार्ड खेलने वाली बसपा इस बार भी यहां चुनौती होगी। दलित जाट समीकरण के तहत भाजपा को यहां भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। क्योंकि यदि मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण बसपा के पक्ष में हुआ तो इसका सीधा नुकसान भाजपा को ही होगा। सपा पहले ही यहां सिख पंजाबी प्रत्याशी उतारकर भाजपा खेमे में बेचैनी पैदा कर चुकी है। ऐसे में कांग्रेस ने भी किसी मजबूत पंजाबी या ब्राह्मण यहां से मैदान में उतारा तो नुकसान भाजपा को जाएगा। इस सीट पर लगातार तीसरी बार भाजपा विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल फिर से लाइन में है। लेकिन करीब 80 साल की उम्र उनके टिकट की राह में बाधा बन सकती है। ऐसे में यहां से पूर्व विधायक अमित अग्रवाल, विनीत शारदा, मुकेश सिंघल, संजीव जैन सिक्का, बिजेंद्र अग्रवाल, अजय गुप्ता नटराज, अजय गुप्ता, योगेश मोहन गुप्ता, जयकरण गुप्ता और महापौर हरिकांत अहलूवालिया दावेदारी में हैं।
दावा : हमें इस बार भी सर्व समाज का वोट मिलेगा। क्षेत्र में हर समय उपलब्धता, विकास कार्य जीत का मुख्य आधार होगा। भाजपा का मजबूत कार्यकर्ता और संगठन हमारा प्रमुख हथियार है।- सत्यप्रकाश अग्रवाल, वर्तमान विधायक
सरधना में फिर पुराने समीकरण
सरधना सीट यूपी की चर्चित सीटों में शुमार हो चुकी है। इसका कारण यहां से वर्तमान विधायक ठा. संगीत सोम हैं। भाजपा के कब्जे वाली इस सीट पर समीकरण इस बार भी पहले जैसे नजर आ रहे हैं। भाजपा से एक बार फिर वर्तमान विधायक ठा. संगीत सोम का आना तय हो चुका है तो सपा से पिछली बार के प्रत्याशी अतुल प्रधान हैं। बसपा ने इस बार पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान कुरैशी को प्रत्याशी बनाया है। इस सीट पर रालोद और कांग्रेस प्रत्याशी पर सबकी नजर है। लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले ही इन तीनों के बीच घमासान शुरू हो चुका है। भाजपा की जीत का आधार एक बार फिर ठाकुर वोटों के साथ भाजपा का पंरपरागत वोट बैंक होगा। देखना यह होगा कि कांग्रेस से टिकट किस बिरादरी के प्रत्याशी को मिलेगा। यदि मुस्लिम मतों का बंटवारा न होकर भाजपा के खिलाफ एकमुश्त होकर किसी दल को मिला तो कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है।
दावा : मुझे सभी जातियों का समर्थन मिल रहा है। विधायक बनने के बाद क्षेत्र में लगातार मौजूदगी, हर व्यक्ति के दुख दर्द में शामिल होना और अन्याय के खिलाफ मुखर होना हमारी जीत का मुख्य आधार होगा। मैं अपनी पार्टी की बेदाग छवि और क्षेत्र में अपने द्वारा की गयी सेवा के आधार पर दावा कर रहा हूं कि इस बार जीत पहले से बहुत ज्यादा मतों से होगी।- ठा. संगीत सोम, वर्तमान विधायक
सिवाल अब भी नहीं आसान
सिवालखास सीट भाजपा आज तक नहीं जीत पायी। 2007 तक सुरक्षित सीट रहने पर भी यहां रालोद का कब्जा रहा। सिर्फ 2007 में बसपा यहां से जीती थी। सीट सामान्य हुई तो 2012 में सपा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया। जाट बहुल इस सीट पर मुस्लिम वोट बैंक जाट के बराबर होने पर अपनी अलग राजनीतिक हैसियत बना चुके हैं। यहां बसपा से नदीम चौहान और सपा से गुलाम मोहम्मद का आना तय हो चुका है। इनके बीच रालोद यहां इन सभी को टक्कर देने के लिए खड़ा होगा। जाट या गैर जाट प्रत्याशी के चयन में फंसी भाजपा ने अभी यहां से प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। दावेदारों में जिपं सदस्य डॉ. मीनाक्षी भराला, ईलम सिंह इंटर कॉलेज सतवाई के प्रधानाचार्य जितेंद्र सिंह, पूर्व जिपं अध्यक्ष मनिंदरपाल सिंह, युवा नेता अतुल सिंह, संजय सिंह, अंकुर राणा, अनिता सिंह और पं. सुनील भराला हैं। लगातार हार का सिलसिला तोड़ना यहां भाजपा के लिए काफी कठिन हो सकता है।
किठौर में चुनौती बरकरार
किठौर विस से 2002 से लगातार सपा के शाहिद मंजूर जीतते आ रहे हैं। हालांकि इससे पूर्व यहां से भाजपा एक बार तो रालोद का तीन बार कब्जा रहा। कांग्रेस के कब्जे में भी सीट रही। शाहिद मंजूर इस बार भी सभी के लिए चुनौती होंगे। भाजपा यहां गुर्जर या त्यागी पर दांव खेलने की तैयारी में है। प्रदेश उपाध्यक्ष अश्वनी त्यागी और सतबीर त्यागी के अलावा पूर्व विधायक रामकृष्ण वर्मा के पुत्र जितेंद्र वर्मा प्रमुख दावेदार हैं। पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना की पत्नी की दावेदारी की भी चर्चा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर गुर्जर और दलित जहां लगभग बराबर हैं तो त्यागी, जाट और ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में हैं। लेकिन असली वोट अन्य बिरादरियों के बीच हैं। भाजपा इस बार इसी वोट बैंक को साधकर यहां 23 साल बाद काबिज होना चाहेगी। बसपा ने यहां पहले ही गुर्जर बिरादरी से प्रत्याशी तय कर भाजपा का गणित बिगाड़ने का प्रयास किया है। हालांकि लोस चुनाव में किठौर में भाजपा को सबसे ज्यादा वोट मिले थे।
हस्तिनापुर का सिंहासन नहीं आसान
हस्तिनापुर का सिंहासन भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगा। सपा सीट पर कब्जा जमाए रखने के लिए पूरे जोर लगाएगी तो बसपा से पूर्व विधायक योगेश वर्मा कम चुनौती नहीं होंगे। इस सुरक्षित सीट पर गुर्जर वोट निर्णायक होता है। अन्य बिरादरी के साथ मुस्लिम वोट भी खासी संख्या में है। लेकिन भाजपा के लिए यहां गुर्जर बिरादरी के साथ अन्य मतों को साधना चुनौती से कम नहीं होगा। भाजपा में यहां से पूर्व विधायक गोपाल काली, पूर्व विधायक अतुल खटीक, दिनेश खटीक और डॉ. चरण सिंह लिसाड़ी दावेदार हैं। लेकिन पिछले चुनाव में चौथे नंबर पर रहने वाली भाजपा के लिए पहले पर आना किसी बड़ी बाधा से कम नहीं होगा।