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मासूम के लिए लक्ष्मी बनीं ‘यशोदा’
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
Updated Mon, 25 Jan 2016 01:54 AM IST
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दस दिन से जिला अस्पताल की नर्सरी में भर्ती नन्ही परी को लक्ष्मी के रूप में ‘मां यशोदा’ मिल गई हैं। अब वह अपनी मां की गोद में खुद को सुरक्षित महसूस कर रही है। जन्म देने वाली मां ने तो मासूम को कड़ाके की ठंड में तड़पने के लिए छोड़ दिया था। लेकिन, अनजान मां अपने आंचल में छिपाकर स्तनपान करा रही है।
सरधना क्षेत्र के गांव झिटकरी में दस दिन पहले एक बच्ची खेत में पड़ी मिली थी। लोगों ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। तब से बच्ची जिला अस्पताल की नर्सरी में है। सदर चना गोदाम निवासी लक्ष्मी क ा पति संजय यादव रोडवेज बस अड्डे के बाहर चाय बेचता है।
संजय और लक्ष्मी के खुद दो बच्चे हैं। बड़ी बेटी आंचल चार साल की है। बेटे का जन्म एक जनवरी 2016 को ही जिला अस्पताल में हुआ है। संजय ने बताया कि जन्म के दो दिन बाद ही बच्चे को निमोनिया हो गया।
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जिला अस्पताल में कुछ दिन इलाज के बाद जच्चा-बच्चा घर चले गए। अचानक शुक्रवार सुबह बेटे की तबियत बिगड़ी तो उसे दोबारा अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में लक्ष्मी ने पालने में खामोश लेटी नवजात को देखा।
उसके बारे में नर्स से पूछताछ की। नर्स ने लक्ष्मी को बच्ची के बारे में बताकर उसे स्तनपान कराने के लिए कहा। लक्ष्मी ने पति से अनुमति लेकर नवजात को अपनी गोद में उठा लिया। तभी से लक्ष्मी नन्ही परी को अपना दूध पिला रही है।
बच्चों पर तो प्यार आता है
संजय का कहना है जब नर्स ने हमें बच्ची के बारे में बताया तो हमें उस पर प्यार आ गया। मैंने पत्नी को इसकी देखभाल के लिए कहा। इंसानियत के नाते हम एक-दूसरे की इतनी मदद तो कर ही सकते हैं। भगवान ने हमें एक बच्ची दी है, हम इसे भी अपनी ही बच्ची समझेंगे।
कम पढ़ा हूं, मगर इंसान हूं
संजय हाईस्कूल पास है। परिवार की जिम्मेदारियों में घिरने के कारण आगे पढ़ नहीं पाया। लेकिन उसके दिल में इंसानियत बहुत है। बकौल संजय इंसान छोटा या बड़ा नहीं होता। हमारी सोच ही हमारा कद तय करती है।
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सरधना क्षेत्र के गांव झिटकरी में दस दिन पहले एक बच्ची खेत में पड़ी मिली थी। लोगों ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। तब से बच्ची जिला अस्पताल की नर्सरी में है। सदर चना गोदाम निवासी लक्ष्मी क ा पति संजय यादव रोडवेज बस अड्डे के बाहर चाय बेचता है।
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संजय और लक्ष्मी के खुद दो बच्चे हैं। बड़ी बेटी आंचल चार साल की है। बेटे का जन्म एक जनवरी 2016 को ही जिला अस्पताल में हुआ है। संजय ने बताया कि जन्म के दो दिन बाद ही बच्चे को निमोनिया हो गया।
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जिला अस्पताल में कुछ दिन इलाज के बाद जच्चा-बच्चा घर चले गए। अचानक शुक्रवार सुबह बेटे की तबियत बिगड़ी तो उसे दोबारा अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में लक्ष्मी ने पालने में खामोश लेटी नवजात को देखा।
उसके बारे में नर्स से पूछताछ की। नर्स ने लक्ष्मी को बच्ची के बारे में बताकर उसे स्तनपान कराने के लिए कहा। लक्ष्मी ने पति से अनुमति लेकर नवजात को अपनी गोद में उठा लिया। तभी से लक्ष्मी नन्ही परी को अपना दूध पिला रही है।
बच्चों पर तो प्यार आता है
संजय का कहना है जब नर्स ने हमें बच्ची के बारे में बताया तो हमें उस पर प्यार आ गया। मैंने पत्नी को इसकी देखभाल के लिए कहा। इंसानियत के नाते हम एक-दूसरे की इतनी मदद तो कर ही सकते हैं। भगवान ने हमें एक बच्ची दी है, हम इसे भी अपनी ही बच्ची समझेंगे।
कम पढ़ा हूं, मगर इंसान हूं
संजय हाईस्कूल पास है। परिवार की जिम्मेदारियों में घिरने के कारण आगे पढ़ नहीं पाया। लेकिन उसके दिल में इंसानियत बहुत है। बकौल संजय इंसान छोटा या बड़ा नहीं होता। हमारी सोच ही हमारा कद तय करती है।