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कैराना और सरधना के बहाने चुनावी मॉड्यूल
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 18 Jun 2016 12:54 AM IST
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सरधना में तैनात फोर्स
- फोटो : अमर उजाला
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कैराना और कांधला के लोगों की पलायन सूची जारी करने के बाद भाजपा विधायक संगीत सोम की निर्भय यात्रा पश्चिम के लिए सियासी तौर पर काफी अहम है। मुजफ्फरनगर की सीमा से जुटे क्षेत्र में इन तमाम सरगर्मियों के सार में आने वाला विधानसभा चुनाव छिपा है। यही वजह है कि सपा नेताओं ने भी पूरे लावलश्कर के साथ सद्भावना यात्रा के लिए दिन और समय भी निर्भय यात्रा का ही चुना।
आखिर क्यों अहम हुए कैराना और सरधना
साल 2014 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए हिंदू मतों के एकतरफा ध्रुवीकरण का पूरा फायदा उठाया। उस समय भी ध्रुवीकरण के चेहरों में सांसद हुकुम सिंह, विधायक संगीत सोम और सुरेश राणा प्रमुख थे। तीनों पर दंगों का आरोप लगा और संगीत सोम और सुरेश राणा जेल भी गए थे। अब उन्हीं नामों के सहारे भाजपा ने विधानसभा का चुनावी मॉड्यूल तैयार किया है। पहले कैराना में हुकुम सिंह ने सूची जारी की। उसके बाद उनकी प्रेसवार्ता में विशेष तौर पर सुरेश राणा को बुलाया गया।
जब संगीत सोम ने निर्भय यात्रा का एलान किया तो हुकुम सिंह ने बयान दिया कि ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद सोम ने सैकड़ों समर्थकों के साथ यात्रा आरंभ की। इसे संगीत सोम की निजी यात्रा भी नहीं माना जा सकता है।
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दरअसल, भाजपा पूरी रणनीति के साथ मुजफ्फरनगर के आसपास के क्षेत्र में उसी भावना का लाभ उठाना चाहती है। संगीत सोम की निर्भय यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा है। खास बात यह है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी केंद्र सरकार की दो साल की उपलब्धियां गिनाने के लिए मुजफ्फरनगर से सटे जनपद सहारनपुर को चुना था।
सपा की मैदान में आने की रणनीति
भाजपा ने लोकसभा चुनावों में पश्चिम की विधानसभा की अधिकांश सीटों पर बढ़त बनाई थी। सपा का पश्चिम में मुस्लिमों वोटों के अलावा कोई और मजबूत आधार नहीं है। ऐसे में सपा की सद्भावना यात्रा भी महज संगीत सोम का विरोध करने की रणनीति नहीं है। इसके पीछे सीधी रणनीति भाजपा के सामने खड़े होने की दिखाई देनी है। वैसे भी सरधना विधानसभा से लेकर आसपास की सभी विधानसभाओं में सपा के चुनावी अभियान में महज यही समीकरण मुफीद बैठता है। सभी सीटों पर मुस्लिम वोटों की संख्या काफी है। सपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में सभी जिलों में अच्छी-खासी सफलता हासिल की थी। सपा को न सिर्फ भाजपा के सामने दिखना है बल्कि बसपा के दलित-मुस्लिम समीकरण को भी पश्चिम में असरदार होने से बचना है। यही कारण है कि एकाएक कैराना और कांधला से लेकर सरधना तक सपा के नेता सक्रिय हो गए हैं। प्रशासन की अनुमति न मिलने के बावजूद सपा नेता सरधना में सद्भावना यात्रा के लिए जुटे।
बसपा के सामने कड़ी चुनौती
पिछले दिनों से चल रहे इस सियासी खेल में बसपा अभी थोड़ी दूर दिखाई दे रही है। बसपा नेता यह आरोप तो लगातार लगा रहे हैं कि सपा और भाजपा एक-दूसरे से नूरा कुश्ती कर रहे हैं। लेकिन मैदान में दिखाई देना बसपा के लिए कड़ी चुनौती है। पश्चिम में अधिकांश सीटों पर दलित-मुस्लिम वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है। वैसे लोकसभा चुनाव में यह समीकरण नहीं चला था और बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। पश्चिम में बसपा विधानसभा चुनावों के लिए प्रत्याशी भी घोषित कर चुकी है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से चल रहे सियासी खेल से अभी अलग दिखाई दे रही है। कुछ लोगों का मानना है कि बसपा रणनीति के तहत ऐसा कर रही है और अभी हालात भांप रही है। वहीं, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि लंबे समय तक ऐसा होने से सपा मुस्लिम वोटरों को अपने साथ लामबंद कर सकती है।
रालोद और कांग्रेस भी वेट एंड वॉच
