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‘डस्टबिन’ में गई गाढ़ी कमाई
ब्यूरो/अमर उजाला मेरठ
Updated Wed, 17 Feb 2016 02:48 AM IST
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नगर निगम में कमीशन के खेल में जनता की गाढ़ी कमाई लुट रही है। आएदिन खजाने की बंदरबांट हो रही है और आला अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। अब डस्टबिन की खरीद पर कमीशनखोरी का खेल उजागर हुआ है।
जहां पूर्व में खरीदे गए लाखों रुपये के डस्टबिन कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। वहीं 13वें वित्त आयोग के खजाने से खरीदकर शहर में छोटे-छोटे डस्टबिन लगाए जा रहे हैं। जो पूरी तरह से यूजलेस नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं, डस्टबिन की खरीद भी सवालों के घेरे में है।
जिस कंपनी के डस्टबिन लगाए जा रहे हैं, उसके 100 लीटर वाले डस्टबिन की कीमत 2165 रुपये है। इसके लोहे के स्टैंड की कीमत 500 रुपये है और लगाने पर 200 रुपये तक खर्च माना जा सकता है। जबकि शहर में लगवाए जा रहे डस्टबिन (100 लीटर) की कीमत 9500 रुपये है।
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इसी डस्टबिन को एक कंपनी ने साढ़े तीन हजार में देने के लिए भी आवेदन किया था, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। अब मामले का खुलासा हो रहा है, तो अफसरों के चेहरे की हवाईयां उड़ी हैं।
1500 डस्टबिन की हुई खरीद
13वें वित्त आयोग के 1.42 करोड़ रुपये से 1500 डस्टबिन खरीदे गए। डस्टबिन प्लास्टिक और स्टैंड लोहे का है। देखने में तो सुंदर है, लेकिन इसमें दो परिवारों का कूड़ा भी नहीं समा पाएगा।
नगर निगम ने डस्टबिन लगाने की शुरुआत साकेत, फूलबाग कालोनी, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, सूरजकुंड, मोहनपुरी, माधवपुरम, कचहरी, बच्चा पार्क आदि इलाकों से की।
कुछ डस्टबिन ऐसे स्थानों पर लगे हैं, जिनमें आज तक कूड़ा नहीं डला। कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां ये कूड़े के ढेर में दब गए हैं। क्योंकि एक तो ये छोटे हैं, दूसरे निगम प्रशासन ने इन डस्टबिन से कूड़ा उठवाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की है।
खास बात
इस कंपनी के 80 लीटर वाले डस्टबिन की कीमत 1930 रुपये है।
100 लीटर वाला डस्टबिन 2165 रुपये का है, जो निगम ने 9500 में खरीदा।
शहर भर में लगाए जा रहे एक डस्टबिन की कीमत 9500 रुपये बताई जा रही है। जबकि एक कंपनी ने महापौर के कैंप कार्यालय पर पत्र भेजकर 3500 रुपये में डस्टबिन सप्लाई करने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। पूरे प्रकरण पर निगम कार्यकारिणी की बैठक में अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा।
-हरीश कुमार, पार्षद नगर निगम
डस्टबिन खरीद प्रक्रिया टेंडर से की गई है। चार कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया था। जिसके सबसे कम रेट थे, उसी कंपनी से डस्टबिन खरीदे गए हैं। अगर कोई कंपनी सस्ते में डस्टबिन देना चाहती थी, तो उसे टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए था। कहीं कोई गोलमाल नहीं हो रहा है।
-डा. प्रेम सिंह, नगर स्वास्थ्य अधिकारी
हमने निगम में किसी भी सामान की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य की हुई है। डस्टबिन के लिए भी टेंडर प्रक्रिया हुई थी। फिर भी अगर कहीं कुछ गलत हुआ है, तो जांच कराकर कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा।
-हरिकांत अहलुवालिया, महापौर
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जहां पूर्व में खरीदे गए लाखों रुपये के डस्टबिन कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं। वहीं 13वें वित्त आयोग के खजाने से खरीदकर शहर में छोटे-छोटे डस्टबिन लगाए जा रहे हैं। जो पूरी तरह से यूजलेस नजर आ रहे हैं। इतना ही नहीं, डस्टबिन की खरीद भी सवालों के घेरे में है।
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जिस कंपनी के डस्टबिन लगाए जा रहे हैं, उसके 100 लीटर वाले डस्टबिन की कीमत 2165 रुपये है। इसके लोहे के स्टैंड की कीमत 500 रुपये है और लगाने पर 200 रुपये तक खर्च माना जा सकता है। जबकि शहर में लगवाए जा रहे डस्टबिन (100 लीटर) की कीमत 9500 रुपये है।
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इसी डस्टबिन को एक कंपनी ने साढ़े तीन हजार में देने के लिए भी आवेदन किया था, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया। अब मामले का खुलासा हो रहा है, तो अफसरों के चेहरे की हवाईयां उड़ी हैं।
1500 डस्टबिन की हुई खरीद
13वें वित्त आयोग के 1.42 करोड़ रुपये से 1500 डस्टबिन खरीदे गए। डस्टबिन प्लास्टिक और स्टैंड लोहे का है। देखने में तो सुंदर है, लेकिन इसमें दो परिवारों का कूड़ा भी नहीं समा पाएगा।
नगर निगम ने डस्टबिन लगाने की शुरुआत साकेत, फूलबाग कालोनी, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, सूरजकुंड, मोहनपुरी, माधवपुरम, कचहरी, बच्चा पार्क आदि इलाकों से की।
कुछ डस्टबिन ऐसे स्थानों पर लगे हैं, जिनमें आज तक कूड़ा नहीं डला। कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां ये कूड़े के ढेर में दब गए हैं। क्योंकि एक तो ये छोटे हैं, दूसरे निगम प्रशासन ने इन डस्टबिन से कूड़ा उठवाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की है।
खास बात
इस कंपनी के 80 लीटर वाले डस्टबिन की कीमत 1930 रुपये है।
100 लीटर वाला डस्टबिन 2165 रुपये का है, जो निगम ने 9500 में खरीदा।
शहर भर में लगाए जा रहे एक डस्टबिन की कीमत 9500 रुपये बताई जा रही है। जबकि एक कंपनी ने महापौर के कैंप कार्यालय पर पत्र भेजकर 3500 रुपये में डस्टबिन सप्लाई करने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। पूरे प्रकरण पर निगम कार्यकारिणी की बैठक में अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा।
-हरीश कुमार, पार्षद नगर निगम
डस्टबिन खरीद प्रक्रिया टेंडर से की गई है। चार कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया था। जिसके सबसे कम रेट थे, उसी कंपनी से डस्टबिन खरीदे गए हैं। अगर कोई कंपनी सस्ते में डस्टबिन देना चाहती थी, तो उसे टेंडर प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए था। कहीं कोई गोलमाल नहीं हो रहा है।
-डा. प्रेम सिंह, नगर स्वास्थ्य अधिकारी
हमने निगम में किसी भी सामान की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया अनिवार्य की हुई है। डस्टबिन के लिए भी टेंडर प्रक्रिया हुई थी। फिर भी अगर कहीं कुछ गलत हुआ है, तो जांच कराकर कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा।
-हरिकांत अहलुवालिया, महापौर