अप्रैल फूल मनाना शरीयत में नाजायज : देवबंदी उलमा
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एक अप्रैल आते ही लोगों के जेहन में तरह-तरह की शरारतें आनी शुरू हो जाती हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों का अप्रैल फूल बनाने के लिए शरारतों से भरे मैसेज किए जाते हैं, लेकिन शरीयत के लिहाज से यह गलत है। देवबंदी उलमा की माने तो शरीयत में अप्रैल फूल मनाना नाजायज है। इतना ही नहीं इससे जुड़े मैसेज भेजना भी गुनाह की श्रेणी में आता है।
मदरसा जामिया कुदसियात के मोहतमिम मौलाना कारी आमिर उस्मानी का कहना है कि शरीयत में अप्रैल फूल मनाना गलत है। इस्लाम में इसको मनाने के लिए मना किया गया है, लेकिन आमतौर पर देखने में आता है कि लोग अप्रैल फूल से जुड़े मैसेज व्हाटसअप, फेसबुक या अन्य सोशल साइटों पर डालकर दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ तरह तरह की शरारतें करते हैं।
जिससे वक्त भी खराब होता है। शरीयत में इस तरह के अमल को गुनाह करार दिया गया है। साथ ही अप्रैल फूल मनाने को गलत माना गया है। कारी आमिर ने कहा कि लोग जितना वक्त मैसेज आदि भेजने में खराब करते हैं उतना वक्त अगर वो इबादत में गुजारें तो बेहतर है।
इस तरह बढ़ा अप्रैल फूल मनाने का प्रचलन
अप्रैल फूल (मूर्ख दिवस) मनाए जाने को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित कहानी के मुताबिक प्राचीनकाल में रोमन लोग अप्रैल में अपने नए वर्ष की शुरुआत करते थे, तो वहीं मध्यकालीन यूरोप में 25 मार्च को नववर्ष के उपलक्ष्य में एक उत्सव भी मनाया जाता था।
1852 में पोप ग्रेगरी अष्टम ने ग्रेगेरियन कैलेंडर (वर्तमान में मान्य कैलेंडर) की घोषणा की, जिसके आधार पर जनवरी से नए वर्ष की शुरुआत की गई। फ्रांस ने इस कैलेंडर को सबसे पहले स्वीकार किया था। जनश्रुति के आधार पर यूरोप के कई लोगों ने जहां इस कैलेंडर को स्वीकार नहीं किया था, तो वहीं कई लोगों को इसके बारे में जानकारी ही नहीं थी।
जिसके चलते नए कैलेंडर के आधार पर नववर्ष मनाने वाले लोग पुराने तरीके से अप्रैल में नववर्ष मनाने वाले लोगों को मूर्ख मानने लगे और तभी से अप्रैल फूल या मूर्ख दिवस का प्रचलन बढ़ता चला गया।