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दिवाली पर आपके लिये तैयार हो रही ये मिठाई  

Wed, 11 Oct 2017 11:33 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Wed, 11 Oct 2017 11:33 AM IST
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diwali sweets ready for youi
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

मिलावट की मंडी के नाम से मशहूर जसड़ सुल्तान नगर में इस बार भी मिलावटी व सिंथेटिक मावा और मिठाई बनाने का धंधा शुरू हो चुका है। यहीं से मिठाई तैयार होकर मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा और आसपास के प्रदेशों में सप्लाई होती है। गंदगी में बन रही इस मिठाई को देखकर आप खाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे।

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सरूरपुर क्षेत्र के जसड़ सुल्तान नगर, जैनपुर, डाहर, गोटका गांवों में मिलावट के इन बड़े सौदागरों के कारनामे भी बड़े हैं। खाद्य विभाग से इनको जारी किये गये लाइसेंस में साफ लिखा है कि दूध छेने व चीनी से निर्मित मिठाइयां और दूध व छेने से बना रसगुल्ला ही बना सकते हैं। लेकिन इसी लाइसेंस की आड़ में ना जाने क्या-क्या बन रहा है और क्या-क्या मिलाया जा रहा है। अमर उजाला की टीम मंगलवार को मिठाई बनाने वालों के ठिकाने पर पहुंची तो हम खुद हैरान रह गये। छोटे बच्चे गंदे हाथों से रसगुल्ले तैयार कर रहे थे तो रिफाइंड के कनस्तर मिठाई की शुद्धता की पोल खोल रहे थे। सोहन पापड़ी बनाने के लिए मिलावटी पाउडर बनाया जा रहा था।
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ये है खुला मिलावट का कारोबार 
रसगुल्ला बनाने में स्टार्च पाउडर, दूध पाउडर और अरारोट का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से खतरनाक अरारोट फुलाने का तो स्टार्च चमक व सफेदी लाने का काम करता है। दूध के छेने के बजाए घटिया किस्म के दूध पाउडर का इस्तेमाल होता है, जबकि मिल्क केक में दूध की क्रीम निकाल कर बेच दी जाती है। वहीं दूध का पनीर बना दिया जाता है। इस पनीर बनाने की प्रक्रिया में जो पानी निकलता है, उसमें दूध का कुछ अंश मिलाते हुए उसमें दूध पाउडर मिलाकर उसमें घटिया किस्म का रिफाइंड मिलाया जाता है। मिल्क केक में दाना आये इसके लिए खतरनाक साटरी का प्रयोग किया जाता है। 
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सोहन पापड़ी में भी मिलावट 
इसके अलावा सोहन पापडी में बेसन के स्थान पर मैदा व सूजी के साथ पीला रंग मिलाया जाता है। इसके बाद उसे चीड़ा बनाने के लिए, उसमें सेफोलाइट पपड़ी व खतरनाक केमिकल डाले जाते हैं। यहां पेठे को मीठा बनाने के लिए खतरनाक सेक्रिन भी मिलाई जाती है। बर्फी बनाने के लिए सूखा पाउडर रिफाइंड, वनस्पति घी मिलाया जाता है। ये सब खतरनाक और प्रतिबंधित केमिकल हैं। 


सेटिंग का है पूरा खेल 
इस क्षेत्र में मावा और मिठाई बनाने का काम किसी उद्योग की तरह है। दीवाली और होली के खास मौके पर हर तीसरे घर में भट्टी चलती नजर आती है। कुछ लोग पूरे साल इस कारोबार को करते हैं। धंधे से जुड़े लोग खुद दावा करते हैँ कि इनके खाद्य विभाग के अफसरों से रेट फिक्स होते हैं। लोकल में सैंपल भरने पर मात्र पांच हजार में पास हो जाता है जबकि बडे़ स्तर पर लखनऊ या आगरा जाने पर रेट बढ़ जाते हैं। छापे की सूचना खुद अधिकारी दे देते हैं।

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