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हाईकोर्ट की सख्ती: धोखाधड़ी और विश्वासघात जुड़वा नहीं जो एक-दूजे के बिना जी न सकें, मेरठ का समन आदेश रद्द

Fri, 19 Jun 2026 11:13 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 19 Jun 2026 11:13 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि धोखाधड़ी और अमानत में खयानत की धाराएं एक साथ लागू नहीं हो सकतीं। मेरठ के एक मामले में अदालत ने समन आदेश रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट को नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है।

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High Court Clarifies Fraud and Criminal Breach of Trust, Meerut Summon Order Quashed
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी और अमानत में खयानत से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दोनों अपराध जुड़वा बच्चे नहीं हैं, जो एक-दूसरे के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों धाराओं की प्रकृति अलग-अलग और एक-दूसरे के विपरीत है। इसलिए बिना कानूनी परीक्षण के दोनों धाराओं में एक साथ संज्ञान लेना कानून की गंभीर अज्ञानता को दर्शाता है।

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मेरठ के मामले में रद्द किया समन आदेश
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ मेरठ के एक मामले की सुनवाई कर रही थी। वर्ष 2025 में सिविल लाइंस थाने में अभिषेक गौतम के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया, जिसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 29 सितंबर 2025 को संज्ञान लेते हुए याची के खिलाफ समन आदेश जारी कर दिया था।

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याची की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं और उनका वास्तविक तथ्यों से कोई संबंध नहीं है। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति की अनदेखी की है।
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मजिस्ट्रेट को नए सिरे से विचार का निर्देश
अदालत ने याची के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही संबंधित मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए मामले का नए सिरे से परीक्षण करें और यह तय करें कि प्रकरण में वास्तव में कौन सी एक धारा लागू होती है। इसके बाद ही नया आदेश पारित किया जाए।

क्यों साथ नहीं चल सकतीं दोनों धाराएं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी के मामले में आरोपी की नीयत शुरुआत से ही गलत होती है। वह छल या गलत बयानी के जरिए पीड़ित से संपत्ति या लाभ प्राप्त करता है। दूसरी ओर अमानत में खयानत के मामले में संपत्ति पहले वैध रूप से और भरोसे के आधार पर आरोपी को सौंपी जाती है, लेकिन बाद में वह उस भरोसे को तोड़ते हुए संपत्ति का दुरुपयोग या हड़प लेता है।

अदालत ने कहा कि यदि शुरुआत में भरोसा था तो मामला धोखाधड़ी का नहीं हो सकता और यदि शुरुआत से ही नीयत गलत थी तो उसे अमानत में खयानत नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि दोनों धाराओं को एक साथ लागू करना कानूनी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

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