कारगिल युद्ध: चिट्ठी के जवाब में लिखा था, तोलोलिंग जीत ली है, जल्द घर लौटूंगा... दर्द भरी कहानी
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मूल रूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांस नायक सत्यपाल सिंह की ग्वालियर में तैनाती थी। जनवरी 1999 में वे छुट्टी काटकर ग्वालियर पहुंचे तो वहां से जम्मू के लिए तबादला हो गया।
बटालियन जम्मू पहुंची ही थी कि इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को फौरन कारगिल पहुंचने के आदेश हुए। सत्यपाल सिंह लड़ाई में गए हैं, इसकी जानकारी उनके घर पर किसी को नहीं थी। इसी बीच उनकी यूनिट के तीन साथी सैदपुर गुलावठी के चमन, सुरेंद्र और जसवीर कारगिल में शहीद हुए तो पूरे इलाके में खबर फैल गई। जैसे ही ये सूचना लुहारी में पहुंची तो सत्यपाल सिंह के परिवार में सबको उनकी चिंता होने लगी।
वे शहीद हो गए
दो जुलाई को गांव में थाने के सिपाही लांस नायक सत्यपाल सिंह के घर पहुंचे तो सब बेचैन हो गए। कुछ देर बैठने के बाद सिपाहियों ने बताया कि सेना मुख्यालय से खबर आई कि 28 जून को लांस नायक सत्यपाल सिंह द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। पूरे गांव में हाहाकार मच गया।
जीत से आया चिट्ठी का जवाब
परिवार के लोगों ने चिट्ठी लिखी तो सत्यपाल सिंह का जवाब आया कि उन्होंने तोलोलिंग जीत ली है। लेकिन दुश्मन अभी बहुत सारी चोटियों पर कब्जा किए बैठा है। ऐसे में युद्ध खत्म होने से पहले नहीं आ पाऊंगा। चिंता मत करना। मैं बिल्कुल ठीक हूं। इसके बाद कोई सूचना नहीं आई।
साढ़े तीन साल का था बेटा
लांस नायक सत्यपाल सिंह जब शहीद हुए तो उनकी उम्र 28 साल थी। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। वीर नारी बबीता देवी बताती हैं कि कई महीनों तक तो समझ में ही नहीं आया कि जिंदगी अब कैसे जीऊंगी। बबीता देवी बताती हैं कि सेना ने उनकी काफी मदद की। यूनिट के अफसर उन्हें भगत लाइंस ले आए। यहां पर वे 11 महीने रहीं इसके बाद उनको तोपखाना में क्वार्टर मिल गया। छह साल तक वहां रहने के बाद फिर वे कंकरखेड़ा डिफेंस एनक्लेव में आ गईं।
सरकार ने नहीं निभाया वादा
वीर नारी बबीता देवी बताती हैं कि सरकार ने जो वादे किए थे, आज तक पूरे नहीं किए गए। कई साल चक्कर काटने के बाद पेट्रोल पंप मिला। लेकिन वो भी कंपनी की जमीन पर है। कंपनी कब हमें निकाल दे, कुछ नहीं कह सकते हैं। बबीता देवी बताती हैं कि अगर उन्हें पता होता कि ऐसा धोखा हो रहा है तो वे पेट्रोल पंप का लाइसेंस लेती ही नहीं। इसके अलावा सरकार ने 25 बीघा जमीन देने का वादा किया था। लेकिन 18 बीघा ही दी। उसमें से भी आठ बीघा जमीन आज तक नाम नहीं हो पाई है। चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं।
बेटा पुलकित बोला, पापा पर फख्र होता है
शहीद सत्यपाल सिंह के बेटे पुलकित एमबीए कर रहे हैं जबकि बिटिया दिव्या एमए कर रही हैं। दोनों बताते हैं कि उन्होंने तो पापा को नहीं देखा। लेकिन उनकी बहादुरी के किस्से सुनकर फख्र होता है।
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