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अपराधियों को खोजता है डिवाइस
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
Updated Sat, 30 Apr 2016 01:57 AM IST
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crime search
- फोटो : amar ujala
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वक्त बदला तो टेक्नालॉजी विकसित होती गई
90 के दशक में बदमाशों ने मोबाइल फोन के जरिये खूब आतंक बरपाया। सर्विलांस सिस्टम एक्टिव हुआ तो यही मोबाइल उनके लिए जान का दुश्मन बन बैठा। अब संगीन वारदात करने वाला बदमाश मोबाइल फोन न रखकर सयाना हो चला है, लेकिन उसके बावजूद ट्रैकिंग सिस्टम उस पर भारी पड़ रहा है। पुलिसिंग ही नहीं, जासूसी से लेकर आम व्यवहार के कामों में भी यह ट्रैकर कारगर साबित हो रहा है।
क्या है ट्रैकर
माचिस की डिब्बी से भी छोटी एक डिवाइस। इसमें एक सिम कार्ड लगा होता है जो ग्लोबल पोजिसिनिंग सिस्टम (जीपीएस) के सहारे ट्रैकिंग प्रक्रिया पूरी करता है। आसान भाषा में कहें तो जीपीएस एक तरह का सिस्टम है तो ट्रैकर संबंधित वस्तु, वाहन या इंसान तक पहुंचने का प्रोसेस। इसके लिए इंटरनेट जरूरी है।
यह डिवाइस किसी लगेज, वाहन आदि के अलावा पशुओं में फिट की जा सकती है। गूगल मैप के जरिये पता चलता जाता है कि वह डिवाइस किस दिशा में जा रही है। कुछ उच्चस्तरीय डिवाइस बटन के आकार जितनी होती हैं जो बिना सिम के चलती हैं। इसे मुख्यतौर पर जासूसी में प्रयोग किया जाता है। यह कपड़ों या यहां तक कि इंसान के शरीर में फिट किया जा सकता है। इस तरह की डिवाइस को अमूमन आला खुफिया एजेंसियां प्रयोग में लाती हैं।
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अलग-अलग व्यवहार में प्रयोग
यह ट्रैकर खोया हुआ मोबाइल फोन ढूंढने के प्रयोजन से शुरू हुआ, लेकिन संगीन वारदातों में वांछित बदमाशों पर काबू पाने के लिए इसका दायरा बढ़ता गया। इसके लिए सेल ट्रैक के नाम से सॉफ्टवेयर बना। जो किसी वांछित बदमाश की सेल आईडी (मोबाइल फोन नंबर आईडी) को उसके संबंधित मोबाइल टावर पर पहुंचकर एक्टिव होकर डिटेक्ट करता है।
कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) की मदद से उन कॉमन नंबरों को खोजा जाता है, जो किसी बदमाश द्वारा या तो लगातार प्रयोग किए जा रहे हैं या उन पर संपर्क हो रहा है। जब कोई एक नंबर कन्फर्म हो जाता है तो उसकी रनिंग लोकेशन उसके मोबाइल टावर या बीटीएस डाटा से पता चलती है। जीपीएस की मदद से उस भवन की फुल डिटेल सामने आ जाती है, जहां संबंधित बदमाश उस मोबाइल नंबर को प्रयोग कर रहा है।
अतिशय केस में मिली सफलता
फिरौती के लिए अपहरण जैसे संगीन मामलों में यह ट्रैकर बखूबी काम करता है। अपहरणकर्ताओं तक पहुंचने के लिए उनके किसी वाहन या फिर फिरौती के लिए दी जा रही रकम के बैग में इस डिवाइस को लगाकर जीपीएस की मदद से उसका पीछा किया जाता है। शहर के चर्चित अतिशय अपहरण कांड में पुलिस को सफलता इसी खास वजह से लगी थी। जब पुलिस के हाथ एक अपहरणकर्ता का वह नंबर लगा था, जो उसने वारदात से एक माह पहले प्रयोग करना बंद कर दिया था। उस नंबर की सेल आईडी के सहारे पुलिस उसके घर तक पहुंची थी। इसके बाद अपहरणकर्ताओं को फिरौती की रकम देने वाले बैग में ट्रैकर लगाया गया था।
वन्य जीवों पर प्रयोग
कुछ ट्रैकर खास किस्म के होते हैं। ऐसी डिवाइस बाघ या शेर जैसे जीवों में फिट की जाती है। इसके माध्यम से जीव के व्यवहार से लेकर उसकी पूरी दिनचर्या का पता लगाया जाता है। विदेशी नस्ल के पालतू डॉग में भी यह ट्रैकर प्रयोग में लाया जाता है। हाल ही में शहर के एक डॉग नॉडी को इसी सिस्टम से ढूंढने में सफलता मिली।
बड़े बदमाश नहीं रखते मोबाइल
पुलिस अफसरों की मानें तो सर्विलांस ने जहां जरायम की कमर तोड़ी है तो इससे बड़े बदमाश सतर्क भी हो चुके हैं। वारदात से पहले और बाद में वे मोबाइल फोन प्रयोग नहीं करते। ऐसे बड़े बदमाश अपने खबरी से अपडेट रहते हैं। ये खबरी भी सोशल रेपो वाले लोग होते हैं। कुछ मामलों में हम मैन्युअल और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाते हैं, लेकिन यहां सर्विलांस का महत्व कम नहीं हो जाता। यह अपना बखूबी करता है। देर से ही सही लेकिन 90 प्रतिशत केसों में आज भी सर्विलांस से ही बदमाश पकड़ा जाता है।
