फैसला: 420 माह, 800 से ज्यादा तारीखें...सजा शून्य, 36 साल पहले सांप्रदायिक दंगे से बिगड़ा था मेरठ का माहौल
मलियाना दंगा मामले में सुनवाई : अदालत ने 39 आरोपियों को बरी किया है। बताया गया कि 1987 में 63 लोगों की मौत हुई थी।
विस्तार
वर्ष1987 में मेरठ सांप्रदायिक दंगों की आंच में झुलस रहा था। 14 अप्रैल को शब-ए-बरात के दिन सांप्रदायिक दंगा हुआ, जिसमें 12 लोगों की मौत हुई। तब कर्फ्यू लगाकर स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया, लेकिन तनाव बना रहा और मेरठ में दो तीन महीनों तक रुक-रुक कर दंगे होते रहे।
22 मई को हाशिमपुरा नरसंहार हुआ, जिसमें 42 लोगों की हत्या की गई। हालांकि इस मामले में 2018 में 16 पीएसी जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई, लेकिन इसके बाद 23 मई को हुए नरसंहार में अब आए फैसले में किसी को सजा नहीं हुई, जबकि 63 लोग मारे गए थे। करीब 36 सालों (420 महीने) में सुनवाई के लिए 800 से ज्यादा तारीखें लगीं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पीएसी 23 मई 1987 को दोपहर करीब 2:30 बजे 44वीं बटालियन के कमांडेंट सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नेतृत्व में मलियाना में घुसी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने आधिकारिक तौर पर 10 लोगों को मृत घोषित किया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस जीएल श्रीवास्तव ने 27 अगस्त को इसका आदेश दिया। 29 मई 1987 को तीन महीने बाद 27 अगस्त 1987 को कार्यवाही शुरू हुई, हालांकि मलियाना में पीएसी की निरंतर उपस्थिति से मलियाना के गवाहों से पूछताछ में बाधा उत्पन्न हुई।
जनवरी 1988 में आयोग ने सरकार को पीएसी को हटाने का आदेश दिया। जस्टिस जीएल श्रीवास्तव की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग ने 31 जुलाई 1989 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। 1987 में हुए मलियाना दंगों की जांच मेरठ पुलिस ने लगभग एक साल में पूरी की थी। 23 जुलाई 1988 को पुलिस ने इस मामले में आरोपपत्र दाखिल किया।
इन्हें बनाया था आरोपी
कैलाश भारती, कालीचरण, सुनील, प्रदीप कुमार, प्रेम सिंह, सुशील, नत्थू, कल्लू ठेकेदार, रामभली, रघुवर, रामदास, रामचन्द्र, धर्म सिंह, जीत, धर्मपाल, किशन, तिलकराम, रामभरी, बुद्ध, रामलाल, ताराचंद, दीपचंद, दयाराम, सुनील, राजू, सुभाष, तनसुख, प्रकाश, राम सिंह, हुकम सिंह, रामलीला, गरीबदास, नत्थू, बिक्कू, चन्द्रभान, जुगल किशोर, पप्पू, भिकारी, संतराम, सीताराम, तेजपाल, राजपाल, प्रकाश, हरभन, रघुवीर, वीर सिंह, महेन्द्र, राकेश, भोले, कून्नू, बुद्धप्रकाश, रोहिताश, सौरभ, किशन, पिन्टू, सुभाष, नरेन्द्र, कान्ति, प्रेम सागर, बिरजू, ओम प्रकाश, दीपचंद सैनी, गंगाराम, ननका, ओमप्रकाश, चन्द्रलाल, हरीओम, अशोक, रूपचंद, पूरन, सुभाष, नरेश, राकेश, सतीश, विजेन्द्र सहित कुल अन्य 79 आरोपी।
यह थे गवाह
वकील अहमद, अली हसन, इस्लामुद्दीन पुत्र अब्दुल रसीद, रहीस अहमद, इस्लामुदीन पुत्र अल्ला राजी, मेहताब अली पुत्र अलताफ, मेहताब अली पुत्र अशरफ, शाहिद हसन, फरीद अहमद और वादी याकूब, जुल्फिकार, डॉ. वीके शर्मा, तत्कालीन एसओ जगवीर सिंह और एसआई गुरुदीप ग्रेवाल।
मृतकों की याद में 23 साल बाद हुआ था कार्यक्रम
23 साल बाद 23 मई 2010 को मलियाना के लोगों ने इस नरसंहार में मरने वालों की याद में एक कार्यक्रम किया था। इस कार्यक्रम में ज्यादातर मृतकों के परिजन और नरसंहार में घायल हुए लोग शामिल हुए। मलियाना के लोगों का यह भी लगता है कि सरकार ने मृतक के आश्रितों को मुआवजा राशि देने में भी भेदभाव किया। उन्हें केवल 40-40 हजार रुपये का मुआवजा दिया गया था, जो अपर्याप्त था, जबकि हाशिमपुरा के पीड़ित परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया गया।
न्यायालय के फैसले पर विचार करेंगे
मुख्य वादी याकूब अली ने कहा कि न्यायालय के फैसले पर विचार करेंगे। जल्द ही कमेटी में शामिल लोगों से बातचीत कर हाईकोर्ट जाने पर निर्णय लिया जा सकता है। हादसे को सोच कर आज भी रूह कांप जाती है। इस दंगे में अपने भांजे को खोया है। 35 साल से अदालतों के चक्कर काटने के बाद आज फैसला आया है।
फैसले से संतुष्ट नहीं हाईकोर्ट जाएंगे
मलियाना निवासी 48 वर्षीय इस्तेखार ने बताया कि उनके पिता गुलजार की हत्या कर दी गई थी। आज 35 साल बाद न्यायालय का फैसला आया है। इसको लेकर संतुष्ट नहीं हूं। जल्द ही हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
मैं बच्चा था, पिता की लाश पड़ी थी
महताब(40) ने बताया कि दंगे के दौरान पिता अशरफ की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। उस वक्त मैं बहुत छोटा था। पिता की लाश मेरे सामने पड़ी थी। जबकि उनका दंगे से कोई लेना देना नहीं था। न्यायालय का फैसला सही नहीं है। बातचीत कर जल्द हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
पिता की कर दी थी हत्या
अफजाल सैफी (45) ने बताया कि दंगे के दौरान उनके पिता यासीन बाहर से घर की ओर लौट रहे थे। तभी रास्ते में दंगाइयों ने गोली मारकर शव शुगर मिल के पास फेंक दिया था। न्यायालय से आए फैसले पर विचार कर जल्द हाईकोर्ट में जाएंगे।
घर में आग लगा दी गई थी
58 वर्षीय इंतजार ने बताया कि ने दंगे के दौरान उनके घर में आगजनी कर दी। उस मंजर को सोचकर आज भी रूह कांप जाती है। न्यायालय के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। हाईकोर्ट में अपील करेंगे।