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भ्रूण लिंग परीक्षण रोकने में हरियाणा से हारा मेरठ, हवाई हो रहे दावे

Thu, 27 Dec 2018 01:18 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Thu, 27 Dec 2018 01:18 PM IST
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Meerut unable to stop fetal gender tests fails claims to Haryana
लिंग परीक्षण - फोटो : SOCIAL MEDIA

भ्रूण लिंग परीक्षण रोकने के हवाई दावे करना तो कोई मेरठ में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से सीखे। स्वास्थ्य विभाग कोख के कातिलों पर वार करने की बात तो करता है। लेकिन अधिकारियों को यह तक पता नहीं है कि इस योजना के कहां-कहां होर्डिंग लगा रखे हैं। वहीं 18 माह की अवधि में हरियाणा का स्वास्थ्य विभाग मेरठ में घुसकर लिंग परीक्षण के कई मामले पकड़ चुका है।

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पिछले साल एक जुलाई को स्वास्थ्य विभाग ने मुखबिर योजना शुरू की थी। तब इस योजना के तहत जहां ‘मुखबिर बनो और इनाम पाओ’ स्लोगन पर ज्यादा फोकस था, तो इस बार ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को योजना के साथ जोड़ा गया था। शहर में जगह-जगह होर्डिंग्स लगाए गए, ताकि लोगों को इसके बारे में अच्छे से जानकारी हो सके। वह आगे बढ़कर आएं और जालसाजों को पकड़ने में स्वास्थ्य विभाग की मदद करें।
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जिला अस्पताल, सीएमओ कार्यालय, मेडिकल कॉलेज और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों के आसपास बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए। डेढ़ साल होने को है। लेकिन भ्रूण लिंग परीक्षण के खेल पर स्वास्थ्य विभाग अंकुश नहीं लगा पाया है, जबकि हरियाणा की टीम कई बार यहां बड़ी छापामारी कर चुकी है। हालांकि इस दौरान उसने स्वास्थ्य विभाग की टीम को साथ रखा था, लेकिन यहां की टीम अपने स्तर से कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर पाई है। 

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कम है मेरठ का लिंगानुपात : प्रदेश का लिंगानुपात एक हजार पुरुषों पर 903 है, जबकि मेरठ का यह अनुपात 885 है। इसे सुधारने की शायद गंभीरता से कोशिश नहीं की जा रही है। यही वजह है कि करीब डेढ़ साल में मुखबिर योजना पूरी तरह से सक्रिय नहीं हो पाई है। अब इसे फिर से जोर-शोर से शुरू करने के दावे हो रहे हैं।

यह है डिक्वाय ऑपरेशन : मुखबिर योजना के तहत सफल डिक्वाय ऑपरेशन करने पर मुखबिर को 60 हजार रुपये, मिथ्या ग्राहक को एक लाख रुपये और मिथ्या ग्राहक सहायक को 40 हजार रुपये धनराशि पुरस्कार के तौर पर देने का प्रावधान किया गया है। 

अब खिंचवा रहे फोटो
स्वास्थ्य विभाग भ्रूण लिंग परीक्षण क्या रोकेगा, उसे इसके प्रचार-प्रसार की भी सुध नहीं है। नौ माह हो गए। लेकिन स्वास्थ्य विभाग को यह तक नहीं पता कि इसके प्रचार प्रसार के लिए लगे होर्डिंग्स कहां-कहां हैं। और तो और होर्डिंग्स लगाने वालों के पैसे तक नहीं दिए गए हैं, जबकि वह कई बार इसकी मांग कर चुका है। अब स्वास्थ्य विभाग के अफसर जिले भर में जगह-जगह घूमकर होर्डिंग्स ढूंढ रहे हैं और उनके साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। इसकी रिपोर्ट तैयार कर प्रशासन की दी जाएगी, ताकि भुगतान हो सके।

संसाधनों का अभाव 
होर्डिंग्स के करीब 75 हजार रुपये बचे हुए हैं, उन्हीं के लिए होर्डिंग्स की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। डिक्वाय ऑपरेशन के लिए संसाधनों का अभाव भी वजह है। हरियाणा के पास यहां से बेहतर इंतजाम हैं। यहां भी बेहतर इंतजाम किए जाएंगे। - डॉ. प्रवीण गौतम, अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी

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