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद को काफी नुकसान हुआ। जाट वोटर भाजपा की ओर खिसक गया। चौ. अजित सिह ने पिछले दिनों में कैराना प्रकरण में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन सपा पर कुछ नहीं बोले थे। विधानसभा चुनावों में सपा से संभावित गठबंधन को देखते हुए रालोद के नेता अभी मामलों में संयम ही बरत रहे हैं। पश्चिम में कमजोर हो चुकी कांग्रेस भी कमोबेश इसी स्थिति में है।
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आखिर क्यों अहम हुए कैराना और सरधना
साल 2014 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए हिंदू मतों के एकतरफा ध्रुवीकरण का पूरा फायदा उठाया। उस समय भी ध्रुवीकरण के चेहरों में सांसद हुकुम सिंह, विधायक संगीत सोम और सुरेश राणा प्रमुख थे। तीनों पर दंगों का आरोप लगा और संगीत सोम और सुरेश राणा जेल भी गए थे। अब उन्हीं नामों के सहारे भाजपा ने विधानसभा का चुनावी मॉड्यूल तैयार किया है। पहले कैराना में हुकुम सिंह ने सूची जारी की। उसके बाद उनकी प्रेसवार्ता में विशेष तौर पर सुरेश राणा को बुलाया गया।
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जब संगीत सोम ने निर्भय यात्रा का एलान किया तो हुकुम सिंह ने बयान दिया कि ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद सोम ने सैकड़ों समर्थकों के साथ यात्रा आरंभ की। इसे संगीत सोम की निजी यात्रा भी नहीं माना जा सकता है।
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दरअसल, भाजपा पूरी रणनीति के साथ मुजफ्फरनगर के आसपास के क्षेत्र में उसी भावना का लाभ उठाना चाहती है। संगीत सोम की निर्भय यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा है। खास बात यह है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी केंद्र सरकार की दो साल की उपलब्धियां गिनाने के लिए मुजफ्फरनगर से सटे जनपद सहारनपुर को चुना था।
सपा की मैदान में आने की रणनीति
भाजपा ने लोकसभा चुनावों में पश्चिम की विधानसभा की अधिकांश सीटों पर बढ़त बनाई थी। सपा का पश्चिम में मुस्लिमों वोटों के अलावा कोई और मजबूत आधार नहीं है। ऐसे में सपा की सद्भावना यात्रा भी महज संगीत सोम का विरोध करने की रणनीति नहीं है। इसके पीछे सीधी रणनीति भाजपा के सामने खड़े होने की दिखाई देनी है। वैसे भी सरधना विधानसभा से लेकर आसपास की सभी विधानसभाओं में सपा के चुनावी अभियान में महज यही समीकरण मुफीद बैठता है। सभी सीटों पर मुस्लिम वोटों की संख्या काफी है। सपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में सभी जिलों में अच्छी-खासी सफलता हासिल की थी। सपा को न सिर्फ भाजपा के सामने दिखना है बल्कि बसपा के दलित-मुस्लिम समीकरण को भी पश्चिम में असरदार होने से बचना है। यही कारण है कि एकाएक कैराना और कांधला से लेकर सरधना तक सपा के नेता सक्रिय हो गए हैं। प्रशासन की अनुमति न मिलने के बावजूद सपा नेता सरधना में सद्भावना यात्रा के लिए जुटे।
बसपा के सामने कड़ी चुनौती
पिछले दिनों से चल रहे इस सियासी खेल में बसपा अभी थोड़ी दूर दिखाई दे रही है। बसपा नेता यह आरोप तो लगातार लगा रहे हैं कि सपा और भाजपा एक-दूसरे से नूरा कुश्ती कर रहे हैं। लेकिन मैदान में दिखाई देना बसपा के लिए कड़ी चुनौती है। पश्चिम में अधिकांश सीटों पर दलित-मुस्लिम वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है। वैसे लोकसभा चुनाव में यह समीकरण नहीं चला था और बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी। पश्चिम में बसपा विधानसभा चुनावों के लिए प्रत्याशी भी घोषित कर चुकी है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से चल रहे सियासी खेल से अभी अलग दिखाई दे रही है। कुछ लोगों का मानना है कि बसपा रणनीति के तहत ऐसा कर रही है और अभी हालात भांप रही है। वहीं, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि लंबे समय तक ऐसा होने से सपा मुस्लिम वोटरों को अपने साथ लामबंद कर सकती है।
रालोद और कांग्रेस भी वेट एंड वॉच
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद को काफी नुकसान हुआ। जाट वोटर भाजपा की ओर खिसक गया। चौ. अजित सिह ने पिछले दिनों में कैराना प्रकरण में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन सपा पर कुछ नहीं बोले थे। विधानसभा चुनावों में सपा से संभावित गठबंधन को देखते हुए रालोद के नेता अभी मामलों में संयम ही बरत रहे हैं। पश्चिम में कमजोर हो चुकी कांग्रेस भी कमोबेश इसी स्थिति में है।