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सत्त्रिय से दिया नारी सशक्तिकरण का संदेश
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Tue, 18 Oct 2016 01:52 AM IST
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ईस्माइल कॉलेज में आयोजित स्पिक मैके कार्यक्रम में प्रस्तुति देतीं डॉ. अन्वेसा महंता।
- फोटो : अमर उजाला
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सीता स्वयंवर, महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा सप्तशती के माध्यम से सुप्रसिद्ध सत्त्रिय नृत्यांगना अन्वेषा महन्ता ने नारी सशक्तिकरण का संदेश दिया। सीता स्वयंवर में उन्होंने महिलाओं को स्वैच्छिक वर चयन के अधिकार, महिषासुर मर्दन में नारी शक्ति और अपमान के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया। वहीं, दुर्गा सप्तशती के पदों पर प्रस्तुति देकर नारी के सम्मान की आवाज उठाई।
इस्माईल नेशनल महिला पीजी कॉलेज में सोमवार को स्पिक मैके की ओर से शास्त्रीय सत्त्रिय नृत्य की प्रस्तुति हुई। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. अन्वेषा महन्ता ने सत्त्रिय नृत्य के जरिये कोटोरा (कृष्ण बाल लीला), माखन चोरी, कालिया नाग मर्दन, महिषासुर मर्दिनी, गोपिका चीरहरण आदि कथाओं को दर्शाया। अद्भुत नृत्य की इस प्रस्तुति में मृदंग पर उनके साथ हरि सेठिया, गायन में गौतम और बांसुरी पर भूपेंद्र ने संगत की। डॉ. अन्वेषा गुवाहाटी आईआईटी में अतिथि व्याख्याता हैं। आयोजन का शुभारंभ कॉलेज कार्यकारिणी सचिव दयानंद गुप्ता और प्राचार्य डॉ. साधना सहाय ने किया। संयोजन डॉ. रेखा सेठ का रहा। सहयोग डॉ. रीना गुप्ता, डॉ. दीपा त्यागी, रविशंकर, निरुपमा, गरिमा का रहा। कार्यक्रम का संयोजन स्पिक मैके की कोऑर्डिनेटर सुचेता सहगल ने किया।
यहां भी हुई प्रस्तुति
स्पिक मैके के सौजन्य से सत्त्रिय नृत्य की प्रस्तुति सोमवार सुबह भागीरथी आर्य कन्या इंटर कॉलेज लालकुर्ती में भी हुई। नृत्यांगना डॉ. अन्वेषा महन्ता द्वारा दी गई प्रस्तुति को छात्राओं ने खूब सराहा। आयोजन में स्कूल प्रिंसिपल लता सागर सहित दीवान पब्लिक स्कूल के छात्रों ने सहयोग दिया।
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क्या है सत्त्रिया नृत्य
सत्त्रिया भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आठवां फॉर्म है। भारतीय नृत्य संस्कृ ति में पहले सात प्रकार थे। आठवें प्रकार के रूप में सत्त्रिया को जोड़ा गया। सत्त्रिया असम की लोकनृत्य परंपरा है। इसे आज भी कृष्ण मंदिरों में मंचित करते हैं। असम में इस नृत्य की पूजा करते हैं। घुंघरुओं के बिना बिना सामान्य साज शृंगार के साथ इस नृत्य की प्रस्त्ुाति होती है। भगवत पुराण, महालक्ष्मी कथा, सीता स्वयंवर और कृष्ण लीला की कथाओं का मंचन नृत्य की इसी विधा में होता है। सत्त्रिया में ताल क्रम बिलंवित, द्रुत और बिलंवित होता है। बिलंवित ताल से प्रारंभ होकर द्रुत में जाता है। इसका अंत भी बिलंवित ताल पर होता है। मृदंग, बांसुरी जैसे साजों पर इसे प्रस्तुत किया जाता है।
इंसान की दैनिक जिंदगी में शामिल है नृत्य
