मिशन 2019: सांसदों के रिपोर्टकार्ड ने बदला भाजपा का मूड, कल होगी पहली सूची जारी
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पश्चिमी यूपी में पहले चरण के दौरान मेरठ समेत आठ लोकसभा सीटों पर चुनाव होंगे। वहीं भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की सूची रविवार को जारी होगी। हालांकि यह सूची शनिवार रात तक जारी होने की बात कही जा रही थी। लेकिन गठबंधन प्रत्याशियों की सूची और दबाव के कारण मजबूत प्रत्याशी चयन पर चले मैराथन मंथन के कारण सूची जारी नहीं हो सकी।
लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और रालोद गठबंधन सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में भाजपा इस चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। चुनाव से पहले गठबंधन को देखते हुए भाजपा ने वर्तमान सांसदों का ग्राउंड सर्वे कराने के साथ ही संघ परिवार से भी रिपोर्ट तैयार कराई थी। जिसमें प्रदेश के 30 प्रतिशत से ज्यादा से सांसदों से जनता असंतुष्ट नजर आई। ऐसे में इनमें से आधे से ज्यादा वर्तमान सांसदों के टिकट काटने की चर्चा पार्टी के भीतर जोरों पर है।
वहीं, दूसरी तरफ भले ही उत्तर प्रदेश में भाजपा को गठबंधन तगड़ी चुनौती दे रहा हो। लेकिन भाजपा में हर सीट पर दावेदारों की लंबी लाइन है। इन दावेदारों की पैरवी में जहां भाजपा के बड़े नेता हैं, तो संघ परिवार के भी नेता हैं। जिस कारण प्रत्याशी चयन में नेतृत्व को बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। साथ ही सबसे बड़ी चुनौती प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद होने वाली बगावत और भितरघात को रोकना है।
पार्टी सूत्रों की मानें तो भाजपा की सूची पर गठबंधन की भी नजर लगी है। जैसे ही भाजपा की सूची जारी होगी, वैसे ही गठबंधन भी जातिगत और स्थानीय समीकरण को देखते हुए अपने प्रत्याशी बदल सकता है। इसके अलावा भाजपा में भी भगदड़ मचने की संभावना जताई जा रही है, जिसका लाभ भी गठबंधन उठाएगा।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पार्टी नेतृत्व इसी बगावत और भितरघात को लेकर भी पूरी तरह सतर्क है। इसी कारण से कुछ सीटों पर अंतिम समय में भी प्रत्याशी की घोषणा हो सकती है। क्योंकि भाजपा ऐसे किसी नेता को मौका नहीं देना चाहती है, जो टिकट कटने पर भाजपा से बगावत कर उसके लिए मुसीबत खड़ी करे।
गौरतलब है कि पश्चिम की सीटों पर भाजपा प्रभारियों द्वारा लिए सांसदों के फीडबैक के बाद भाजपा नए चेहरों का एलान कर सकती है। यानी सांसदों के रिपोर्ट कार्ड ने भाजपा का मूड पूरी तरह बदल दिया है।
हालांकि पार्टी इस चुनाव में तमाम महत्वपूर्ण सीटों पर बदलाव के साथ एक नएपन का संदेश देना चाहती है। वहीं भाजपा पश्चिमी यूपी 2014 में हुए लोकसभा चुनाव की रणनीति को दोहराना चाहती है। ऐसे में बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहेगी। यही कारण है कि पार्टी हर विकल्प पर गहन मंथन कर रही है।
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