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90 के दशक में बदमाशों ने मोबाइल फोन के जरिये खूब आतंक बरपाया। सर्विलांस सिस्टम एक्टिव हुआ तो यही मोबाइल उनके लिए जान का दुश्मन बन बैठा। अब संगीन वारदात करने वाला बदमाश मोबाइल फोन न रखकर सयाना हो चला है, लेकिन उसके बावजूद ट्रैकिंग सिस्टम उस पर भारी पड़ रहा है। पुलिसिंग ही नहीं, जासूसी से लेकर आम व्यवहार के कामों में भी यह ट्रैकर कारगर साबित हो रहा है।
क्या है ट्रैकर
माचिस की डिब्बी से भी छोटी एक डिवाइस। इसमें एक सिम कार्ड लगा होता है जो ग्लोबल पोजिसिनिंग सिस्टम (जीपीएस) के सहारे ट्रैकिंग प्रक्रिया पूरी करता है। आसान भाषा में कहें तो जीपीएस एक तरह का सिस्टम है तो ट्रैकर संबंधित वस्तु, वाहन या इंसान तक पहुंचने का प्रोसेस। इसके लिए इंटरनेट जरूरी है।
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यह डिवाइस किसी लगेज, वाहन आदि के अलावा पशुओं में फिट की जा सकती है। गूगल मैप के जरिये पता चलता जाता है कि वह डिवाइस किस दिशा में जा रही है। कुछ उच्चस्तरीय डिवाइस बटन के आकार जितनी होती हैं जो बिना सिम के चलती हैं। इसे मुख्यतौर पर जासूसी में प्रयोग किया जाता है। यह कपड़ों या यहां तक कि इंसान के शरीर में फिट किया जा सकता है। इस तरह की डिवाइस को अमूमन आला खुफिया एजेंसियां प्रयोग में लाती हैं।
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अलग-अलग व्यवहार में प्रयोग
यह ट्रैकर खोया हुआ मोबाइल फोन ढूंढने के प्रयोजन से शुरू हुआ, लेकिन संगीन वारदातों में वांछित बदमाशों पर काबू पाने के लिए इसका दायरा बढ़ता गया। इसके लिए सेल ट्रैक के नाम से सॉफ्टवेयर बना। जो किसी वांछित बदमाश की सेल आईडी (मोबाइल फोन नंबर आईडी) को उसके संबंधित मोबाइल टावर पर पहुंचकर एक्टिव होकर डिटेक्ट करता है।
कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) की मदद से उन कॉमन नंबरों को खोजा जाता है, जो किसी बदमाश द्वारा या तो लगातार प्रयोग किए जा रहे हैं या उन पर संपर्क हो रहा है। जब कोई एक नंबर कन्फर्म हो जाता है तो उसकी रनिंग लोकेशन उसके मोबाइल टावर या बीटीएस डाटा से पता चलती है। जीपीएस की मदद से उस भवन की फुल डिटेल सामने आ जाती है, जहां संबंधित बदमाश उस मोबाइल नंबर को प्रयोग कर रहा है।
अतिशय केस में मिली सफलता
फिरौती के लिए अपहरण जैसे संगीन मामलों में यह ट्रैकर बखूबी काम करता है। अपहरणकर्ताओं तक पहुंचने के लिए उनके किसी वाहन या फिर फिरौती के लिए दी जा रही रकम के बैग में इस डिवाइस को लगाकर जीपीएस की मदद से उसका पीछा किया जाता है। शहर के चर्चित अतिशय अपहरण कांड में पुलिस को सफलता इसी खास वजह से लगी थी। जब पुलिस के हाथ एक अपहरणकर्ता का वह नंबर लगा था, जो उसने वारदात से एक माह पहले प्रयोग करना बंद कर दिया था। उस नंबर की सेल आईडी के सहारे पुलिस उसके घर तक पहुंची थी। इसके बाद अपहरणकर्ताओं को फिरौती की रकम देने वाले बैग में ट्रैकर लगाया गया था।
वन्य जीवों पर प्रयोग
कुछ ट्रैकर खास किस्म के होते हैं। ऐसी डिवाइस बाघ या शेर जैसे जीवों में फिट की जाती है। इसके माध्यम से जीव के व्यवहार से लेकर उसकी पूरी दिनचर्या का पता लगाया जाता है। विदेशी नस्ल के पालतू डॉग में भी यह ट्रैकर प्रयोग में लाया जाता है। हाल ही में शहर के एक डॉग नॉडी को इसी सिस्टम से ढूंढने में सफलता मिली।
बड़े बदमाश नहीं रखते मोबाइल
पुलिस अफसरों की मानें तो सर्विलांस ने जहां जरायम की कमर तोड़ी है तो इससे बड़े बदमाश सतर्क भी हो चुके हैं। वारदात से पहले और बाद में वे मोबाइल फोन प्रयोग नहीं करते। ऐसे बड़े बदमाश अपने खबरी से अपडेट रहते हैं। ये खबरी भी सोशल रेपो वाले लोग होते हैं। कुछ मामलों में हम मैन्युअल और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाते हैं, लेकिन यहां सर्विलांस का महत्व कम नहीं हो जाता। यह अपना बखूबी करता है। देर से ही सही लेकिन 90 प्रतिशत केसों में आज भी सर्विलांस से ही बदमाश पकड़ा जाता है।