रंगकर्म से लोकनृत्य को आत्मसात करने वाली अन्वेषा महन्ता नृत्य को आम आदमी की दैनिक जिंदगी का हिस्सा मानती हैं। वह कहती हैं कि रोना, हंसना, आश्चर्य, क्रोध, प्रेम, घृणा और करुण के जिन भावों को इंसान दिनचर्या में निभाता है, इन्हीं रसों पर नृत्य मुद्राएं बनी हैं। नृत्य में गीत हैं, आम जिंदगी संवादों और रसों का सामंजस्य है। नृत्य स्वयं को अहसास करने की कला है। अन्वेषा को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार समेत कई पुरस्कार मिले हैं। चार्ल्स वैलेश फेलोशिप भी ले चुकी हैं। सृष्टि से मोक्ष, नारी सशक्तिकरण इनक ी प्रमुख प्रस्तुतियां रही हैं।
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इस्माईल नेशनल महिला पीजी कॉलेज में सोमवार को स्पिक मैके की ओर से शास्त्रीय सत्त्रिय नृत्य की प्रस्तुति हुई। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. अन्वेषा महन्ता ने सत्त्रिय नृत्य के जरिये कोटोरा (कृष्ण बाल लीला), माखन चोरी, कालिया नाग मर्दन, महिषासुर मर्दिनी, गोपिका चीरहरण आदि कथाओं को दर्शाया। अद्भुत नृत्य की इस प्रस्तुति में मृदंग पर उनके साथ हरि सेठिया, गायन में गौतम और बांसुरी पर भूपेंद्र ने संगत की। डॉ. अन्वेषा गुवाहाटी आईआईटी में अतिथि व्याख्याता हैं। आयोजन का शुभारंभ कॉलेज कार्यकारिणी सचिव दयानंद गुप्ता और प्राचार्य डॉ. साधना सहाय ने किया। संयोजन डॉ. रेखा सेठ का रहा। सहयोग डॉ. रीना गुप्ता, डॉ. दीपा त्यागी, रविशंकर, निरुपमा, गरिमा का रहा। कार्यक्रम का संयोजन स्पिक मैके की कोऑर्डिनेटर सुचेता सहगल ने किया।
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यहां भी हुई प्रस्तुति
स्पिक मैके के सौजन्य से सत्त्रिय नृत्य की प्रस्तुति सोमवार सुबह भागीरथी आर्य कन्या इंटर कॉलेज लालकुर्ती में भी हुई। नृत्यांगना डॉ. अन्वेषा महन्ता द्वारा दी गई प्रस्तुति को छात्राओं ने खूब सराहा। आयोजन में स्कूल प्रिंसिपल लता सागर सहित दीवान पब्लिक स्कूल के छात्रों ने सहयोग दिया।
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क्या है सत्त्रिया नृत्य
सत्त्रिया भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आठवां फॉर्म है। भारतीय नृत्य संस्कृ ति में पहले सात प्रकार थे। आठवें प्रकार के रूप में सत्त्रिया को जोड़ा गया। सत्त्रिया असम की लोकनृत्य परंपरा है। इसे आज भी कृष्ण मंदिरों में मंचित करते हैं। असम में इस नृत्य की पूजा करते हैं। घुंघरुओं के बिना बिना सामान्य साज शृंगार के साथ इस नृत्य की प्रस्त्ुाति होती है। भगवत पुराण, महालक्ष्मी कथा, सीता स्वयंवर और कृष्ण लीला की कथाओं का मंचन नृत्य की इसी विधा में होता है। सत्त्रिया में ताल क्रम बिलंवित, द्रुत और बिलंवित होता है। बिलंवित ताल से प्रारंभ होकर द्रुत में जाता है। इसका अंत भी बिलंवित ताल पर होता है। मृदंग, बांसुरी जैसे साजों पर इसे प्रस्तुत किया जाता है।
इंसान की दैनिक जिंदगी में शामिल है नृत्य
रंगकर्म से लोकनृत्य को आत्मसात करने वाली अन्वेषा महन्ता नृत्य को आम आदमी की दैनिक जिंदगी का हिस्सा मानती हैं। वह कहती हैं कि रोना, हंसना, आश्चर्य, क्रोध, प्रेम, घृणा और करुण के जिन भावों को इंसान दिनचर्या में निभाता है, इन्हीं रसों पर नृत्य मुद्राएं बनी हैं। नृत्य में गीत हैं, आम जिंदगी संवादों और रसों का सामंजस्य है। नृत्य स्वयं को अहसास करने की कला है। अन्वेषा को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार समेत कई पुरस्कार मिले हैं। चार्ल्स वैलेश फेलोशिप भी ले चुकी हैं। सृष्टि से मोक्ष, नारी सशक्तिकरण इनक ी प्रमुख प्रस्तुतियां रही हैं।